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मशरूम भी करते हैं इंसानों की तरह बातचीत, ब्रेन के विकास पर लगाते हैं पूरा जोर, जानिए क्या कहती है स्टडी

मशरूम को लेकर लगातार नए खुलासे हो रहे हैं. ताजा शोध कहता है कि लगभग 50 शब्द सीखकर आपस में बातचीत कर सकने वाले मशरूम अपना दिमाग बढ़ाने के लिए भी काफी मेहनत करते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड की स्टडी के मुताबिक मशरूम की कुछ किस्मों में नर्व ग्रोथ पर लगातार काम चलता रहता है. ये सभी खाने-लायक किस्में हैं.

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क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ने मशरूम पर स्टडी की. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ने मशरूम पर स्टडी की. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

पेड़-पौधों में जान होती है, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि वे बातें भी कर सकते हैं. मशरूम आपस में इंसानों की तरह ही बातचीत करते हैं. ये काम वे अपनी जड़ों की मदद से करते हैं, जिसे माईसेलियम कहा जाता है. शोध में पता लगा कि मशरूम्स के पास अपना मस्तिष्क भी होता है, और महसूस करने की चेतना भी. यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट इंग्लैंड के इस शोध के बाद वैज्ञानिकों की दिलचस्पी फंगस प्रजाति की इस वनस्पति में बढ़ने लगी. मशरूम की अलग-अलग किस्मों पर लगातार शोध हो रहे थे. इस बीच ताजा खुलासा ये हुआ कि अपने ब्रेन को तेज करने के लिए वे भी हमारी तरह की एक्टिव रहते हैं. 

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क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी का अध्ययन हाल ही में जर्नल ऑफ न्यूरोकेमेस्ट्री में छपा. खाने वाले मशरूम, जिसे हेलिसियम एरियासिअस कहते हैं, में ऐसा प्रोटीन होता है, जो नर्व ग्रोथ पर काम करता है. इस प्रोटीन को न्यूरोट्रॉफिन्स कहते हैं. यहां तक कि इस प्रोटीन को खाना हमारे ब्रेन डेवलपमेंट में भी मदद करता है. 

क्या है ये प्रोटीन और कैसे काम करता है
प्रोटीन फैमिली के तहत आने वाले न्यूरोट्रॉफिन्स का काम है न्यूरॉन्स की सेहत पक्की करना. ये उसके विकास और मेंटेनेंस पर काम करता है. ये जड़ में भी पाया जाता है और एक दूसरे से जुड़ा होता है. यहीं पर ये लगातार विकास करता है. ये प्रोसेस ठीक इंसानों की तरह है. हमारे भीतर भी न्यूरोट्रॉफिन्स ब्रेन के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं. इसकी एक खास किस्म, जिसे ब्रेन डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) भी कहते हैं, ये बोलने, समझने और फैसला लेने के लिए बहुत जरूरी है.

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जिन लोगों में भी इसकी कमी होती है, उनके मस्तिष्क का सही ढंग से विकास नहीं हो पाता. या फिर इसमें गड़बड़ी से कई परेशानियां होने लगती हैं. अल्जाइमर्स और रेट सिंड्रोम जैसी बीमारियों के मरीजों में इस प्रोटीन की कमी देखी गई. 

खाने लायक मशरूम की कई प्रजातियों में दिखा कि उनमें मौजूद प्रोटीन लगातार न्यूरॉन्स के विकास में लगा रहता है. एशियाई देशों में खासतौर पर खाए जाने वाले लायन्स मेने मशरूम ऐसे लोगों को देते हैं, जिनमें मस्तिष्क से जुड़ी कोई परेशानी हो. यानी आम लोगों को बिना किसी रिसर्च या स्टडी के ही कहीं न कहीं इसकी जानकारी थी कि इस तरह के मशरूम को खाना ब्रेन डेवलपमेंट में मदद कर सकता है. 

अब आते हैं इसपर कि मशरूम किस तरह की भाषा बोलते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि वे लगभग 50 शब्द बोल पाते हैं. उनके हर शब्द की लंबाई में लगभग साढ़े पांच अक्षर होते हैं. हालांकि रोजमर्रा की बातचीत में वे लगभग 20 ही शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. इलेक्ट्रिकल इंपल्स यानी बिजली की तरंगों के जरिए ये शब्द एक से दूसरे तक पहुंचते हैं. इसी की मदद से वे मौसमी खतरों की बात भी दूसरों तक पहुंचाते हैं. वैसे साइंटिस्ट मान रहे हैं कि अभी एकदम से कोई बड़ा दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन मशरूम्स में ऐसा बहुत कुछ है, जो इंसानों के लिए जानना जरूरी है. 

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