जापान (Japan) में करीब आधी सदी से मछुआरे, कत्सुओ (Katsuo) या स्किपजैक टूना (Skipjack tuna) मछली पकड़ रहे हैं. ये मछली जापानी खाने की जान होती है. चाहे उसे कच्चा खाया जाए या सुखाकर, खाने में इसका होना ज़रूरी है. लेकिन दक्षिण पश्चिम जापान के कोच्चि (Kochi) प्रान्त के कुरे (Kure) शहर में मछुआरों ने पिछले दो सालों में कुछ ऐसा देखा है, जिसने उनकी चिंता बढ़ा दी है. यहां असामान्य रूप से फैटी या वसायुक्त कत्सुओ मछली की संख्या बढ़ गई है.
कत्सुओ मछली का भारी होना मतलब पैसा ज्यादा होना भी है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह जलवायु परिवर्तन (Climate change) की तरफ इशारा करता है. बढ़ती मांग और ज्यादा मछली पकड़ने की वजह से इस मछली को खतरा पैदा हो गया है.
कोच्चि शहर के एक बेहद पुराने रेस्त्रां के शेफ नोरियाकी इटो (Noriaki Ito) का भी कहना है कि उन्होंने इससे पहले कभी इस तरह के फैटी कत्सुओ नहीं देखी थी. यह चिंताजनक है, क्योंकि समुद्र में हो रहे बदलाव और जलवायु परिवर्तन ने पहले ही चंबारा-गाई नामक की एक शेलफिश समेत कई मछलियों का सफाया कर दिया है, जो कोच्चि की खासियत हुआ करती थी.
बढ़ते तापमान ने बढ़ाया खतरा
कोच्चि की आर्क के आकार की खाड़ी, मछली पकड़ने की उपजाऊ जगह है. स्थानीय मत्स्य प्रयोगशाला डेटा के मुताबिक, सर्दियों में खाड़ी की सतह का औसत तापमान पिछले चार दशकों से 2015 तक, 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. हो सकता है कि गर्म समुद्र में पर्याप्त शिकार होने की वजह से कत्सुओ मोटी हो गई हों.
कोच्चि यूनिवर्सिटी के उपाध्यक्ष और कृषि वैज्ञानिक, हिरोयुकी उकेडा (Hiroyuki Ukeda) का कहना है कि लंबे समय तक, यह वार्मिंग खनिज युक्त पानी को सतह पर बढ़ने से रोक सकती है. इसका नतीजा यह होगा कि कत्सुओ जिन प्लवकों और छोटी मछलियों को खाती हैं, वे कम हो जाएंगी और कत्सुओ की संख्या भी घट जाएगी.
फिशिंग से जुड़े जापान के पुराने लोग डरने लगे हैं, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनका व्यवसाय खत्म हो जाएगा. कुरे में, पिछले तीन दशकों में कई मछुआरे व्यवसाय छोड़ चुके हैं. यहां के मछुआरों को डर है कि यह जगह जापान के आखिरी समुदायों में से एक हो सकती है, जहां कत्सुओ दैनिक संस्कृति का हिस्सा रही हो.
सुशी कल्चर पर भी खतरा
ओवरफिशिंग ने मछुआरों को प्रभावित किया है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि कोच्चि में मछली पकड़ने की संख्या, 1980 के दशक के उच्चतम स्तर की केवल एक चौथाई है. मछुआरों का कहना है कि उन्होंने पिछले 10 सालों में लैंडिंग में विनाशकारी गिरावट देखी है. ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो ये कह रहे हैं कि अगर चीजें इसी तरह जारी रहीं तो वे आने वाले समय में कत्सुओ नहीं खा पाएंगे.
For half a century, Takeo Nakajo has been catching katsuo, or skipjack tuna - indispensable in Japanese cuisine whether eaten raw, dried or used as a base for the broth. https://t.co/2n2hrZTlJl
— Reuters Science News (@ReutersScience) July 12, 2022
वसाबी (Wasabi) जो खास तौर पर साशिमी और सुशी के लिए जरूरी है, वह भी उत्पादन में इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है. जाहिर है जलवायु परिवर्तन की वजह से अगर ये मछली खत्म हो गई, तो जापानी खाने में भी कत्सुओ दिखाई नहीं देगी.