जलवायु परिवर्तन के बहुत से उदाहरण हमें दिखाई दे रहे हैं. लगातार कार्बन उत्सर्जन से ये समस्या एक विकराल रूप धारण किए हुए है. पर इसके और भी बहुत से कारण हैं. कभी आपने सोचा भी नहीं होगा कि जिस खाने को आप फेंक देते हैं, असल में वह भी क्लाइमेट चेंज का कारण हो सकता है. संयुक्त राष्ट पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है कि साल 2019 में 93 करोड़ टन भोजन को कचरे में फेंक दिया गया.
इस सर्वे में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि इस हालत के पीछे केवल विकसित देश ही नहीं, बल्कि विकासशील देश भी पूरी तरह से जिम्मेदार हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के डीन और क्लाइमेट चेंज पर रिसर्च कर रहे डॉ. बी.डब्लू. पांडे कहते हैं कि ये समस्या विश्व भर की है और दुनिया में लोगों को पता ही नहीं कि वे भी वातावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं. वे क्लाइमेट चेंज के लिए औद्योगिकरण को जिम्मेदार बताते हैं, पर हिस्सेदारी उनकी भी है.
कार्बन उत्सर्जन में सहायक
घर, रेस्त्रां और दुकानों से जितनी भोजन बर्बादी होती है, उसका लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा, भोजन फेंक देने के कारण बर्बाद होता है. इस्तेमाल ना होने वाले भोजन को 8 से 10 फीसदी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों के लिये ज़िम्मेदार माना जाता है.
जानकर मानते हैं कि वैश्विक खाद्य प्रणाली विश्व की एक तिहाई ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है. अगर दुनिया में खाद्य उत्पादन से लेकर उपभोग तक की समुचित व्यवस्था को सही नहीं किया गया, तो यह ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन एक बड़ी समस्या बन सकती है और इसमें 2050 तक 30 से 40 फीसदी की वृद्धि संभव है.
उत्पादन से भी हो रहा क्लाइमेट चेंज
खाने की बर्बादी भी क्लाइमेट चेंज का एक कारण है, लेकिन भोजन उत्पादन भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अहम भूमिका निभाता है. समय के साथ जनसंख्या वृद्धि और भोजन की पूर्ति की मांग बढ़ी है. लोगों के खाने का चक्र हर साल 21 से 37 प्रतिशत तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है. यानी, खाने का चक्र भी धरती को गर्म करने में एक अहम भूमिका निभा रहा है.
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की 2022 की एक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया गया है कि ग्लोबल फूड सिस्टम से होने वाला उत्सर्जन ही धरती को 1.5 डिग्री से अधिक तक गर्म करने के लिए काफी है. इस फूड सिस्टम में फसलों के उत्पादन से लेकर, परिवहन तक शामिल है. दुनिया भर के 780 करोड़ लोगों के खाने की व्यवस्था हर साल 21 से 37 प्रतिशत तक ग्रीन हाउस उत्सर्जन कर रही है.
असल में खेत और चारागाहों के लिए रास्ता बनाने के लिए पेड़ काटे जाते हैं. खेतों में ज्यादातर डीजल का उपयोग हो रहा है. खाद और केमिकल भी जमकर चल रहे हैं. इन्हीं सबसे ग्रीन हाउस गैस निकलती है.