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Sikkim Disaster: सिक्किम तबाही पर क्यों नहीं मिला अलर्ट? ग्लेशियल लेक पर 15 दिन पहले बंद हो गया था इमरजेंसी सिस्टम

सिक्किम की जिस झील के टूटने से आपदा आई, वहां पर 16 सितंबर को ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाया गया था. लेकिन वह आपदा से पहले तकनीकी दिक्कतों की वजह से काम करना बंद कर चुका था. इसलिए इस हादसे की पूर्व चेतावनी जारी नहीं हो पाई. आइए जानते हैं कि और कहां लगाया गया है ऐसा वेदर स्टेशन...

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ये है वो ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन, जो साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक के पास लगाया गया था. (फोटोः NDMA)
ये है वो ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन, जो साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक के पास लगाया गया था. (फोटोः NDMA)

सिक्किम में जिस ग्लेशियल झील के टूटने से इतनी बड़ी आपदा आई, वहां पर वैज्ञानिकों ने दो वेदर स्टेशन लगा रखे थे. यानी दो कैमरे वाला सोलर पावर्ड स्टेशन. जिससे लगातार डेटा मिल रहा था. लेकिन आपदा आने से कुछ दिन पहले एक स्टेशन ने काम करना बंद कर दिया था. दोनों स्टेशन ऑटोमैटिक थे. खुद ही मौसम का डेटा भेजते रहते थे. 

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इन वेदर स्टेशन को नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) ने 16 सितंबर 2023 को लगाया था. ताकि बारिश और ग्लेशियल लेकर ऑउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का पता चल सके. एक स्टेशन साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक के पास लगाया गया था. दूसरा शाको चो ग्लेशियल लेक के पास. दोनों लगातार डेटा भेज रहे थे. 

South Lhonak Glacial Lake Automated Weather Station
/ये है साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक के पास लगा आटोमेटेड वेदर स्टेशन, जो आपदा से पहले खराब हुआ. (फोटो: NDMA)

3-4 अक्टूबर की रात आई आपदा से कुछ दिन पहले साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक के पास लगे वेदर स्टेशन ने डेटा भेजना बंद कर दिया था. यानी न उससे फोटो मिल रही थी. न ही वहां के मौसम की जानकारी. एनडीएमए को ये पता था कि ये दोनों ग्लेशियल लेक बेहद खतरनाक है. दोनों ही 15 और 16 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद हैं. 

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ऐसे खतरनाक ग्लेशियरों के पास लगेंगे वेदर स्टेशन

एनडीएमए ने बताया कि सुदूर इलाका, खराब मौसम और खतरनाक लोकेशन होने की वजह से वहां पर मानवरहित वेदर स्टेशन सेट किया गया था. ताकि वहां से जानकारी मिल सके. साथ ही इस बात की भी चिंता थी कि कहीं ये स्टेशन खराब मौसम को बर्दाश्त कर पाएगा या नहीं. क्योंकि वहां उनकी मेंटेनेंस के लिए कोई इंसान नहीं था. 

NDMA ने दो ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन (AWS) लगाने के लिए सटीक जगह खोज ली थी. इसके लिए दो टीमें उन ग्लेशियरों तक ट्रैक करके गई थीं. वहां कई सेंसर्स लगाए गए थे. ताकि किसी भी आपदा से पहले अर्ली वॉर्निंग यानी पूर्व चेतावनी मिल जाए. शाको चो ग्लेशियल लेक पर लगे एक जोड़े कैमरे ने तो मौसम संबंधी डेटा भेजा. 

Sako Cho Glacial Lake Automated Weather Station
ये है शाको चो ग्लेशियल लेक के पास लगाया गया ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन. ये अब भी डेटा भेज रहा है. (फोटोः NDMA)

250 फोटो और डेटा रोज मिल रहा था

शाको चो के वेदर स्टेशन ने 250 फोटो और डेटा प्रतिदिन भेज रहा था. लेकिन साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक के पास लगे वेदर स्टेशन ने 19 सितंबर से ही डेटा भेजना बंद कर दिया था. इसके बाद ITBP की टीम ने 28 सितंबर को वहां जाकर स्टेशन की जांच की. स्टेशन सही सलामत था. लेकिन उससे डेटा नहीं मिल पा रहा था. 

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शाको चो वेदर स्टेशन तो अब भी काम कर रहा है. इस तरह की आपदाओं से बचने के लिए GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम शुरू किया गया है. ऐसे वेदर स्टेशन कई जगहों पर लगाए जाएंगे. इस काम में NDMA के साथ सिक्किम सरकार, भारतीय सेना, ITBP, CWC, GSI, NCPOR, NRSC (ISRO), DGRE, CDAC, SOI and SDC शामिल हैं. 

सिक्किम में प्रलय आने का मिला था सबूत

सिक्किम में आई आपदा की वजह से 37 लोगों की मौत हो गई. जिसमें 10 सैनिक थे. अब तक 78 लोग लापता है. इस बाढ़ की वजह से कुल मिलाकर 3709 लोग विस्थापित हुए हैं. Sikkim में प्रलय आने का सबूत मिल गया है. 17,100 फीट की ऊंचाई पर साउथ ल्होनक लेक के मुंहाने की दीवार टूटी. 

इस दीवार को मोरेन (Moraine) कहते हैं. झील में पानी की मात्रा ज्यादा होने पर दीवार टूट गई. वो भी किनारे से. इस बात को दो सैटेलाइट तस्वीरें पुख्ता करती हैं. इन तस्वीरों को Maxar ने लिया है. इससे पहले ISRO ने भी सैटेलाइट तस्वीरें जारी की थीं. 

खिसक गया था झील के आसपास का मोरेन

South Lhonak Glacial Lake Outburst

पहले इन दो कॉम्बो तस्वीरों से समझते हैं कि हुआ क्या. अगर बाएं से दाएं देखें... तो आपको साउथ ल्होनक लेक में जमी बर्फ और पानी दिखाई देगा. मुहाने पर जमा मोरेन की मोटाई और चौड़ाई भी ज्यादा दिखेगी. लेकिन दाहिनी तरफ जो तस्वीर हैं, उसमें मोरेन छितराया हुआ. टूटा हुआ दिख रहा है. पानी का लेवल भी कम है. 

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इस झील पर ये आफत आई कैसे. असल में साउथ ल्होनक लेक पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा काफी पहले से था. साइंटिस्ट इस बात की तस्दीक कई सालों से दे रहे थे. उस झील के बढ़ते आकार की स्टडी कर रहे थे. दो साल पहले भी IIT Roorkee और IISC Bengaluru के तीन वैज्ञानिकों ने इसके टूटने की आशंका जताई थी. लेकिन सरकार या प्रशासन ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया. 

इन तस्वीरों से समझिए कि कहां टूटी लेक

South Lhonak Glacial Lake Outburst

यहां ऊपर दी गई तस्वीर इस साल फरवरी की है. जिसमें लेक के बाएं तरफ ल्होनक ग्लेशियर (Lhonak Glacier) का निचला हिस्सा दिख रहा है. झील के चारों तरफ मोरेन दिख रहा है. यानी मिट्टी और पत्थरों की मोटी दीवार. उसके बाद ऊंचा पहाड़ों का निचला हिस्सा है. पानी के ऊपर बर्फ की पतली परत दिख रही है. जिसमें दरारें भी हैं. जिस जगह मोरेन में टूट हुई वो जगह भी ठीक दिख रहा है. पानी मोरेन तक पहुंचा ही नहीं है. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

यहां ऊपर दी गई फोटो झील के टूटने के दो दिन बाद की है. यानी 6 अक्टूबर 2023 की. बाएं तरफ ग्लेशियर की बर्फ की मात्रा भी ज्यादा दिख रही है. झील में पानी का स्तर भी कम दिख रहा है. बर्फ की पतली चादर टूट चुकी है. दाहिनी तरफ तीर के पास मोरेन टूटा हुआ है. 3-4 अक्टूबर की रात लगातार हुई भयानक बारिश की वजह से झील में पानी का स्तर बढ़ता चला गया. दबाव की वजह से मोरेन टूट गया. पानी, बर्फ और कीचड़ बहकर 62 किलोमीटर दूर चुंगथांग डैम तक पहुंच गया. इतना पानी वह डैम बर्दाश्त नहीं कर पाया. वह भी टूट गया. फिर चारों तरफ प्रलय ही प्रलय. 

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12 हजार से ज्यादा ग्लेशियर पिघल रहे हिमालय पर

पूरे हिमालय पर 12 हजार से ज्यादा छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं. जो लगातार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से पिघल रहे हैं. इनसे बनने वाली ग्लेशियल लेक के टूटने का खतरा रहता है. 1985 में नेपाल में दिग त्शो झील के टूटने से बड़ी आपदा आई थी. 1994 भूटान में लुग्गे त्सो झील टूटने से भी ऐसी ही आपदा आई थी. 2013 में केदारनाथ हादसे ने 6 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी. यहां भी चोराबारी ग्लेशियर टूटा था. जिससे प्रलय आया था. 

कैसी है ये साउथ ल्होनक झील? 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

साउथ ल्होनक झील एक प्रोग्लेशियल लेक है. यानी ग्लेशियर के पिघलने से निकले पानी से बनी झील. जो मोरेन टूटा है वह करीब 16.3 मीटर ऊंचा था. यानी करीब 54 फीट ऊंचा. अब आप सोचिए कि कितना पानी इस झील में भरा होगा कि 54 फीट ऊंची प्राकृतिक दीवार टूट गई. झील की गहराई 120 मीटर यानी 394 फीट है. यह पिछले चार दशकों से लगातार 0.10 वर्ग किलोमीटर से लेकर 1.37 वर्ग किलोमीटर की दर से बढ़ती जा रही थी. इसी वजह से वैज्ञानिक इसकी स्टडी कर रहे थे. ताकि सही समय पर आपदा की भविष्यवाणी कर सकें. 

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साउथ ल्होनक झील पहले से ही टूटने की कगार पर थी. वैज्ञानिकों ने दो साल पहले यानी साल 2021 में ही इस लेक के टूटने की आशंका जताई थी. यह झील करीब 168 हेक्टेयर इलाके में फैली थी. जिसमें से 100 हेक्टेयर का इलाका टूट कर खत्म हो गया. यानी इतने बड़े इलाके में जमी बर्फ और पानी बहकर नीचे की ओर आया है. 

क्या दिखाया गया था इसरो की तस्वीर में...  

फिलहाल वैज्ञानिकों का कहना ये है कि अभी एकदम से नेपाल के भूकंप और सिक्किम के GLOG यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड को जोड़ा नहीं जा सकता. लेकिन हम इसके संबंधों की जांच कर रहे हैं. क्योंकि सिर्फ बादल फटने से इतनी बड़ी घटना नहीं हो सकती. अगर आप ISRO द्वारा जारी तस्वीर को देखिए तो आपको पता चलेगा. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

17 सितंबर 2023 को झील करीब 162.7 हेक्टेयर क्षेत्रफल की थी. 28 सितंबर 2023 को बढ़कर 167.4 हेक्टेयर इलाके में फैल गई. 04 अक्टूबर को इसका क्षेत्रफल सिर्फ 60.3% ही बचा. झील का बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर खत्म हो चुका है. यह तस्वीरें इसरो के RISAT-1A और यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) के सेंटीनल-1ए सैटेलाइट से ली गई हैं. साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक उत्तरी सिक्किम के मंगन जिले के चुंगथांग के ऊपर 17,100 फीट की ऊंचाई पर है. इस झील की गहराई करीब 260 फीट है. यह 1.98 KM लंबी और आधा किलोमीटर चौड़ी है. 

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झील टूटने के बाद क्या-क्या हुआ? 

3-4 अक्टूबर के बीच की रात झील की दीवारें टूटीं. ऊपर जमा पानी तेजी से नीचे बहती तीस्ता नदी में आया. इसकी वजह से मंगल, गैंगटोक, पाकयोंग और नामची जिलों में भयानक तबाही हुई. चुंगथांग एनएचपीसी डैम और ब्रिज बह गए. मिन्शीथांग में दो ब्रिज, जेमा में एक और रिचू में एक ब्रिज बह गया. सिक्किम के राज्य आपदा प्रबंधन अथॉरिटी (SDMA) ने बताया कि पानी का बहाव 15 मीटर प्रति सेकेंड था. यानी 54 किलोमीटर प्रति सेकेंड. 

अगर 17 हजार फीट की ऊंचाई से पानी इस गति में नीचे आता है तो ये भयानक तबाही के लिए पर्याप्त है. इस फ्लैश फ्लड (Flash Flood) ने कई जगहों सड़कों को खत्म कर दिया. कम्यूनिकेशन लाइंस टूट गईं. क्लाइमेट चेंज के एक्सपर्ट अरुण बी श्रेष्ठ ने कहा कि तीस्ता नदी में आई फ्लैश फ्लड भयानक थी. बंगाल की खाड़ी में लो प्रेशर एरिया बना है. इसलिए ज्यादा बारिश हुई. जिसकी वजह से इतनी बड़ी आपदा आई है. अरुण ने कहा कि पिछले 24 घंटों में 100 मिलिमीटर से ज्यादा पानी बरसा है. 

Sikkim Flash Flood

साउथ ल्होनक लेक ही मुसीबत नहीं... ? 

यह झील चुंगथांग के ऊपर 17,100 फीट की ऊंचाई पर है. यह झील ल्होनक ग्लेशियर के पिघलने की वजह से बनी थी. झील का आकार लगातार बढ़ता जा रहा था. इसमें नॉर्थ ल्होनक ग्लेशियर और मुख्य ल्होनक ग्लेशियर पिघलने से पानी आ रहा था. 2021 में साइंस डायरेक्ट में एक स्टडी छपी थी. जिसमें कहा गया था कि अगर GLOF होता है तो ये झील भारी तबाही मचा सकती है. इसकी वजह से जानमाल और पर्यावरण को नुकसान होता है. 

साल 2013 में उत्तराखंड का चोराबारी ग्लेशियल लेक भी इसी तरह टूटा था. उसके ऊपर भी बादल फटा था. जिसकी वजह से केदारनाथ आपदा आई थी. दस साल बाद फिर वैसी ही घटना हिमालय में देखने को मिली है. इसके अलावा 2014 में झेलम नदी में फ्लैश फ्लड आने की वजह से कश्मीर के कई इलाकों में बाढ़ आ गई थी. 2005 में हिमाचल प्रदेश परेचू नदी में फ्लैश फ्लड से तबाही मची थी. 

केदारनाथ हादसा साल 2004 में आई सुनामी के बाद सबसे बड़ा हादसा था. वजह थी चोराबारी ग्लेशियर का पिघलना और मंदाकिनी नदी द्वारा अन्य जलस्रोतों को ब्लॉक करना. केदारनाथ आपदा में 6 हजार लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई थी. फरवरी 2021 में चमोली जिले के ऋषि गंगा, धुलिगंगा और अलकनंदा नदियों में भी ऐसा ही फ्लैश फ्लड आया था.

Sikkim Flash Flood

संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने की थी जांच

संसद की स्टैंडिंग कमेटी जांच-पड़ताल कर रही है कि देश में ग्लेशियरों का प्रबंधन कैसे हो रहा है. अचानक से बाढ़ लाने वाली ग्लेशियल लेक आउटबर्स्टस को लेकर क्या तैयारी है. खासतौर से हिमालय के इलाको में. यह रिपोर्ट 29 मार्च 2023 को लोकसभा में पेश किया गया है. 

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने बताया कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) ग्लेशियरों के पिघलने की स्टडी कर रही है. लगातार ग्लेशियरों पर नजर रखी जा रही है. 9 बड़े ग्लेशियरों का अध्ययन हो रहा है. जबकि 76 ग्लेशियरों के बढ़ने या घटने पर भी नजर रखी जा रही है. अलग-अलग इलाकों में ग्लेशियर तेजी से विभिन्न दरों से पिघल रहे या सिकुड़ रहे हैं ग्लेशियर. 

अभी तो और भी आपदाओं की आशंका 

सरकार ने माना है कि ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों के बहाव में अंतर तो आएगा ही. साथ ही कई तरह की आपदाएं आएंगी. जैसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), ग्लेशियर एवलांच, हिमस्खलन आदि. जैसे केदारनाथ और चमोली में हुए हादसे थे. इसकी वजह से नदियां और ग्लेशियर अगर हिमालय से खत्म हो गए. तो पहाड़ों पर पेड़ों की नस्लों और फैलाव पर असर पड़ेगा. साथ ही उन पौधों का व्यवहार बदलेगा जो पानी की कमी से जूझ रहे हैं. 

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