गंगा की घाटी, मैदानी इलाकों और बाढ़ वाले क्षेत्रों में भविष्य ज्यादा ताकत वाले तूफान आएंगे. यही हाल मेकॉन्ग के इलाकों का भी होने वाला है. इन तूफानों की संख्या कम जरूर होगी. लेकिन ताकत नहीं. यह खुलासा हुआ है न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की स्टडी में. साल 2050 तक ऐसे तूफानों की ताकत बढ़ती चली जाएगी.
न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की टीम ने ट्रॉपिकल तूफानों का एक कंप्यूटर सिमुलेशन बनाया. वर्तमान मौसम, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के हिसाब से डेटा डाला. फिर पता चला कि 2050 तक ऐसे तूफानों की संख्या आधी हो जाएगी. लेकिन उनकी तीव्रता बहुत ज्यादा होगी. वो ज्यादा खतरनाक और ताकतवर होंगे.
जब वैज्ञानिकों ने हाई रेजोल्यूशन क्लाइमेट मॉडल्स की स्टडी की तो ये बात और पुख्ता हो गई. इसके बाद वैज्ञानिकों ने यह स्टडी जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स जर्नल में प्रकाशित कराया. सबसे ज्यादा ट्रॉपिकल तूफान यानी उष्णकटिबंधीय तूफानों का असर भारत, बांग्लादेश, चीन, म्यांमार, थाईलैंड और कंबोडिया में आएंगे.
भारत जैसे देशों का मौसम है बेहद संवेदनशील
इसकी वजह ये है कि इन देशों की जैव विविधता बहुत ज्यादा है. यहां का मौसम जलवायु परिवर्तन के लिए बेहद संवेदनशील है. इनमें से कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां पर मौसम बहुत बुरी हालत में है. जैसे चीन में आए तूफान की वजह से दक्षिणी इलाके में बाढ़. इसकी वजह से हर देश के मौसम बदलते हैं. देश की आर्थिक व्यवस्था और विकास को नुकसान होता है.
ज्यादा दिक्कत भारत के पूर्वी तटीय इलाकों को
अगर सच में कहीं पर बेहद तीव्र उष्णकटिबंधीय तूफान आता है, तो उसकी वजह से लोगों की जान जा सकती है. सामाजिक-आर्थिक नुकसान होता है. सबसे ज्यादा दिक्कत बांग्लादेश, वियतनाम और भारत के पूर्वी तट के इलाकों को होगा. न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे तूफानों के बदलाव को समझना होगा. जलवायु परिवर्तन की वजह से इन पर क्या असर हो रहा है, वो देखना होगा.
अटलांटिक बेसिन में भी ट्रॉपिकल तूफानों और साइक्लोन के आने की संख्या में कमी आने की संभावना है. लेकिन इससे जितने भी तूफान आएंगे, उनसे बारिश बहुत होगी. यही हालत मेकॉन्ग घाटी में होने वाली है. वहां पर तेज बारिश की वजह से मिट्टी की लेयर में बदलाव आएगा. इससे ग्राउंडवाटर लेवल और खेती की जमीन में बदलाव आएगा.