बात 1857 की नहीं रही. जब बंदूक या रिवॉल्वर में कारतूस से बारूद, बॉल (धातु की गोलियां) डालते थे. उन्हें एक लंबे डंडे से ठूंस-ठूंस कर भरते थे. उनपर कैप लगाते थे. उसके बाद फायर करते थे. ऐसा सिर्फ एक राउंड वाली बंदूक या रिवॉल्वर में नहीं होता था. बल्कि रिवॉल्वर के छह के छह चैंबर में यही करना होता था. यानी काफी ज्यादा समय लगता था. लेकिन यह कहानी कुछ ही सालों में बदल गई... 1870 आते-आते चैंबर में धातु के कारतूस (Bullet Cartridges) ने अपनी जगह बना ली.
अब बंदूकों में कैप लगाने की जरूरत नहीं थी. बारूद ठूंसना नहीं था. अलग से धातु की गोलियां नहीं डालनी थीं. एक ही कारतूस में यह सब कुछ मौजूद था. यानी प्रोजेक्टाइल (गोली), प्रोपेलेंट (बारूद) और प्राइमर (एक्सप्लोसिव कैप). सब के सब एक ही धातु के सिलेंडरनुमा पैकेज में. आधुनिक रिवॉल्वर और भी अधिक सरल और सहज होते चले गए. उनको चलाना आसान हो गया. समय भी कम लगता था. किसी भी एंगल में चला सकते थे. पानी में, बर्फ में... कहीं भी चला सकते हैं.
कैसे निकलती है गोली इतनी रफ्तार से? (How Revolver Fires a Bullet)
रिवॉल्वर के छह गोलियों वाले चैंबर में गोलियां डालने के बाद उसे बंद कर दिया जाता है. चैंबर रोटेट होकर अपनी गोलियों को सीधे बैरल यानी रिवॉल्वर की नली के सामने लाती है. जिसके पीछे की तरफ स्प्रिंग से टाइट बंधी हुई हथौड़ी (Hammer) होती है. अब रिवॉल्वर की नली यानी बैरल, चैंबर के गोल खांचे में पड़ी गोली और उसके पीछे की हथौड़ी एक सीध में है. ट्रिगर जैसे ही खिंचता है, हथैड़ी भी खिंचने लगती है. लेकिन एक लिमिट तक आने के बाद ट्रिगर तो पीछे ही जाता है, लेकिन स्प्रिंग से जुड़ी हथौड़ी छूट जाती है... और चैंबर के खांचे में पड़ी कारतूस के बीचों-बीच बने प्राइमर पर हिट करती है.
प्राइमर विस्फोट के साथ फटता है, इससे गोली के अंदर मौजूद बारूद में आग लगती है. अब यह बात तो सबको पता है कि आग, हवा, पानी को फैलने के लिए जगह चाहिए होती है. चूंकि बैरल यानी रिवॉल्वर की नली तीन तरफ से बंद और एक तरफ से खुली होती है, तो आग और विस्फोट का दबाव गोली को उसी तरफ तेजी से निकालता है. वैसे तो गोलियों की गति बंदूकों की बनावट और बैरल की लंबाई पर निर्भर करती है. आमतौर पर गोली की औसत गति 2500 फीट प्रति सेकेंड होती है.
पर इतनी गति कैसे मिलती है गोली को (How Bullet Moves so Fast)
आपने कभी ध्यान दिया हो तो रिवॉल्वर, पिस्टल और ज्यादातर असॉल्ट राइफल्स की बैरल्स में अंदर घुमावदार धारियां बनी होती हैं. ये धारियां आग के दबाव से गोलियों को जोर से एक दिशा में धुमाना शुरु कर देती हैं. ज्यादा लंबी बैरल यानी गोली का ज्यादा घुमाव, ज्यादा गति और ज्यादा रेंज. इसलिए आप देखेंगे कि रिवॉल्वर-पिस्टल की रेंज अमूमन 50 से 100 मीटर होती है. असॉल्ट राइफल्स की 100 से 400 मीटर तक और स्नाइपर राइफल की 2-3 किलोमीटर तक. क्योंकि यहां पर बैरल की लंबाई बढ़ती चली जाती है.
पिस्टल का भी लगभग यही फॉर्मूला है (Pistol have almost same formula)
रिवॉल्वर की तुलना में पिस्टल ज्यादा आधुनिक और भरोसेमंद माने जाते हैं. लेकिन इससे भी गोलियों के निकलने का फॉर्मूला लगभग रिवॉल्वर जैसा होता है. बस इसमें गोलियों का चैंबर ग्रिप के अंदर मौजूद मैगजीन में होता है. जहां से एक स्प्रिंग को दबाकर गोलियां भरी जाती है. जैसे-जैसे गोलियां ऊपर से फायर होती हैं, वैसे-वैसे मैगजीन से गोली निकलकर बैरल और फायरिंग पिन के बीच में आकर सेट हो जाती है. बाकी वहीं, ट्रिगर दबाया...हैमर की स्प्रिंग खिंची, छूटी और बुलेट के प्राइमर पर सीधा हमला. बुलेट बंदूक से निकल कर सीधे निशाने पर.