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कैसे स्पर्म भ्रूण तक पहुंचाता है मैसेज, शोध से चला पता

स्तनधारियों (Mammals) के अध्ययन से पता चला है कि विभिन्न पर्यावरणीय प्रभावों की 'यादें' - जैसे आहार, वजन और तनाव, पिता से संतानों तक पहुंच सकती हैं. यह शोध चूहों पर किया गया है. इस शोध से गैर-डीएनए-आधारित साधन का पता चला है, जिसके ज़रिए स्पर्म, पिता के पर्यावरण को याद करते हैं और वह जानकारी भ्रूण तक पहुंचाते हैं. 

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स्तनधारियों में पर्यावरण की वजह से पड़ने वाले प्रभाव पिता से संतानों तक पहुंच सकते हैं (Photo: Getty)
स्तनधारियों में पर्यावरण की वजह से पड़ने वाले प्रभाव पिता से संतानों तक पहुंच सकते हैं (Photo: Getty)

स्तनधारियों (Mammals) में पर्यावरण की वजह से पड़ने वाले अलग-अलग प्रभावों की 'यादें'- जैसे आहार, वजन और तनाव, पिता से संतानों तक पहुंच सकती हैं. यह कैसे संभव है, यह हमें 2021 के एक शोध से पता चलता है. 

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इसका एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) से काफी लेना-देना है. अणु जो डीएनए (DNA) से जुड़े होते हैं, वे ऑन-ऑफ स्विच की तरह काम कर सकते हैं. डीएनए के किस सेक्शन का इस्तेमाल किया जाना है, उसे यही अणु नियंत्रित करते हैं. लेकिन 2021 तक, हमें यह नहीं पता था कि इनमें से कौनसे अणु में पिता के जीवन के अनुभवों वाली सेटिंग्स शामिल होती हैं, जो शुक्राणु (Sperm) के माध्यम से भ्रूण में पहुंचती हैं.

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डीएनए से जुड़े अणुओं के जरिए बच्चे तक पहुंता है संदेश (सांकेतिक तस्वीर: Getty)

मैकगिल यूनिवर्सिटी की एपिजेनेटिसिस्ट सारा किमिंस (Epigeneticist Sarah Kimmins) का कहना है कि इस शोध की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इससे एक गैर-डीएनए-आधारित साधन का पता चला है, जिसके ज़रिए स्पर्म, पिता के पर्यावरण (डाइट) को याद करते हैं और वह जानकारी भ्रूण तक पहुंचाते हैं. 

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चूहों पर शोध करते हुए, एपिजेनेटिसिस्ट एरियन लिसमर (Ariane Lismer) और उनके सहयोगियों ने बताया कि फोलेट की कमी वाले आहार के प्रभावों को स्पर्म में हिस्टोन (Histone) अणुओं में फेर-बदल कर आगे बढ़ाया जा सकता है. सीधे शब्दों में कहें तो हिस्टोन असल में मूल प्रोटीन होते हैं, जिनके चारों तरफ डीएनए घूमते हैं, ताकी वे उलझ न सकें.

स्तनधारियों में, जब पुरुष के शरीर में स्पर्म बनते हैं, तो सख्त पैकिंग के लिए वे ज्यादातर हिस्टोन स्पूल को बाहर निकाल देते हैं. लेकिन एक छोटा प्रतिशत अभी भी रह जाता है (चूहों में 1 प्रतिशत और मनुष्यों में 15 प्रतिशत), जो शुक्राणु निर्माण और कार्य, मेटाबोलिज़्म और भ्रूण विकास के लिए खास क्षेत्रों में डीएनए के लिए जगह देता है. इससे कोशिकीय तंत्र इन डीएनए निर्देशों का इस्तेमाल करते हैं.

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हिस्टोन असल में मूल प्रोटीन होते हैं, जिनके चारों तरफ डीएनए घूमते हैं (सांकेतिक तस्वीर: Getty)

इन हिस्टोन का रासायनिक संशोधन (मिथाइलेशन) या तो डीएनए को 'पढ़ने' की अनुमति देता है या उसे रोकता है, ताकि इसे प्रोटीन उत्पादों में बदला जा सके. खराब आहार की वजह से इन हिस्टोन का मिथाइलेशन स्टेटस बदल जाता है. यही वजह है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के लिए फोलेट अहम माना जाता है. एक मां का फोलेट बच्चे में डीएनए मिथाइलेशन को स्थिर करने में मदद करता है.

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डेवलपमेंटल सेल (Developmental Cell) में प्रकाशित हुए शोध के मुताबिक, चूहों को फोलेट की कमी वाला आहार खिलाया गया. शोधकर्ता नर के शुक्राणु और भ्रूण में हिस्टोन में हुए बदलावों को ट्रैक कर पा रहे थे. शोधकर्ताओं ने पाया कि भ्रूण में भी शुक्राणु के हिस्टोन में हुए परिवर्तन मौजूद थे.

 

टीम ने यह भी पाया कि ये प्रभाव संचयी हो सकते हैं और जन्म दोषों की गंभीरता को बढ़ा सकते हैं. दिलचस्प बात यह है कि चूहों में देखे गए जन्म दोष, जैसे जन्म के समय अविकसितता और रीढ़ की हड्डी की असामान्यताएं, फोलेट की कमी वाली मानव आबादी में भी अच्छी तरह से देखे जाते हैं.

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