भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन 10 फरवरी 2023 को स्मॉल स्टैलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) लॉन्च करने जा रहा है. इसमें अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट EOS-07 भेजा जा रहा है. इससे पहले पिछली साल 7 अगस्त को इसी रॉकेट से दो सैटेलाइट छोड़े गए थे. ये थे EOS-02 और AzaadiSAT थे. लेकिन आखिरी स्टेज में एक्सेलेरोमीटर में गड़बड़ी होने की वजह से दोनों गलत ऑर्बिट में पहुंच गए थे. लेकिन पहली बार इस रॉकेट की लॉन्चिंग सफल थी.
एसएसएलवी रॉकेट में मुख्य सैटेलाइट 334 किलोग्राम वजनी EOS-07 होगा. इसके साथ दो और छोटे सैटेलाइट्स जा रहे हैं. हालांकि उनकी डिटेल्स इसरो ने शेयर नहीं की है. पिछले लॉन्च में हुई गड़बड़ी को लेकर इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ ने कहा था कि सिर्फ दो सेकेंड की गड़बड़ी की वजह से रॉकेट ने अपने साथ ले गए सैटेलाइट्स को 356 किलोमीटर वाली गोलाकार ऑर्बिट के बजाय 356x76 किलोमीटर के अंडाकार ऑर्बिट में डाल दिया था.
एसएसएलवी का इस्तेमाल छोटे सैटेलाइट्स की लॉन्चिंग के लिए होता है. यह एक स्मॉल-लिफ्ट लॉन्च व्हीकल है. इसके जरिए धरती की निचली कक्षा में 500 KG तक के सैटेलाइट्स को निचली कक्षा यानी 500 किलोमीटर से नीचे या फिर 300 किलोग्राम के सैटेलाइट्स को सन सिंक्रोनस ऑर्बिट में भेज सकते हैं. इस ऑर्बिट की ऊंचाई 500 KM के ऊपर होती है.
जब PSLV था तो SSLV की जरुरत क्यों पड़ी?
PSLV यानी पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल 44 मीटर लंबा और 2.8 मीटर वाले व्यास का रॉकेट हैं. जबकि, SSLV की लंबाई 34 मीटर है. इसका व्यास 2 मीटर है. पीएसएलवी में चार स्टेज हैं. जबकि एसएसएलवी में तीन ही स्टेज है. पीएसएलवी का वजन 320 टन है. SSLV का 120 टन है. पीएसएलवी 1750 किलोग्राम वजन के पेलोड को 600 किलोमीटर तक पहुंचा सकता है. एसएसएलवी 10 से 500 किलो के पेलोड्स को 500 किलोमीटर तक पहुंचा सकता है. पीएसएलवी 60 दिन में तैयार होता है. एसएसएलवी सिर्फ 72 घंटे में तैयार हो जाता है.
SSLV के लिए बन रहा है अलग स्पेस पोर्ट
फिलहाल SSLV को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर के लॉन्च पैड एक से छोड़ा जाएगा. लेकिन कुछ समय बाद यहां पर इस रॉकेट की लॉन्चिंग के लिए अलग से स्मॉल सैटेलाइल लॉन्च कॉम्प्लेक्स (SSLC) बना दिया जाएगा. इसके बाद तमिलनाडु के कुलाशेखरापट्नम में नया स्पेस पोर्ट बन रहा है. फिर वहां से एसएसएलवी की लॉन्चिंग होगी.
जानिए एसएसएलवी के तीन स्टेजेस के बारे में
स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) की लंबाई 34 मीटर यानी 112 फीट है. इसका व्यास 6.7 फीट है. कुल वजन 120 टन है. यह PSLV रॉकेट से आकार में काफी छोटा है. इसके तीन स्टेज सॉलिड फ्यूल से चलेंगे. पहला स्टेज 94.3 सेकेंड, दूसरा स्टेज 113.1 सेकेंड और तीसरा स्टेज 106.9 सेकेंड जलेगा.
क्यों पड़ी एसएसएलवी रॉकेट की जरुरत
SSLV की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि छोटे सैटेलाइट्स को लॉन्च करने के लिए पीएसएलवी के बनने का इंतजार करना पड़ता था. वो महंगा भी पड़ता था. उन्हें बड़े सैटेलाइट्स के साथ असेंबल करके भेजना होता था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छोटे सैटेलाइट्स काफी ज्यादा मात्रा में आ रहे हैं. उनकी लॉन्चिंग का बाजार बढ़ रहा है. इसलिए ISRO ने इस रॉकेट को बनाने की तैयारी की.
एसएसएलवी रॉकेट की लॉन्चिंग भी सस्ती है
SSLV रॉकेट के एक यूनिट पर 30 करोड़ रुपये का खर्च आएगा. जबकि PSLV पर 130 से 200 करोड़ रुपये आता है. यानी जितने में एक पीएसएलवी रॉकेट जाता था. अब उतनी कीमत में चार से पांच SSLV लॉन्च हो जाएंगे. इससे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट अंतरिक्ष में छोड़े जा सकेंगे.