ISRO ने चांद के चारों तरफ Chandrayaan-3 के सभी ऑर्बिट पूरे कर लिए हैं. आखिरी वाला ऑर्बिट मैन्यूवर 16 अगस्त 2023 को किया गया. चंद्रयान-3 अभी 153 km x 163 km की ऑर्बिट में है. जब लॉन्चिंग हुई थी, उसके बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसरो प्रमुख डॉ. एस. सोमनाथ ने कहा था कि चंद्रयान-3 को 100 किलोमीटर वाली गोलाकार ऑर्बिट में लाएंगे. उसके बाद प्रोपल्शन और विक्रम लैंडर मॉड्यूल अलग होंगे.
लेकिन इस बार ऐसा होता दिख नहीं रहा है. 2019 में चंद्रयान-2 के समय भी 100 किलोमीटर की गोलाकार ऑर्बिट की बात हुई थी. प्लानिंग भी थी. लेकिन लैंडिंग से पहले चंद्रयान-2 की आखिरी ऑर्बिट 119 km x 127 km थी. यानी प्लानिंग के हिसाब से थोड़ा ही अंतर था.
जहां तक बात रही Chandrayaan-3 की, तो इसरो के एक सीनियर साइंटिस्ट ने बताया कि चंद्रयान को 100 या 150 किलोमीटर की गोलाकार ऑर्बिट में डालने की प्लानिंग थी. अब भी है. यह फैसला हाल ही में लिया गया है. इसलिए 16 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 ने जो ऑर्बिट अचीव किया है, यह उसी फैसले का नतीजा था. अब इसके बाद लैंडिंग में सिर्फ छह दिन बचेंगे.
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आज ISRO दोपहर में करीब 1 बजे प्रोपल्शन और लैंडर मॉड्यूल को अलग करने का ऑपरेशन पूरा करेगा. लेकिन इसके बाद विक्रम लैंडर (Vikram Lander) गोलाकार ऑर्बिट में नहीं घूमेगा. वह फिर से अंडाकार ऑर्बिट में ही घूमेगा. इसके बाद 18 और 20 अगस्त को होने वाले डीऑर्बिटिंग के जरिए विक्रम लैंडर को 30 किलोमीटर वाले पेरील्यून और 100 किलोमीटर वाले एपोल्यून ऑर्बिट में डाला जाएगा.
पेरील्यून यानी चांद की सतह से कम दूरी. एपोल्यून यानी चांद की सतह से ज्यादा दूरी. यह प्लान के हिसाब से है. लेकिन फ्यूल, चंद्रमा के वायुमंडल, गति आदि के आधार पर इस ऑर्बिट में मामूली अंतर हो सकता है. इससे पूरे मिशन पर कोई फर्क नहीं पड़ता. हालांकि, एक बार जब 30 km x 100 km की ऑर्बिट मिल जाती है. तब इसरो के लिए सबसे कठिन चरण शुरु होगा. यानी सॉफ्ट लैंडिंग (Soft Landing).
30 km की दूरी पर आने के बाद विक्रम लैंडर की गति को कम किया जाएगा. चंद्रयान-3 को धीमे-धीमे चांद की सतह पर उतारा जाएगा. यह सबसे जटिल और कठिन चरण होगा. जब तक इसरो आगे की प्लानिंग को लेकर कोई बयान नहीं देता है, तब तक आज के मॉड्यूल सेपरेशन पर ध्यान देते हैं.