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हमसे बिल्कुल अलग होगा अंतरिक्ष में जन्मा पहला बच्चा, सिर बड़ा और रंग पारदर्शी!

अंतरिक्ष में जन्मा बच्चा धरती के शिशुओं से काफी अलग होगा. इसकी वजह वहां गुरुत्वाकर्षण न होना और हर तरफ खतरनाक रेडिएशन है. आशंका है कि पेल्विक फ्लोर टूटने से जन्म देते ही मां की मौत हो जाए. वैज्ञानिक दूसरे जीवों पर प्रयोग करते हुए मान रहे हैं कि DNA में बदलाव ही स्पेस बेबी की कल्पना सच कर सके.

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स्पेस पर इंसानी जन्म के बारे में फिलहाल वैज्ञानिक भी प्रयोग के एकदम शुरुआती चरण में हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
स्पेस पर इंसानी जन्म के बारे में फिलहाल वैज्ञानिक भी प्रयोग के एकदम शुरुआती चरण में हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

काफी समय से वैज्ञानिक धरती के अलावा दूसरे ग्रहों पर भी जीवन की तलाश कर रहे हैं. एलन मस्क ने तो बाकायदा इसका ऐलान भी कर दिया कि वे साल 2050 मंगल पर इंसानी कॉलोनी बनाकर रहेंगे. नासा समेत कई और संस्थान भी इस पर बात करते रहे, लेकिन ये तभी मुमकिन होगा अगर स्पेस में इंसानी जन्म भी हो सके. तो क्या जीरो ग्रैविटी में शिशु जन्म संभव है! अगर ऐसा हो तो क्या मां सुरक्षित बच पाएगी, और क्या बिल्कुल अलग वातावरण और रेडिएशन से स्पेस बेबी एलियन की तरह दिखने लगेगा! जानिए, इन्हीं सवालों के जवाब. 

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अंतरिक्ष में इंसानी उपस्थिति बनी हुई है
साल 2000 लेकर अब तक अंतरिक्ष में लगातार इंसानी आवाजाही बनी हुई है. इस पूरे टाइम पीरियड में किसी न किसी देश का एक एस्ट्रोनॉट स्पेस में जरूर रहा. तो इतना तय हो चुका कि हमारा स्पेस में जाना उतना भी मुश्किल नहीं, लेकिन फिलहाल हम इस नतीजे के आसपास भी नहीं पहुंच सके हैं कि अंतरिक्ष में अगर बच्चे का जन्म हो तो कैसा होगा. या ऐसा हो भी सकता है, या नहीं. 

human baby on space
 स्पेस पर गुरुत्वाकर्षण का न होना प्रसव में सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

क्या मुश्किलें आएंगी
अंतरिक्ष में संबंध बनने पर महिला एस्ट्रोनॉट प्रेग्नेंट तो हो सकती है, लेकिन स्पेस का एक्सट्रीम वातावरण भ्रूण के साथ बड़ा खिलवाड़ कर सकता है, या ये भी हो सकता है कि जन्म के दौरान ही उसकी मौत हो जाए. नासा की आधिकारिक पॉलिसी इन्हीं वजहों को देखते हुए फिलहाल अंतरिक्ष में संबंध बनाने की इजाजत भी नहीं देती है. इसके बाद भी हम एक बार समझने की कोशिश करते हैं कि अगर महिला गर्भवती हुई तो क्या दिक्कतें आ सकती हैं. 

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चूहों पर किया प्रयोग
वैज्ञानिकों ने स्पेस प्रेग्नेंसी से पहले ये जांचने की कोशिश की कि वहां की रेडिएशन का स्पर्म पर क्या असर होता है. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन अपने साथ चूहों के फ्रीज-ड्रायड स्पर्म लेकर गया और 6 साल बाद वापस लाकर धरती पर उन्हें फर्टिलाइज कराया. कुल 168 चूहों के जन्म के बाद वैज्ञानिकों ने जांच की और पाया कि किसी पर भी रेडिएशन का कोई असर नहीं था. ये स्टडी बीते साल के आखिर में साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित हुई. इससे ये तय हो गया कि स्पेस पर कॉस्मिक रेज का असर चूहों पर तो नहीं हुआ, लेकिन इससे भी जन्म की संभावना नहीं बन जाती है. 

human baby on space
अंतरिक्ष में हड्डियां तेजी से कमजोर पड़ती हैं, ऐसे में डिलीवरी के दौरान हड्डियां टूटने का डर रहेगा. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

स्पेस में प्रेग्नेंसी हो भी जाए तो जीरो-ग्रैविटी सबसे ज्यादा मुश्किल देगी
अंतरिक्ष यात्रियों की बोन डेनसिटी तेजी से घटती है, यानी हड्डियां कमजोर पड़ती जाती हैं. ये प्रक्रिया इतनी तेज है कि अगर आप स्पेस में 6 महीने भी रहे तो 12 प्रतिशत तक बोन डेनसिटी खत्म हो जाएगी. ऐसे में प्रसव के दौरान पेल्विक फ्लोर पर दबाव बढ़ने से गर्भवती की हड्डियां चटखकर टूट सकती हैं या फिर आंतरिक रक्तस्त्राव हो सकता है. बता दें कि पेल्विक फ्लोर शरीर का वो हिस्सा है, जिसमें यूटरस, वजाइना, रेक्टम और ब्लैडर शामिल हैं. 

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इन बातों का पड़ेगा असर
मान लीजिए कि ये सब ठीक भी हो तो स्पेस बेबी धरती पर जन्मे इंसानों से अलग होगा, इसकी बहुत संभावना है. .जैसे गुरुत्वाकर्षण के बगैर विकास के कारण उसका शरीर अलग हो सकता है. खासकर उसका सिर बड़ा होगा, इसकी बहुत संभावना है. ये संभावना तब और बढ़ जाती है, जब स्पेस पर लगातार ह्यूमन बर्थ होने लगे क्योंकि तब वे मां की बर्थ कनाल के जरिए जन्म नहीं लेंगे, बल्कि सर्जरी से ही जन्म होगा. यहां समझ लें कि बिना गुरुत्वाकर्षण के सामान्य डिलीवरी संभव नहीं, ऐसे में शिशु बर्थ कनाल यानी मां के सर्विक्स, वल्वा से गुजरते हुए सामान्य तरीके से जन्म नहीं लेगा, बल्कि ऑपरेशन से ही जन्मेगा. 

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शिशु के सिर के आकार और त्वचा के रंग पर गहरा असर पड़ सकता है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

शिशु की त्वचा पर भी असर हो सकता है
धरती पर सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाव के लिए हमारे भीतर मेलेनिन बनता है, जिससे हमारा रंग गहरा या हल्का होता है. लेकिन स्पेस पर कॉस्मिक किरणों से बचाव के लिए गर्भवती को यान के भीतर रहना होगा. इससे होने वाले शिशु का रंग एकदम हल्का हो सकता है क्योंकि उसके भीतर मेलेनिन होगा ही नहीं. 

क्या DNA में बदलाव की जरूरत
ये भी हो सकता है कि स्पेस पर जन्मा शिशु धरती के बच्चों से इतना अलग हो कि पूरी तरह से एलियन दिखाई दे, यानी हमसे अलग. इसके बाद एक दिक्कत ये भी आएगी कि क्या वो धरती के वातावरण में जिंदा रह सकेगा. फिलहाल साइंटिस्ट इस दिशा में भी सोच रहे हैं कि स्पेस पर जन्म के लिए शायद हमें अपने DNA में बदलाव की जरूरत तक पड़ जाए. 

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पोलैंड के वैज्ञानिक इसपर रिसर्च भी शुरू कर चुके, जिसका पहला पेपर 'बायोलॉजिकल एंड सोशल चैलेंजेज ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन इन लॉन्ग टर्म मार्स बेस' नाम से साइंस डायरेक्ट जर्नल में छपा. स्टडी में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ आईटी एंड मैनेजमेंट के शोधकर्ता मानते हैं कि मंगल पर इंसानी बस्ती तभी संभव है, जब हमारे DNA भी उसके अनुकूल हो सकें ताकि हमपर रेडिएशन का कम से कम असर हो. दरअसल स्पेस रेडिएशन इतनी खतरनाक होती है कि ट्रेन्ड एस्ट्रोनॉट तक पूरी तरह से सेफ वातावरण में रहने के बाद भी असर से बच नहीं पाते. ऐसे में भ्रूण का सुरक्षित रहना और जन्म के बाद स्वस्थ रहना कम से कम अभी तो असंभव दिखता है. 

 

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