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अपनी पूरी जिंदगी में हम सिर्फ 150 लोगों से ही रखते हैं रिश्ता, एक प्यार लेता है दो दोस्तों की कुर्बानी!

साइंस के अनुसार, अपने पूरे जीवन में हम लगभग 150 लोगों से रिश्ता रख सकते हैं. इसे डन्बर थ्योरी कहा गया, जिसमें बताया गया कि किसी के भी सबसे करीबी लोगों में सिर्फ 1.5 लोग होते हैं. इसके बाद लेयर बनती जाती है, और 150 लोग ऐसे होते हैं, जिनसे हमारा थोड़ा-बहुत मतलब रहता है. इसमें ये भी माना गया कि उम्र के साथ ये दायरा छोटा होता जाता है.

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हमारे सबसे टाइटेस्ट सर्कल में 1.5 से लेकर 5 ही लोग होते हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
हमारे सबसे टाइटेस्ट सर्कल में 1.5 से लेकर 5 ही लोग होते हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

ब्रिटिश साइकोलॉजिस्ट रॉबिन डन्बर ने नब्बे के दशक में एक थ्योरी दी, जो दिमाग के साइज और औसत सोशल ग्रुप साइज की बात करती थी. थ्योरी के मुताबिक, जिनका ब्रेन जितना विकसित होता है, उनके रिश्ते उतने ही ज्यादा बनते हैं. इस लिहाज से इंसानों के हिस्से सबसे ज्यादा रिश्ते आए. वहीं कम कॉग्निटिव स्किल वाले पशु-पक्षी उतने दोस्ताना नहीं दिखे. डन्बर ने एक चौंकाने वाला नंबर देते हुए कहा कि इंसान अपनी पूरी जिंदगी में ज्यादा से ज्यादा 150 लोगों से ही जुड़ता है. इसे डन्बर नंबर कहा गया.

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किस तरह का होता है सर्कल?
इसके मुताबिक, हमारे सबसे टाइटेस्ट सर्कल में 1.5 से लेकर 5 ही लोग होते हैं. यही वे लोग होते हैं, जिनके भले-बुरे या होने- न होने से हमें बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है. इसके बाद 15 वे लोग होते हैं, जिन्हें हम गुड फ्रेंड्स की श्रेणी में रखते हैं. ये रिश्तेदार भी हो सकते हैं या पड़ोसी भी. उनसे भी हमारा लगाव तो होता है, लेकिन जरा कम. अब 50 लोग आते हैं, जो दोस्त की तरह लगते हैं. इसके बाद बाद के लोग मीनिंगफुल कॉन्टेक्ट होते हैं. कभी हम उनके काम आते हैं, कभी वो हमारे.

बढ़ता-घटता भी है दायरा
इसके बाद भी नंबर चलते रहते हैं. जैसे 500 लोगों से हमारा परिचय होता है, जबकि 1500 ऐसे होते हैं, जिन्हें हम पहचानते हैं. कई बार लोग इन लेयर्स से यहां से वहां होते रहते हैं जैसे क्लोज लोग परिचित की श्रेणी में आ जाते हैं या परिचितों से गहरा लगाव हो जाता है, लेकिन सर्कल और जान-पहचान का दायरा वही रहता है. इसमें कोई नया शख्स शामिल नहीं हो पाता. इंट्रोवर्ट लोगों या ज्यादातर समय घर में बिताने वालों के लिए ये दायरा छोटा भी हो सकता है, लेकिन अधिकतर यही रहता है. 

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ब्रेन का हिपोकैंपस नाम का हिस्सा याद रखने में प्राइमरी स्त्रोत होता है. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

क्यों है 5 का मल्टिपल?
ध्यान दें तो ये सारे नंबर पांच या उसके मल्टिपल हैं. इसकी कोई वजह साइकोलॉजिस्ट नहीं बता सके कि आखिर क्यों 5 के नंबर में हमारे रिश्ते या जान-पहचान के लोग शामिल हैं. स्टडी में ये भी पाया गया कि बंदरों और चिंपाजियों के साथ 5 का कंसेप्ट आता है. वे भी इसी तरह अपने प्रिय लोगों या परिचितों को देखते हैं. 

वैज्ञानिकों ने दी अलग थ्योरी
सोशल ब्रेन हाइपोथीसिस के इस नंबर को लेकर बाद में बहुत से वैज्ञानिक विरोध जताने लगे. उनका कहना था कि बिना किसी तकनीक के सिर्फ बात करके या तस्वीरें दिखाकर हम तय नहीं कर सकते कि इंसान कितने लोगों से जुड़ता या कितनों को याद रख पाता है. अमेरिकी वैज्ञानिकों ने नेटवर्क साइज को बढ़ाकर 290 कर दिया. जबकि यूरोपियन एंथ्रोपोलॉजिस्ट्स ने दलील दी कि ये सब इस बात पर निर्भर करता है कि लोग रोज कितने लोगों से मिलते और उनके साथ कितना समय बिताते हैं. कई बार अलग-अलग कल्चर और सोशल सेटिंग्स में भी हमारा दायरा बड़ा या छोटा होता है. 

70 की उम्र के बाद डेढ़ से पांच लोग ही बाकी रहते हैं
तमाम बातों के बाद भी ज्यादातर मनोवैज्ञानिकों ने ऑक्सफोर्ड में तहलका मचा चुके डन्बर को थ्योरी को ज्यादा प्रामाणिक माना. उन्होंने एक किताब भी लिखी थी- फ्रेंड्स- अंडरस्टैंडिंग द पावर ऑफ अवर मोस्ट इंपॉर्टेंट रिलेशनशिप्स. इसमें दावा किया गया कि हम अपना सबसे क्लोज रिश्ता 30 की उम्र तक बना चुके होते हैं. ये 1.5 से लेकर 5 लोग होते हैं. इसमें जीवनसाथी भी होता है और मां-पिता, या बच्चे या कोई दोस्त भी हो सकता है. उम्र के साथ-साथ दायरा सिकुड़ता जाता है और 70 के बाद केवल वही 1.5 लोग आपके रह जाते हैं, जो 30 की उम्र तक बने थे. ये लोग जीवित भी हो सकते हैं या नहीं भी. 

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वक्त के साथ हमारा सर्कल घटता चला जाता है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

ये रिश्ता घेरता है बड़ा हिस्सा
जीवनसाथी या प्रेमी-प्रेमिका के बारे में डन्बर ने बड़ी दिलचस्प थ्योरी दी. उनका कहना था कि इस रिश्ते में आना दो दोस्तियां खोने के बराबर होता है. यानी जब हम ये रिश्ता बनाते हैं, तो अपना सारा ध्यान और ताकत इसे ही बनाए रखने में लगा देते हैं. ऐसे में सर्कल से दो लोग गायब हो जाते हैं, जो आमतौर पर अच्छे दोस्त हुआ करते थे. 

5000 चेहरे याद रख पाते हैं
रोज हम कितने ही लोगों से मिलते या उन्हें देखते हैं. घर से दफ्तर आने-जाने या यात्राओं के दौरान भी हमारी मुलाकात नए-नए लोगों से होती है. ऐसे कुल 5000 लोगों का चेहरा हम याद रख पाते हैं. कई बार लोग इससे बिल्कुल दोगुने चेहरे याद रखते हैं, लेकिन ये वे लोग होते हैं, जिनका इनर सर्कल ज्यादा बड़ा नहीं. यॉर्क यूनिवर्सिटी की इस रिसर्च में इसे फेशियल वॉकेबलरी कहा गया. माना गया कि ब्रेन इसे अपने मुताबिक याद रखता और भुलाता भी जाता है ताकि नई मैमोरी बन सके.

 

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