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मां की बात क्यों नहीं सुनते टीनएजर, वैज्ञानिकों ने लगाया पता 

'आखिर मेरी सुनते क्यों नहीं हो तुम लोग'...माएं अक्सर अपने बड़े हो रहे बच्चों को इसी तरह चिल्लाती हैं. बच्चे मां की नहीं सुनते, इसमें बच्चों को दोष देना सही नहीं, जानिए क्या कह रहे हैं वैज्ञानिक.

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किशोर अपनी मां की बातों पर ध्यान नहीं देते, इसपर शोध किया गया (Photo: pexels)
किशोर अपनी मां की बातों पर ध्यान नहीं देते, इसपर शोध किया गया (Photo: pexels)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • समय के साथ कुछ आवाजों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया बदल जाती है
  • किशोर जानबूझकर अपने परिवार को नज़रअंदाज नहीं करते

अक्सर माताओं (Mothers) को अपने बच्चों से यही शिकायत रहती है कि वे उनकी बात नहीं सुनते. जब बच्चे बड़े हो रहे होते हैं, यानी जब वे टीनेएजर (Teenager) या किशोरावस्था में होते हैं, तो यह समस्या कुछ ज्यादा ही परेशान करती है. 

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अब बच्चे मां की सुनते नहीं, इसके लिए उन्हें दोष देना भी ठीक नहीं है, क्योंकि हाल में किशोरों के दिमाग पर किए गए शोध से पता चलता है कि कुछ आवाजों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया समय के साथ स्वाभाविक रूप से बदल जाती है. इसी वजह से किशोरों को मां की आवाज की अहमियत कम लगने लगती है.

जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस (Journal of Neuroscience) में प्रकाशित हुए शोध के मुताबिक, जब 12 साल और उससे कम उम्र के बच्चों के दिमाग को स्कैन किया गया, तो उनमें उनकी मां की आवाज़ के प्रति एक्सप्लोसिव न्यूरल रिस्पॉन्स (Explosive Neural Response) दिखाई दिया, जिसने दिमाग में रिवार्ड सेंटर्स और भावनाओं को प्रोसेस करने वाले सेंटर (Emotion-Processing Centers) को सक्रिय कर दिया.

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 13 साल की उम्र में बच्चों के दिमाग में बदलाव होते हैं (Photo: Pexels)

लेकिन कभी-कभी बच्चों के 13वें जन्मदिन के आसपास, बदलाव होते हैं. अब मां की आवाज़ सुनकर वैसा ही न्यूरोलॉजिकल रिएक्शन नहीं होता, जैसा 12 साल की उम्र में होता था. इसके बजाय, किशोर (चाहे वह किसी भी लिंग का हो) का दिमाग सामान्य आवाज़ों के प्रति ज़्यादा प्रतिक्रिया दिखाता है. 

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किशोर जानबूझकर अपने परिवार को नज़रअंदाज नहीं करते

यह बदलाव इतने स्पष्ट हैं कि शोधकर्ता बच्चे की उम्र का अनुमान केवल इस आधार पर लगा सकते हैं कि उनका दिमाग उनकी मां की आवाज़ पर कैसी प्रतिक्रिया देता है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) के मनोचिकित्सक डैनियल अब्राम्स (Daniel Abrams) का कहना है कि जैसे एक शिशु अपनी मां की आवाज को सबसे ज्यादा पसंद करता है, वैसे ही एक किशोर बाकी आवाजों को करता है. 

उन्होंने आगे कहा कि किशोरों को नहीं पता होता कि वे ऐसा कुछ कर रहे हैं, उनके लिए तो वे वैसे ही हैं जैसे थे. उनके पास दोस्त होते हैं, उन्हें नए साथी मिलते हैं और वे उनके साथ समय बिताना चाहते हैं. उनका दिमाग इन नई आवाजों के प्रति तेजी से संवेदनशील और आकर्षित होता है. 

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 किशोर जानबूझकर अपने परिवार को नज़रअंदाज नहीं करते (Photo: Pexels)

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह किशोर मस्तिष्क के सामाजिक कौशल (Social Skills) विकसित करने का संकेत है. दूसरे शब्दों में कहें, तो एक किशोर जानबूझकर अपने परिवार को नज़रअंदाज नहीं करता है, बल्कि उसका मस्तिष्क स्वस्थ तरीके से परिपक्व (mature) हो रहा है.

छोटे बच्चों के लिए मां की आवाज बहुत अहम

इस बात के कई सबूत हैं कि छोटे बच्चों के लिए, उनकी मां की आवाज़, उनके स्वास्थ्य और विकास में बेहद अहम भूमिका निभाती है. ये उनके तनाव के स्तर, उनकी सोशल बॉन्डिंग और उनके बोलने की क्षमताओं को प्रभावित करती है. हालांकि, एक समय ऐसा आता है जब बच्चों को अपनी मां के अलावा, बाकी लोगों की बात सुनना पसंद आता है. 

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स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट विनोद मेनन का कहना है कि किशोर अपने माता-पिता की बात न सुनकर विद्रोही स्वाभाव दिखाते हैं, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे अपने घर के बाहर की आवाज़ों पर ज्यादा ध्यान देने के लिए बाध्य हैं. 

 

इस शोध के नतीजों से पता चलता है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, मां की आवाज़ पर हमारा फोकस कम हो जाता है, जबकि बाकी हर तरह की आवाज़ पर हम ज़्यादा ध्यान देते हैं.

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