भविष्य में शायद आप मुर्गा न खा पाएं! क्योंकि मुर्गों के भ्रूण (Chicken Embryo) में प्लास्टिक (Plastic) मिला है. भ्रूण में प्लास्टिक का असर ये हो रहा है मुर्गे सही से विकसित नहीं हो रहे हैं. अगर ऐसा मुर्गा इंसान खाएंगे तो उन्हें भी भारी नुकसान होगा. यह डरावना खुलासा हाल ही में हुई एक स्टडी में हुआ है.
असल में भ्रूण में बेहद बारीक प्लास्टिक (Nanoplastics) मिला है. वह भी बहुत ज्यादा मात्रा में. जिसकी वजह से मुर्गों के शरीर के टिश्यू डैमेज हो रहे हैं. ये असल में बहुत ज्यादा नुकसानदेह है. इसकी वजह से मुर्गों ही नहीं बल्कि इंसानों को भी दिल संबंधी बीमारियों हो सकती हैं. क्योंकि ये माइक्रोप्लास्टिक्स या नैनोप्लास्टिक की वजह से शरीर पर कई तरह के दुष्प्रभाव हो रहा है.
यह स्टडी की है नीदरलैंड्स की लीडेन यूनिवर्सिटी के बायोलॉजिस्ट मीरू वांग ने. उन्होंने फ्लोरोसेंट माइक्रोस्कोप के नीचे मुर्गों के भ्रूण की जांच की. मुर्गों के भ्रूण में नैनोमीटर-स्केल के चमकते हुए प्लास्टिक के कण मिले हैं. ये एंब्रयोनिक गट वॉल के अंदर सबसे ज्यादा मिले हैं. इसके अलावा उनके शरीर के अलग-अलग हिस्सों में भी प्लास्टिक मिले थे.
मुर्गे में मिले हैं पॉलीस्टीरीन के कण
मीरू वांग ने बताया कि मुर्गों में सबसे ज्यादा पॉलीस्टीरीन (Polystyrene) कण मिले हैं. ये कण आमतौर पर किसी भी जीव के शरीर में नहीं मिलता. लेकिन मुर्गों के भ्रूण के शुरुआती दौर में ही प्लास्टिक मिलने लगा है. नैनोप्लास्टिक आमतौर पर माइक्रोप्लास्टिक से भी छोटे होते हैं. ये आमतौर पर सिंथेटिक कपड़ों और प्लास्टिक माइक्रोफाइबर्स में मिलते हैं. या फिर प्लास्टिक के बड़े टुकड़े टूट-टूटकर शरीर के अंदर पहुंच जाते हैं.
लिवर, किडनी और आंतों में प्लास्टिक
पॉलीस्टीरीन माइक्रोप्लास्टिक शरीर के लिवर, किडनी और आंतों में मिला है. इससे पहले ये चूहों के शरीर में भी मिल चुका है. प्लास्टिक समुद्र और हवा के जरिए हमारे खाने-पीने की चीजों में मिलता जा रहा है. इससे पहले भी इंसान के फेफड़ों, खून और यहां तक कि प्लेसेंटा तक में प्लास्टिक मिल चुका है. इनके बारे में कई स्टडीज हो चुकी हैं. प्लेसेंटा में प्लास्टिक मिलने का नुकसान पैदा होने वाले बच्चों पर पड़ता है. उनका जेनेटिक्स बदल जाता है.
स्टेम सेल पर पड़ रहा है बुरा प्रभाव
शरीर या भ्रूण में प्लास्टिक के मिलने की वजह से जीवों के अंग सही से विकसित नहीं होते. जैसे समुद्र में पाई जाने वाली जेब्राफिश (Zebrafish). अभी मुर्गों के भ्रूण में जो प्लास्टिक मिला है, उसका आकार 25 नैनोमीटर्स था. यानी एक शरीर के स्टेम सेल (Stem Cells) तक पहुंच रहे हैं. इनकी वजह से स्टेम सेल शरीर के अलग-अलग अंगों के निर्माण को लेकर होने वाला माइग्रेशन नहीं कर पा रहा है.
शरीर का विकास रोक रहा है प्लास्टिक
स्टेम सेल के अंदर न्यूरल क्रेस्ट सेल में पहुंच चुका है प्लास्टिक. इनके जरिए ये दिल, खून की नसों, शक्ल के अंदर और नर्वस सिस्टम में घुस रहा है. जिन मुर्गों की जांच की गई इनकी आंखें सही नहीं थी. छोटी थीं. अन्य मुर्गों के चेहरे का आकार खराब हो गया था. कुछ के दिल की मांसपेशियां पतली थी. साथ ही उनके दिल की धड़कन भी कमजोर थी.
प्लास्टिक की धूल है बेहद खतरनाक
यह स्टडी एनवायरमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित हुई है. इसमें बताया गया है कि कैसे प्लास्टिक हमारे जीवों या पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है. जीवों की सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा है प्लास्टिक धूल (Plastic Dust). ये हवा के जरिए जीवों के शरीर में प्रवेश कर जाता है. साल 2018 में पूरी दुनिया में 36 करोड़ मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन किया गया. आशंका है कि साल 2025 में यह आंकड़ा दोगुना हो जाएगा.