स्कूल ऑफ मेडिसिन, यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड की न्यूरोलॉजिस्ट डॉ लिजा एम शुल्मेन के मुताबिक दुख को हमारा मस्तिष्क उसी तरह लेता है, जैसे शरीर के साथ किसी बड़े हादसे को. जैसे बड़ी बीमारी या एक्सीडेंट में जख्मी होने के बाद शरीर तुरंत उसपर प्रतिक्रिया देता है, ठीक वैसे ही मानसिक तकलीफ में ब्रेन रिएक्ट करता है. ये एक तरह की सर्वाइवल रणनीति है, जो अनजाने ही हमारा दिमाग बनाता है.
फिजिकल ट्रॉमा की तरह ही होती है प्रतिक्रिया
डॉक्टर शुल्मेन के अनुसार हमारा मस्तिष्क इस तरह इवॉल्व हुआ है कि वो खुद को बचाए रखने के बारे में सोचे. ऐसे में किसी भी तरह की तकलीफ, चाहे वो मानसिक ही क्यों न हो, मस्तिष्क को ट्रिगर करती है, और वो इसे अपने खत्म होने के संकेत की तरह देखकर प्रतिक्रिया करने लगता है. ये बिल्कुल फिजिकल ट्रॉमा की तरह ही है.
ब्रेन के एमीग्डेला का इसमें सबसे बड़ा रोल
ये मस्तिष्क के सेंटर में हाइपोथैलेमस से सटी हुई सेल्स की एक जटिल संरचना है, जो इमोशन्स को कंट्रोल करती है, यादें भी इसी का हिस्सा हैं. जब कोई मानसिक ट्रॉमा मिलता है, ये हिस्सा एक्टिव होकर ढेर सारी मैमोरीज भेजने लगता है, जिससे शरीर हाई अलर्ट पर चला जाता है. सांसें और खून का प्रवाह तेज होना, बहुत ज्यादा पसीना आना और मांसपेशियों का एकदम से सिकुड़ या सख्त हो जाना इसका संकेत है.
एक्सट्रीम इमोशनल ट्रॉमा के दौरान ब्रेन का ये हिस्सा लगातार एक्टिव रहता है, कह सकते हैं कि एक तरह से ओवरटाइम करता है ताकि शख्स को झटके से उबार सके. दुख में रोना, खाना-पीना छोड़कर एक ही जगह अटक जाना एक तरह का साइकोलॉजिकल डिफेंस मेकेनिज्म है, जो तकलीफ पाने वाले को उससे बाहर निकाल रहा होता है.
कई बार तकलीफ में आए लोगों से उससे बाहर निकलने को कहा जाता है. इससे ग्रीफ की प्रक्रिया अधूरी छूट जाती है और एमिग्डेला फिर दोबारा कोई छोटी मुश्किल आने पर एक्टिव होकर पुराने दर्द को उभार देता है. इसलिए ही वैज्ञानिक दर्द को सही तरह से प्रोसेस करके फिर उससे बाहर निकलने को सही बताते हैं.
दिमाग में क्या बदलता है?
दुख के दौरान अच्छे-खासे मजबूत लगने वाले शख्स का भी जीने का ढंग बदल जाता है. इसे समझने के लिए कई स्टडीज हुईं. इसपर द ग्रीविंग ब्रेन- साइंस ऑफ हाऊ वी लर्न फ्रॉम लव एंड लॉस में न्यूरोलॉजिस्ट मेरी ओ'कोनोर ने कई सारे अध्ययनों का हवाला देते हुए बताया कि इस दौरान न्यूरॉन्स में क्या बदलाव आता है. इसके कुछ हिस्से जर्नल ऑफ साइकेट्रिक रिसर्च में भी प्रकाशित हुए.
ज्यादातर लोग हुए डिप्रेशन के शिकार
इसके लिए लगभग ढाई हजार ऐसे लोगों को चुना गया, जिन्होंने अपने साथी या बच्चे को खोया था. इनके ब्रेन की लगभग 18 सालों के दौरान कई बार स्कैनिंग हुई. इसमें पाया गया कि दुख के बाद उनके दिमाग में न्यूरॉन्स में सिकुड़न आने लगी. स्टडी में शामिल लगभग 68 प्रतिशत लोग माइल्ड, जबकि 7 प्रतिशत लोग क्रॉनिक डिप्रेशन के मरीज हो गए.
इस दौरान कॉमन ये दिखा कि दुख के तुरंत बाद ही लिम्बिक सिस्टम एक्टिव हो गया, जिससे एमीग्डेला सतर्क हो गया. इसका असर बाजू में स्थिति हाइपोथैलेमस पर भी पड़ता है, जो एक तरह का रिले स्टेशन है, जिससे सिग्नल निकलकर ब्रेन के सेरिब्रल कॉर्टेक्स तक पहुंचता है. कॉर्टेक्स एक तरह का इंफॉर्मेशन-प्रोसेसिंग सेंटर है. यही बताता है कि वो शख्स या हालात अब हमारे नहीं हैं.
किसी को खोने पर दुख की एक अवस्था ऐसी भी होती है, जो काफी लंबे समय तक चलती है. इसे प्रोलॉन्ड या कॉम्प्लिकेटेड ग्रीफ कहते हैं. दुख की इसी अवस्था में ब्रेन के न्यूरॉन्स पर इतना असर होता है कि वो कई मानसिक बीमारियों के लिए संवेदनशील हो जाता है, जैसे डिप्रेशन या फिर पर्सिंसन्स जैसी बीमारियां ऐसे लोगों को ज्यादा घेरती हैं, जो कॉम्प्लिकेटेड ग्रीफ से गुजर रहे हों.