हमारी आकाशगंगा में लाखों-करोड़ों तारे हैं. उनकी स्टडी कर रहा है गाइया स्पेस टेलिस्कोप (Gaia Space Telescope). इसी टेलिस्कोप की मदद से जर्मनी के सबसे बड़े साइंटिफिक संस्थान मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोनॉमी ने आकाशगंगा का निर्माण करने वाले दो प्राचीन कणों को खोजा है. इन्हें नाम दिया है शिव और शक्ति.
नीले रंग के डॉट्स शिव हैं. पीले रंग के डॉट्स शक्ति है. इन दोनों कणों ने मिलकर ही हमारी आकाशगंगा यानी मिल्की वे को बनाया है. ये डॉट्स यानी कण असल में तारों की दो प्राचीन लहरें हैं. जिन्होंने मिलकर आकाशगंगा का निर्माण बिग बैंग से 200 करोड़ साल बाद किया. करीब 1200 करोड़ साल पहले.
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शिव और शक्ति यानी नीले और पीले डॉट्स वाले तारों की लहर इतनी पुरानी है, कि उसके बाद ही हमारी आकाशगंगा के घुमावदार हिस्से बने. इसके बाद ही आकाशगंगा ने स्पाइरल यानी घुमावदार आकार लिया. इसलिए जर्मनी के वैज्ञानिकों ने इन तारों की लहरों का नाम ब्रह्मांड की रचना करने वाले भगवान शिव और देवी शक्ति के नाम पर रखा दिया. इन दोनों ने ही मिलकर आकाशगंगा की नींव रखी, जिसमें आजकल हम लोग रहते हैं.
उम्मीद से ज्यादा बड़ी खोज कर ली गाइया टेलिस्कोप ने
मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोनॉमी की वैज्ञानिक ख्याति मल्हान ने कहा कि हमें खुशी है कि हम इतने प्राचीन कणों, तारों की बेल्ट को खोज पाए. इन तारों के पैदा होने के बाद से लगातार हमारी आकाशगंगा में बदलाव हो रहा है. हम इन्हें समूह में कभी खोज ही नहीं पाते. वो तो भला हो गाइया स्पेस टेलिस्कोप का, जिसने हमारी मदद की.
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गाइया से मिले डेटा की मदद से ही ख्याति और उनकी टीम ने इन तारों के समूह के ऑर्बिट की खोज की. उनके निर्माण के तत्व खोजे. उनकी गति और व्यवहार को समझा. क्योंकि इन दोनों तारों का समूह यानी नीले रंग के शिव और पीले रंग के शक्ति का निर्माण खास तरह के रसायनिक मिश्रण से हुआ है. इसलिए इनका नाम शिव-शक्ति रखा गया है.
हमारी आकाशगंगा के मजबूत धागे हैं शिव और शक्ति
ख्याति कहती हैं कि साल 2022 में गाइया ने आकाशगंगा के अंदरूनी हिस्सों की तस्वीर ली थी. तब पता चला था कि हमारी गैलेक्सी प्राचीन तारों से भरी पड़ी है. इसके बाद आकाशगंगा के प्राचीन तत्वों की खोज के दौरान इन तारों का पता चला. क्योंकि ये तारे दो लहरों में विभाजित थे. तारों के इन दोनों लहरों का अलग-अलग व्यवहार है. लेकिन इन दोनों ने मिलकर ही हमारी आकाशगंगा को बनाया है. इसके बाद नए तारे जुड़ते गए. आकाशगंगा घुमावदार होती चली गई.
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शिव और शक्ति प्रोटोगैलेक्टिक टुकड़े हैं, जो हमारी आकाशगंगा के दिल में हैं. दोनों की ऑर्बिट ट्रैजेक्ट्री समान है. हर लहर का द्रव्यमान (Mass) 1 करोड़ सूरज के बराबर है. ये सभी तारे 1200 से 1300 करोड़ वर्ष पुराने हैं. अपने पूरे जीवन में तारे अपने केंद्र में परमाणु फ्यूजन करते हैं. इससे वो हाइड्रोजन को हीलियम में बदलते हैं. इसके बाद हीलियम को फ्यूज ककरके और भारी तत्वों में बदलते हैं. ये ही बाद में धातु में बदल जाते हैं.
शिव और शक्ति तारे मिलकर चला रहे हैं आकाशगंगा का दिल
इन तारों का निर्माण उस समय हुआ था, जब ब्रह्मांड ज्यादातर हाइड्रोजन और हीलियम का समूह था. उस समय धातु की कमी थी. जब पहले तारों का बैच खत्म हुआ. तब सुपरनोवा बने. ये पूरे ब्रह्मांड में फैलते चले गए. दूसरी पीढ़ी के तारों में फिर धातुओं का मिश्रण शुरू हुआ. अंतरिक्ष में तारों के जन्म, मौत और फिर से जन्म की प्रक्रिया लगातार चलती रही. आज भी चल रही है.
लेकिन प्राचीन तारों ने ही यानी शिव-शक्ति ने, हमारी आकाशगंगा का दिल सुरक्षित, संतुलित और नियंत्रित रखा है. वह लगातार चल रहा है. शिव-शक्ति तारों में कई समानताएं हैं, लेकिन अंतर भी हैं. शक्ति तारों की लहर आकाशगंगा के दिल से दूर है. जबकि शिव तारे उसके नजदीक गोलाकार ऑर्बिट में घूमते हैं.