scorecardresearch
 

भारत, पाकिस्तान, चीन के 90 लाख लोगों पर मंडरा रहा है खतरा, हिमालय से आएगी आफतः स्टडी

ग्लेशियर के पिघलने और टूटने से बनने वाली झीलें एशिया और दक्षिणी अमेरिका के करोड़ों लोगों के लिए खतरा बन सकती हैं. इसमें भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन के लोगों को बहुत ज्यादा रिस्क है. इन इलाकों के पहाड़ों पर हजारों की संख्या में ग्लेशियल झीलें बनी हुई हैं. जो ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से टूटकर तबाही ला सकती हैं.

Advertisement
X
ये लाहौल-स्पिति में स्थित बड़ा शिगड़ी ग्लेशियर और उसके पास ही है छोटा शिगड़ी. दोनों बहुत तेजी से पिघल रहे हैं. (फोटोः गेटी)
ये लाहौल-स्पिति में स्थित बड़ा शिगड़ी ग्लेशियर और उसके पास ही है छोटा शिगड़ी. दोनों बहुत तेजी से पिघल रहे हैं. (फोटोः गेटी)

ग्लेशियर असल में क्या होते हैं. ये बर्फ की नदियां होती है, जो करोड़ों सालों में दब-दबकर जम-जमकर कठोर बर्फ में बदल जाती हैं. ये वादियों और घाटियों में धीरे-धीरे पिघलती रहती हैं. ताकि नदियां निकलती रहें. या फिर समुद्र में बड़ा रूप लेकर बड़े हिमखंडों में बदल जाती हैं. लेकिन लगातार बढ़ रहे तापमान की वजह से ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं. वैज्ञानिकों की स्टडी है कि इस सदी के अंत तक आधी दुनिया के करीब 21.5 लाख ग्लेशियर पिघल जाएंगे. 

Advertisement

यह स्टडी की है इंग्लैंड के न्यूकैसल यूनिवर्सिटी की नेचुरल हजार्ड रिसर्चर कैरोलिन टेलर और उनकी टीम ने. उनके अनुसार भारत, पाकिस्तान, चीन और पेरू में इन ग्लेशियरों से बनने वाली झीलों के फटने से करीब 1.50 करोड़ लोगों पर आफत आ सकती हैं. क्योंकि ये लोग इन ग्लेशियरों से बनी झील के डाउनस्ट्रीम में बसे हैं. अगर ग्लेशियल लेक फटा तो इन सभी लोगों को बड़े प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ेगा. 

हिमालय के काराकोरम में स्थित ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं. (फोटोः गेटी)
हिमालय के काराकोरम में स्थित ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं. (फोटोः गेटी) 

ग्लेशियर से बनी झीलों के फटने की प्रक्रिया को ग्लेशियल लेक आउटब्रस्ट फ्लड (GLOF) कहते हैं. ऐसी बाढ़ की रेंज कम से कम 120 किलोमीटर तक होती है. ज्यादा से ज्यादा केदारनाथ या चमोली जैसा हादसा दोहरा सकती हैं. सबसे ज्यादा खतरा भारत, पाकिस्तान और चीन को है. यह स्टडी हाल ही में Nature कम्यूनिकेशन जर्नल में प्रकाशित हुई है. स्टडी में बताया गया है कि दुनियाभर के ग्लेशियरों ने 2006 से 2016 के बीच 332 गीगाटन बर्फ खोया है.

Advertisement

साल 1990 से अब तक दुनियाभर के 50 फीसदी ग्लेशियर पिघल चुके हैं. भारत, पाकिस्तान और चीन के करीब 90 लाख लोग 2000 ग्लेशियर से बनी झीलों के निचले इलाके में रहते हैं. साल 2021 में चमोली हादसे में 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे. एल्प्स और उत्तरी अमेरिका के पहाड़ों की तुलना में एशियाई हिमालयी पहाड़ों के ग्लेशियल झीलों की स्टडी सही से नहीं होती. भारत में सबसे ज्यादा ढंग से अगर किसी ग्लेशियर की स्टडी की गई है तो वह है छोटा शिगड़ी. 

पिछले साल की गई स्टडी में दिखाया गया है कि कैसे हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. (फोटोः नेचर)
पिछले साल की गई स्टडी में दिखाया गया है कि कैसे हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. (फोटोः नेचर)

छोटा शिगड़ी ग्लेशियर के 20 साल का रिकॉर्ड मौजूद है. इस ग्लेशियर से साल 2022 बहुत ज्यादा बर्फ पिघली. यह साल 2002 से 2021 में पिघली बर्फ से तीन गुना ज्यादा थी. यानी साल 2022 भारत में काफी ज्यादा गर्म था. IIT Indore के ग्लेशियोलॉजिस्ट फारूक आजम ने बताया कि छोटा शिगड़ी पर जलवायु परिवर्तन का बहुत ज्यादा असर पड़ा है. यहां से आपदा तो आ ही सकती है साथ ही भविष्य में इस ग्लेशियर के नीचे रहने वाले लोगों को पानी की किल्लत का सामना भी करना पड़ सकता है.   

इससे पहले जुलाई 2022 में एक स्टडी आई थी जिसमें कहा गया था कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हिमालय के ग्लेशियर असाधारण गति से पिघल रहे हैं. यह गति इतनी ज्यादा हो गई है कि इससे भारत, नेपाल, चीन, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान समेत कई देश अगले कुछ सालों में पानी की भयानक किल्लत से जूझने वाले हैं. क्योंकि इन देशों की ज्यादातर नदियां तो हिमालय के ग्लेशियर से ही निकली हैं. चाहे वह गंगा, सिंध हो या फिर ब्रह्मपुत्र.  

Advertisement
Glacial Lake Outburst Flood
हिमालय पर लाल रंग से दिखाई गई हैं ग्लेशियर से बनी झीलें. (फोटोः नेचर)

वैज्ञानिकों ने स्टडी के दौरान देखा कि हिमालय के ग्लेशियर पिछले कुछ दशकों में 10 गुना ज्यादा गति से पिघले हैं. जबकि, छोटा हिमयुग यानी 400 से 700 साल पहले ग्लेशियरों के पिघलने की गति बेहद कम थी. पिछले कुछ दशकों में यह तेजी से बढ़ा है. इंग्लैंड में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के वैज्ञानिकों ने यह स्टडी की है. अब तक हिमालय के 14,798 ग्लेशियरों का अध्ययन किया. उनकी सतह, बर्फ का स्तर, मोटाई, चौड़ाई और पिघलने के दर की स्टडी की गई. 

वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी में पाया कि इन ग्लेशियरों ने अपना 40% हिस्सा खो दिया है. ये 28 हजार वर्ग किलोमीटर से घटकर 19,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर आ गए हैं. इस दौरान इन ग्लेशियरों ने 390 क्यूबिक किलोमीटर से 590 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ खोया है. इनके पिघलने की वजह से जो पानी निकला है, उससे पूरी दुनिया के समुद्री जलस्तर में 0.92 मिलीमीटर से 1.38 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई है. 

Advertisement
Advertisement