प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस ग्रीन हाइड्रोजन (Green Hydrogen) की बात कही है, क्या चीज है वो? क्या है नेशनल हाइड्रोजन मिशन. ग्रीन हब और ग्रीन जोन कैसे बनेगा? पहले समझते हैं कि ग्रीन हाइड्रोजन क्या है. फिर इससे जुड़े बाकी सवालों के जवाब भी जानिए...
क्या होता है ग्रीन हाइड्रोजन?
पूरी दुनिया को पता है कि H2O यानी पानी. सामान्य भाषा में इसमें दो कण हाइड्रोजन (H2) के हैं. एक हिस्सा ऑक्सीजन (O) का. अब अगर इन्हें इलेक्ट्रोलाइजर से अलग कर दें, तो जो हाइड्रोजन बचेगा, वो है ग्रीन हाइड्रोजन. इलेक्ट्रोलाइजर वह धातु है जो बिजली का करंट पैदा करके अणुओं को तोड़ने का काम करता है.
यह भी पढ़ें: केरल में इंसानों की वजह से बदला मौसम... 10% ज्यादा तेज हुई बारिश, वायनाड धंस गया, स्टडी
कैसे और कहां से मिलेगा?
ग्रीन हाइड्रोजन पानी से मिलेगा. वह भी सौर, पवन और जल ऊर्जा की मदद से. जैसे पनचक्की चलाकर बिजली पैदा की जाती है. उसी बिजली से इलेक्ट्रोलाइजर की मदद से पानी के अणुओं को तोड़कर ग्रीन हाइड्रोजन पैदा किया जा सकता है. यानी रेन्यूबल ऊर्जा से नई ऊर्जा पैदा करना.
भारत को क्या फायदा?
अपना देश हर साल ऊर्जा प्राप्त करने के लिए 12 ट्रिलियन रुपए खर्च करता है. यानी 12 लाख करोड़ रुपए. जिसमें से अधिकतर हिस्सा जाता है जीवाश्म ईंधन के नाम पर. यानी पेट्रोल, डीजल और कोयला. इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है. जलवायु गर्म होती है. मौसम बदलता है. फिर ढेरों आपदाएं आती हैं. ग्रीन हाइड्रोजन से जीवाश्म ईंधन की खपत कम होगी. धीरे-धीरे मौसम सुधरेगा. गर्मी कम होती चली जाएगी.
यह भी पढ़ें: दिल्ली में बाढ़, वायनाड और हिमाचल के भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ेंगी... तेजी से बदल रहा भारत का क्लाइमेट
नेशनल हाइड्रोजन मिशन
भारत ने नेशनल हाइड्रोजन मिशन बनाया है ताकि ग्रीन हाइड्रोजन का टारगेट जल्दी पूरा किया जा सके. कैसे प्रोडक्शन होना है. कहां होना है. कितना एक्सपोर्ट करना है. साथ ही इसकी मदद से जमीन का सही इस्तेमाल कर सोलर और विंड एनर्जी की तैयारी करनी है. क्योंकि इनकी मदद से ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में मदद मिलेगी.
पिछले साल मिशन को मिला अप्रूवल
पिछले साल 4 जनवरी 2022 को नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को कैबिनेट ने मंजूरी दी थी. इसके बाद इस मिशन के लिए शुरूआत में 19,744 करोड़ रुपए का आउटले तैयार किया गया. ये आउटले 2029-30 तक के लिे है. इसमें 17,490 करोड़ का आउटले स्ट्रैटेजिक इंटरवेंशंस फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) प्रोग्राम के लिए तय किया गया था.
यह भी पढ़ें: 2100 AD तक हिमालय की सुनामी से हिंद महासागर के जलप्रलय तक... देश के इन इलाकों को है सबसे बड़ा खतरा!
इसमें 1466 करोड़ रुपए का पायलट प्रोजेक्ट था. 400 करोड़ रुपए रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए. इसके अलावा 388 करोड़ रुपए मिशन के कंपोनेंट्स के लिए था. इसके अलावा 2029-30 तक 455 करोड़ रुपए लो कार्बन स्टील प्रोजेक्ट्स, 2025-26 तक 496 करोड़ रुपए मोबिलिटी पायलट प्रोजेक्ट्स और 2025-26 तक 115 करोड़ रुपए शिपिंग पायलट प्रोजेक्टस के लिए तय किए गए.
क्या है मिशन का मकसद?
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का मकसद है कि साल 2030 तक देश में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन हो. इसमें करीब 8 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा. इसकी वजह से 6 लाख नौकरियां बनेंगी. जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी. इससे करीब एक लाख करोड़ रुपए का फायदा होगा.
सबसे बड़ा फायदा होगा कि साल भर में 50 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम हो जाएगा. यानी प्रदूषण का स्तर बहुत कम होगा. भारत पूरी दुनिया को ग्रीन हाइड्रोजन का सबसे बड़ा उत्पादक और सप्लायर बन पाएगा. पेट्रोल, डीजल और कोयले की खपत कम होगी. स्वदेशी कंपनियों को फायदा होगा.
ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए इलेक्ट्रोलाइजर की जरूरत पड़ेगी. इसे बनाने वाली कंपनियों को फायदा होगा. देश में ऐसी कंपनियों के आने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. मिशन के अनुमान के तहत देश को शुरूआत में 60 से 100 गीगावॉट इलेक्ट्रोलाइजर क्षमता की जरूरत होगी.
यह भी पढ़ें: नीचे से गायब हो जाएगी जमीन... 16 साल में मुंबई का इतना हिस्सा निगल लेगा समंदर
बात सिर्फ ग्रीन हाइड्रोजन की ही नहीं... और भी हाइड्रोजन हैं. मकसद ग्रे और ब्लू हाइड्रोजन बनाने का भी है...
हाइड्रोजन दुनिया का सबसे हल्का और सबसे ज्यादा मात्रा में पाया जाने वाला पदार्थ है. यह किसी ठोस रूप में मिलता नहीं. इसे हमेशा किसी न किसी गैस से निकालना यानी अलग करना पड़ता है. जहां भी हाइड्रोजन की मदद से गैस बनती है, वहां से इसे निकाला जा सकता है. अलग-अलग तरीकों और पदार्थों से हाइड्रोजन निकालने की पद्धत्ति की वजह से ये तीन प्रकार का बन चुका है. जैसे- ग्रे, ब्लू और ग्रीन.
ग्रे हाइड्रोजन... इसे कोयले या लिग्नाइट के गैसीफिकेशन (काला या भूरा) से निकालते हैं. या फिर नेचुरल गैस या मीथेन को स्टीम मीथेन रीफॉर्मेशन (SMR) करके, इसलिए इसे ग्रे कहते हैं. इसमें कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बाकी प्रक्रियाओं से थोड़ा ज्यादा होती है.
ब्लू हाइड्रोजन... इस हाइड्रोजन को नेचुरल गैस या कोल गैसीफिकेशन या इन दोनों प्रोसेस को मिलाकर निकाला जाता है. लेकिन इसमें कार्बन कैप्टर स्टोरेज (CCS) या कार्बन कैप्टर यूज (CCU) तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. ताकि कार्बन उत्सर्जन कम हो.
यानी ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में कार्बन उत्सर्जन नहीं होता. ये सबसे साफ-सुथरी ऊर्जा देने वाली गैस बन जाती है. जिसका इस्तेमाल फ्यूचर में कई तरह से किया जा सकता है. जैसे- इसे स्टोर कर सकते हैं. जहां कोयले का इस्तेमाल हो रहा है वहां यूज कर सकते हैं. यातायात में. बिजली उत्पादन में. विमानन सेवाओं में. समुद्री यातायात में. सबसे अच्छी बात ये है कि इसे रिन्यूएबल ऊर्जा से पैदा किया जाता है. तो जीवाश्म ईंधन की जरूरत नहीं.
यह भी पढ़ें: बादल फटने से फ्लैश फ्लड तक, मौसम का कहर तेज... क्या फिर होगी हिमालय की छाती पर आसमानी चोट?
उद्योगों में ग्रीन हाइड्रोजन से क्या फायदा?
लोहा और स्टील उत्पादन करने वाली इंडस्ट्री में हाइड्रोजन ले सकता है कोयले की जगह. पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाले उद्योगों में एक है स्टील इंडस्ट्री. इस सेक्टर को अगर ग्रीन हाइड्रोजन से जोड़ दें तो दुनिया में प्रदूषण की मात्रा कम हो जाएगी. इसका असर जलवायु पर सकारात्मक पड़ेगा.
ग्रीन हाइड्रोजन से यातायात ...
फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल (FECV) हाइड्रोजन फ्यूल पर ही चलेंगे. इससे कोई प्रदूषण भी नहीं होगा. हल्के यात्री वाहनों के लिए बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (BEV) सही रहते हैं. ताकि कम दूरी में आसानी से बिना प्रदूषण के कवर की जा सके. लंबी दूरी के लिए FECV की जरूरत होगी. जैसे- बस, ट्रक और अन्य व्यावसायिक वाहन.
क्या है ग्रीन हाइड्रोजन हब?
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत उन स्थानों की पहचान की जाएगी जहां पर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन बड़े पैमाने पर होगा. इसे ग्रीन हाइड्रोजन हब कहेंगे. साल 2025-26 तक ऐसे हब बनाने के लिए मिशन में 400 करोड़ रुपए का प्रावधान है. इसमें ऐसे हब का ढांचा खड़ा किया जाएगा. शुरूआत में दो ग्रीन हब बनाने की योजना है.