करीब 25 हजार साल पहले धरती से कुछ ऐसे जीव खत्म होने लगे थे, जिन्हें जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज का कोई आइडिया नहीं था. ये जीव कोई और नहीं हाथियों के दादा-नाना थे. यानी मैमथ (Mammoth).
हिमयुग के समय मैमथ पूरी धरती पर राज करते थे. आर्कटिक के बड़े इलाके में घास के मैदान थे, जहां पर कई प्रकार के जीव-जंतु रहते थे. जो आज अफ्रीका के सवाना में मिलते हैं. लेकिन नई स्टडी में पता चला है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से मैमथ खत्म हो गए. इनके साथ बालों वाले गैंडे भी मारे गए. जो इबेरिया से पूर्वी साइबेरिया और बेरिंग स्ट्रेट अलास्का से कनाडा तक रहते थे.
अब मैमथ के मैदान (Mammoth Steppe) बचे नहीं हैं. पूरे ग्रह से गायब हो गए. यानी वो स्थान जहां मैमथ आराम से रहते थे. उनके रहने के लिए सारी जरूरी चीजें थी. वैज्ञानिकों ने प्राचीन जीवों और पौधों के डीएनए का अध्ययन किया. ये डीएनए उन्होंने आर्कटिक की मिट्टी से निकाली है. जो करीब 50 हजार साल पुराने हैं. इनसे लापता हो चुके पारिस्थितिक तंत्र यानी इकोसिस्टम का पता चलेगा. यह रिपोर्ट हाल ही में Nature जर्नल में प्रकाशित हुई है.
मैमथ के साथ 1541 पौधों के डीएनए की भी जांच हुई
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के बायोजियोसाइंटिस्ट मार्क माकियास-फॉरिया ने कहा कि सेडिमेंट से लिए गया डीएनए बहुत खुलासे करने वाला है. मार्क इस स्टडी में शामिल नहीं है लेकिन वो इन चीजों के एक्सपर्ट हैं. मार्क ने बताया कि इन डीएनए से हम प्राचीन जीव-जंतुओं के बारे कई जानकारियां हासिल कर सकते हैं. हिमयुग में कैसे और कौन से जीव मारे गए. उनकी प्रजातियां कैसे खत्म हुईं. चाहे वह पेड़ हो या जानवर.
नॉर्वे स्थित ऑर्कटिक यूनिवर्सिटी के ऑर्कटिक बॉटैनिस्ट इंगर ग्रीव अलसोस ने कहा कि वैज्ञानिकों ने 20 सालों से जमा किए अलग-अलग डीएनए की जांच की. उनके सिक्वेंस को एक क्रम में रखने का प्रयास किया. जिससे पता चला कि उनके पास 14 लाख से ज्यादा जीनोम जमा हो गया है. वह भी हिमयुग के समय का. यानी वो जीव जो 25 से 50 हजार साल पहले आर्कटिक और उसके आसपास रहते थे. इस नए डेटा में 1541 प्राचीन पौधों के डीएनए भी हैं.
इंसान बढ़ते गए, अन्य जीव शिफ्ट होते चले गए
इन डेटा के साथ वैज्ञानिकों ने प्राचीन समय के मौसम का कंप्यूटर मॉडल बनाया. फिर जीवों को उस समय के हिसाब से बांटा गया. इंसानों के पूर्वजों को भी धरती पर मार्क किया गया. जब उसमें जलवायु परिवर्तन के फैक्टर डाले गए तो दिखा कि इंसान धीरे-धीरे उत्तर की तरफ बढ़ते गए. इससे जानवर और पौधों की प्रजातियां शिफ्ट होती चली गईं. जो शिफ्ट नहीं हो पाई वो धीरे-धीरे खत्म होने लगी. आर्कटिक इलाके के आसपास मौजूद हरियाली क्लाइमेट चेंज की वजह से गायब होने लगी.
यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के पैलियोइकोलॉजिस्ट यूचेंग वांग ने बताया कि जब उस समय जलवायु गर्म हो रहा था, तब कई इलाकों में हरियाली खुद को बदल रही थी. उदाहरण के तौर पर उत्तर अटलांटिक में समुद्री पौधे तेजी से बढ़ रहे थे. वहीं, मध्य साइबेरिया में मैदानी इलाकों में मौजूद पेड़-पौधों में कोई खास परिवर्तन नहीं आ रहा था. सिवाय इसके वो शिफ्ट होने के प्रयास में थे.
प्राचीन क्लाइमेट चेंज की वजह भी इंसान ही थे
जब वैज्ञानिकों ने आर्कटिक डीएनए की जांच की तो पता चला कि उसमें से मैमथ (Mammoth) का डीएनए लापता है. यानी वो या तो खत्म हो चुके थे या उस इलाके से दूर चले गए थे. इससे पता चलता है कि उस समय होलोसीन (Holocene) की स्थिति बन गई थी. जिसकी वजह से ढेर सारे झील, दलदली इलाके और जंगल तेजी से मैदानी इलाकों को खा रहे थे. जिसकी वजह से बड़े शाकाहारी जीव जैसे मैमथ को उपयुक्त रहवास नहीं मिल रहा था. इसलिए घर नहीं मिलने की वजह से इनकी प्रजाति विलुप्त हो गई.
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से नहीं बल्कि मैमथ की मौत ज्यादा शिकार की वजह से हुई है. क्योंकि हिमयुग के इंसान झुंड बनाकर मैमथ को मारते थे. उसके अंगों को पकाकर खाते थे. उसकी खाल निकालकर उससे कपड़े और गर्म बिस्तर की तरह उपयोग करते थे. हैरानी की बात ये है कि वैज्ञानिकों ने जो डीएनए जमा किए, उनमें इंसानों के डीएनए शामिल नहीं है.
eDNA allowed scientists to discover a reason for woolly mammoth extinction during the last Ice Age: climate change.https://t.co/vUHzeogPS8
— AGU's Eos (@AGU_Eos) November 22, 2021
मैमथ (Mammoth) साइबेरिया में करीब 4000 साल पहले तक जीवित थे. इसके बाद मैमथ धरती पर कभी नहीं देखे गए. लेकिन इस स्टडी में यह बताया गया है कि इंसानों के पूर्वज हाथियों के दादा-नाना के साथ रहते थे. जरूरत पड़ने पर उनका शिकार भी करते थे. कई बार मैमथ के हमले में मारे भी जाते थे. लेकिन इंसानों ने उनका शिकार हमेशा नहीं किया. हजारों सालों तक ये इंसान और मैमथ एक साथ रहे बिना किसी को नुकसान पहुंचाएं.