जॉर्जिया के टाइबी आइलैंड के आसपास रेडियोएक्टिविटी ज्यादा थी. 1958 में हुए हादसे के करीब 40 साल बाद रिटायर्ड एयर फोर्स ऑफिसर स्टीफन श्वार्टज ने इस परमाणु बम की खोजबीन शुरू की. अपनी बुक में लिखा भी वह बम शीत युद्ध की निशानी थी. किताब का ना था एटॉमिक ऑडिटः द कोस्ट एंड कॉन्सीक्वेंसेज ऑफ यूएस न्यूक्लियर वेपंस सिंस 1940.
अब कहानी ये है कि 5 फरवरी 1958 में ट्रेनिंग के दौरान दो अमेरिकी वायुसेना के विमान टकरा गए. उनमें से एक बमवर्षक था. वो भी बी-47 बमवर्षक. उस समय ट्रेनिंग मिशन में भी विमानों को पूरी तरह से हथियारों से लोड रखा जाता था. बमों को विमान में लगा कर रखा जाता था. ट्रेनिंग का मकसद था परमाणु बमों को किस तरह से गिराना है, उसकी ट्रेनिंग देना.
अमेरिकी एयरफोर्स के विमान अमेरिका के विभिन्न शहरों और कस्बों के ऊपर ही उड़ान भरते थे. अब हुआ यूं कि मेजर होवार्ड रिचर्डसन B-47 बॉम्बर उड़ा रहे थे. उनका मिशन पूरा हो चुका था. तभी दूसरा फाइटर जेट F-86, जो कि एक इंटरसेप्टर था, उसे लेफ्टिनेंट क्लेरेंस स्टीवर्ट उड़ा रहे थे. स्टीवर्ट के राडार ने B-47 बॉम्बर को पकड़ा नहीं.
इसलिए जरुरी था बम को समुद्र में गिराना
इसके बाद क्लेरेंस स्टीवर्ट अपने फाइटर जेट को लेकर बॉम्बर से टकरा गए. स्टीवर्ट जेट से इजेक्ट कर गए. लेकिन ठंड की वजह से उन्हें फ्रॉस्टबाइट हो गया. जबकि रिचर्डसन यह समझ गए थे कि परमाणु बम जितना वजन लेकर वह एयरफोर्स बेस के निर्माणाधीन रनवे पर उतर नहीं पाएंगे. इसलिए पहले वह समुद्र की तरफ गए.
रिचर्डसन ने 7200 फीट से परमाणु बम को समुद्र में गिरा दिया. फिर सुरक्षित लैंड कर गए. किसी भी प्लेन के क्रू मेंबर ने इस घटना के बाद कोई विस्फोट नहीं सुना. रिचर्डसन ने 2004 में सीबीएस न्यूज को यह बताया था कि उन्हें बम गिराने का दुख था. लेकिन उनके पास कोई चारा नहीं था. नहीं गिराते तो पूरा एयरबेस और शहर बर्बाद हो जाता.
100 नौसैनिक गोताखोरों ने 2 महीने की खोज
अमेरिकी नौसेना के 100 गोताखोरों ने दो महीने तक हैंडहेल्ड सोनार लेकर परमाणु बम की खोज की लेकिन वह नहीं मिला. 16 अप्रैल 1958 को अमेरिकी सेना ने घोषणा की यह बम लापता हो चुका है. अब नहीं मिलेगा. एयफोर्स ने जवाब दिया कि बम पूरी तरह से असेंबल नहीं था. इसलिए किसी तरह के विस्फोट या रेडियोएक्टिविटी की आशंका नहीं है.
इस घटना के बाद ही न्यूक्लियर बमों को सील्ड किया जाने लगा. प्लूटोनियम को बम से अलग रखा जाने लगा. ये दोनों जब मिलाए जाते थे. तभी खतरनाक होते थे. तभी वो पूरा न्यूक्लियर चेन रिएक्शन पूरा करते थे. फिर बाद आती है साल 2000 की. पूर्व एयरफोर्स ऑफिसर डेरेक ड्यूक ने जॉर्जिया के सांसद जैक किंग्सटन से संपर्क किया.
इतने प्रकार का खतरा था उस बम को निकालने में
किंग्सटन ने कहा कि एयरफोर्स अगर बम खोजना चाहता है, तो खोज ले. लेकिन इसमें 50 लाख डॉलर्स का खर्च आएगा. फिर ये भी पुख्ता नहीं है कि वह बम मिलेगा या नहीं. ये भी चांस है कि उसे छूते ही वह फट पड़े. इतने सालों में बम में जंग लग गई होगी. उसके अंदर रखा परमाणु हथियार रेडिएशन फेंक रहा होगा. ऐसे में उसके पास जाना खतरनाक है. लेकिन एक्सपर्ट बोले ऐसा कुछ नहीं होगा.
साल 2001 में एयरफोर्स ने बताया कि 7600 पाउंड (3447 KG) वजन के बम में 400 पाउंड (181 KG) पारंपरिक हथियार है. डेरेक ड्यूक माने नहीं. उन्होंने 2004 में इस बम को खोजना शुरू किया. उनके यंत्रों ने टाइबी आइलैंड के पास समुद्र में रेडिएशन का लेवल बहुत ज्यादा पाया. लेकिन एयरफोर्स की जांच में पता चला कि वह रेडिएशन प्राकृतिक रूप से मौजूद खनिज की वजह से आ रहा है. ये वॉसा साउंड एरिया है.
एक दशक बाद 2015 में एक अन्य नागरिक को विचित्र सोनार रीडिंग्स दिखाई पड़ी. न्यूक्लियर इमरजेंसी सपोर्ट टीम ने कहा कि हम जांच करेंगे. ऑपरेशन स्लीपिंग डॉग चलाया गया. मिलिट्री के गोताखोर समुद्र में फिर उतरे लेकिन 12 फीट लंबे बम को खोज नहीं पाए. अमेरिका का ऊर्जा विभाग शांत नहीं बैठा. उसने एक्सपर्ट को भेजा. नेशनल न्यूक्लियर सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन की डिप्टी डायरेक्टर शायेला हसन गई जांच के लिए. फिर कोई नतीजा नहीं निकला. बम को जैसे समुद्र निगल गया हो.