मॉनसून आ चुका है. दिल्ली के कई इलाके डूब चुके हैं. लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत अभी आना बाकी है. हर साल की तरह इस साल भी देश के हिमालयी राज्यों में फ्लैश फ्लड और बादल फटने की घटनाएं होंगी. भारतीय हिमालय का इलाका बेहद संवेदनशील है. जम्मू-कश्मीर, लेह-लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्वी राज्य.
इन सभी जगहों पर हर मॉनसून में किसी न किसी तरह की बड़ी आपदा आ ही जाती है. जून से लेकर सितंबर-अक्टूबर तक कहीं न कहीं कोई न कोई आपदा जरूर आती है. कुछ महीने पहले साइंटिफिक रिपोर्ट्स में एक रिसर्च स्टोरी प्रकाशित हुई, जिसमें उत्तराखंड के नैनीताल में फ्लैश फ्लड और पूरे राज्य में बादल फटने की घटनाओं की स्टडी की गई है.
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स्टडी में बताया गया है कि कैसे किसी इलाके की ऊंचाई, टोपोग्राफिकल स्केल और अन्य फैक्टर्स फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं को जन्म देते हैं. वैज्ञानिकों ने इसके लिए नैनीताल की स्टडी की है. इसमें बहुत सारी बातों का ध्यान रखा गया है जैसे- ऊंचाई, प्री-फ्लड पैरामीटर्स, भाप, बादलों की मोटाई, एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ आदि.
उत्तराखंड के नैनीताल में बदला है बारिश का पैटर्न
स्टडी में 17 से 10 अक्टूबर 2021 की फ्लैश फ्लड की घटनाओं पर डिटेल एनालिसिस है. इसकी वजह से इस इलाके में काफी जानमाल का नुकसान हुआ था. स्टडी में बताया गया है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से नैनीताल और उसके आसपास के इलाकों में बारिश का पैटर्न बदला है. मॉनसून के सीजन में जुलाई महीना छोड़कर अन्य सभी महीनों में फ्लैश फ्लड का खतरा बना रहता है. लेकिन यह एक इलाके की स्टडी है. सभी जगहों पर ऐसा हो, ये जरूरी नहीं.
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भारत का FFGS सिस्टम रखता है इस पर नजर
भारत का मौसम विभाग फ्लैश फ्लड की मॉनिटरिंग के लिए यूएस नेशनल वेदर सर्विस, यूएस हाइड्रोलॉजिक रिसर्च सेंटर, यूएसएड और ओएफडीए के साथ मिलकर काम कर रहा है. इन संस्थानों ने मिलकर फ्लैश फ्लड गाइडेंस सिस्टम (FFGS) लगा रखा है. यह सिस्टम अक्तूबर 2020 से काम कर रहा है.
FFGS हर 6 से 24 घंटे में फ्लैश फ्लड के खतरे वाले इलाके की चेतावनी देता है. इसकी निगरानी में भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका है. यह हिमालय के बड़े इलाके की स्टडी करता है. यह जानकारी पिछले साल लोकसभा में एक सवाल के जवाब में दी गई थी. इसमें यह भी बताया गया कि 2020 से 2022 तक किन राज्यों में किस तरह की बाढ़ आई.
2020 से 2022 तक इन राज्यों में आई बाढ़
सेंट्रल वाटर कमीशन ने बाढ़ को दो तरह से बांटा है. पहला सीवियर फ्लड और दूसरा एक्सट्रीम फ्लड. यानी इनमें बाढ़ की जानकारी दी गई है. आमतौर पर जो मैदानी इलाकों में आता है. साल 2020 में पूरे देश में 88 सीवियर फ्लड और 48 एक्सट्रीम फ्लड की घटनाएं दर्ज हुई थीं. 2021 में पूरे देश में 87 सीवियर फ्लड और 58 एक्स्ट्रीम फ्लड दर्ज किए गए.
2022 में 95 सीवियर फ्लड और 89 एक्सट्रीम फ्लड की घटनाएं दर्ज की गईं. आप साफ तौर पर देख सकते हैं कि मैदानी इलाकों में भी एक्सट्रीम फ्लड यानी चरम बाढ़ की घटनाएं हर साल बढ़ती चली गई हैं. इनमें उत्तराखंड में हर साल सीवियर और एक्सट्रीम फ्लड की घटनाएं हुईं हैं. असम और सिक्किम में भी भयानक बाढ़ आई थी.
मॉनसून में पहाड़ों पर बढ़ जाती हैं बादल फटने की घटनाएं
पहाड़ों पर सबसे बड़ी आपदा की वजह बादल का फटना और फ्लैश फ्लड ही होता है. क्योंकि आसमान से भारी मात्रा में पानी गिरता है. इसके बाद तेज पानी का बहाव तेजी से निचले इलाकों में तबाही ला देता है. हर साल दुनिया में 8 करोड़ से ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं. इसमें अपना देश भी है. कई खूबसूरत राज्य भी हैं.
भारतीय हिमालय में मॉनसून के सीजन में बादल फटने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. क्योंकि मॉनसून चाहे जब और जितनी भी गति से क्यों न आए. इसके स्वरूप को हिमालय बदल देता है. उदाहरण के तौर पर 2013 का केदारनाथ हादसा है. बादल पहाड़ों को पार नहीं कर पाए और चोराबारी ग्लेशियर के ऊपर फट पड़े. नतीजा क्या हुआ ये आप सभी को पता है.
उत्तराखंड में 54 साल में लगभग हर साल बड़े हादसे हुए हैं
बादल फटने के बाद फ्लैश फ्लड, ग्लेशियर टूटने की घटना, भूस्खलन, हिमस्खलन जैसी घटनाएं आम हैं. यह निर्भर करता है कि बादल किस इलाके में फटा है. फ्लैश फ्लड की वजह से जानमान का काफी ज्यादा नुकसान होता है. 7 फरवरी 2021 को नंदा देवी ग्लेशियर का हिस्सा टूटा. जिसकी वजह से चमोली जिले में फ्लैश फ्लड आया. 15 लोग मारे गए. 150 लोग लापता हो गए.
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हिमालय का उत्तराखंड का इलाका बेहद संवेदनशील है. यहां पर 1970, 1986, 1991, 1998, 2001, 2002, 2004, 2005, 2008, 2009, 2010, 2012, 2013, 2016, 2017, 2019, 2020, और 2021 में हर साल प्राकृतिक आपदाएं आई हैं. इसके पीछे एक वजह है पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता. जो इंसानों द्वारा किए जा रहे जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर आपदाओं को बुलाता है.
उत्तराखंड ही क्यों हर बार होता है शिकार ऐसे हादसों का?
औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक हिमालय और तिब्बत के पठारों का तापमान 1951 से 2014 तक 0.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. जो अब 2000 से 2014 के बीच बढ़कर 0.5 डिग्री सेल्सियस हो गया. यानी तापमान बढ़ तो रहा है. लेकिन बीच-बीच में इसमें काफी ज्यादा तेजी आ जाती है. जिसकी वजह से आपदाएं ज्यादा आ रही हैं. वो भी चरम प्रकृति की आपदाएं. इस साल तो अल-नीनो ने गर्मी बढ़ाई है. ज्यादा आपदा की आशंका है.
उत्तराखंड 174 मीटर की ऊंचाई से लेकर 7409 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों का राज्य है. इसका 93 फीसदी इलाका हिमालय के पहाड़ों का है. जिसमें 64 फीसदी हिस्सा जंगल है. इसकी सीमाएं हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, चीन और नेपाल से जुड़ता है. यहीं से छह बड़ी नदियों के बेसिन की शुरुआत होती है. ये हैं- यमुना, अलकनंदा, गंगा, काली, भागीरथी और रामगंगा.
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बादलों के फटने की वजह है ऊंचाई और मौसम
उत्तराखंड में 3000 मीटर की ऊंचाई पर बारिश के बाद बर्फ जम जाती है. यहीं से बर्फबारी की शुरुआत होती है. मार्च और अप्रैल में तापमान अधिकतम तापमान 34 से 38 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. मई जून में यह बढ़कर 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. सितंबर के बाद तेजी से पारा नीचे गिरना शुरू होता है.
उत्तराखंड में अगर बादलों के फटने की घटना देखें तो 2020 से 2021 के बीच मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ों पर ही ज्यादा बादल फटे हैं. यानी 1000 मीटर से 2500 मीटर की ऊंचाई तक. कम या ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में बादल फटने की घटनाएं कम होती हैं. यानी पहाड़ों की ऊंचाई और बादलों के फटने का आपसी संबंध है.
2020 से 21 के बीच उत्तराखंड में 30 बार बादल फटे. 17 घटनाएं 2021 में हुई. सबसे ज्यादा बादल फटने की घटना उत्तरकाशी (07), फिर चमोली में पांच, देहरादून और पिथौरागढ़ में चार-चार घटनाएं. रुद्रप्रयाग में तीन और टिहरी, अल्मोड़ा और बागेश्वर में एक-एक घटनाएं हुईं. ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में बादल फटने की वजह से फ्लैश फ्लड की घटनाएं भी ज्यादा हुईं.