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आज बंगलुरू में क्यों लोगों का साथ छोड़ देगी उनकी परछाई? क्या है जीरो शैडो डे

कहते हैं कि सबकुछ साथ छोड़ दे, लेकिन परछाई हमेशा साथ बनी रहती है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं. कुछ वक्त ऐसे भी होते हैं, जब परछाई बिल्कुल गायब हो जाती है. ऐसा ही दिन आज भी है. इसे जीरो शैडो डे (ZSD) कहते हैं. आज बेंगलुरू में 12 बजकर 17 मिनट पर ये समय शुरू होगा, जो लगभग डेढ़ मिनट तक रहेगा. इस समय लोग तो होंगे, लेकिन उनकी परछाइयां नहीं होंगी.

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जीरो शैडो डे पर छाया बननी बंद हो जाती है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
जीरो शैडो डे पर छाया बननी बंद हो जाती है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया (ASI) की गणना के अनुसार, दोपहर के इन कुछ मिनटों में सूरज किसी भी चीज का शैडो नहीं बनाएगा. ये घटना एक नहीं, बल्कि उष्णकटिबंधीय इलाकों में सालाना दो बार घटती है. इस दौरान सूर्य सिर के ठीक ऊपर अपने उच्चतम बिंदु पर होगा. इससे होता ये है कि सूरज की किरणें छाया तो बनाती हैं, लेकिन वो किसी इंसान या ऑब्जेक्ट के ठीक नीचे होता है. इससे ऐसा लगता है कि छाया बनी ही नहीं होगी, जबकि वो अंडर द ऑब्जेक्ट रहती है. 

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कहां होती है घटना
ये हमेशा कर्क और मकर रेखा के बीच आने वाले इलाकों में दिखता है. इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए, सूर्य का झुकाव उत्तरायण और दक्षिणायन दोनों के दौरान उनके अक्षांश के बराबर होगा. बेंगलुरु ऐसा ही एक क्षेत्र है. सोमवार को ओडिशा के भुवनेश्वर में भी जीरो शैडो डे देखा जा चुका. वैसे असल में ये घटना केवल एकाध सेकंड या इससे भी कम होती है लेकिन इसका असर डेढ़ मिनट तक रह सकता है. 

क्यों होता है ऐसा
धरती का घूर्णन अक्ष सूर्य की तरफ लगभग 23.5 डिग्री पर झुका हुआ है. इससे मौसम बनते-बदलते हैं. मतलब सूरज, दिन के अपने उच्चतम पॉइंट पर, भूमध्य रेखा के 23.5 डिग्री दक्षिण से भूमध्य रेखा (उत्तरायण) के 23.5 डिग्री उत्तर की ओर जाएगा, और एक साल में फिर से (दक्षिणायन) लौट आएगा. इसी घूर्णन के चलते, एक जीरो शैडो डे तब आता है, जब सूर्य उत्तर की तरफ बढ़े, और दूसरा तब आता है, जब सूर्य दक्षिण की तरफ जाए. यही वजह है कि साल में दो बार जीरो शैडो डे पड़ता है. 

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सूरज की रोशनी किसी ऑब्जेक्ट को भेद नहीं पाती. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

लेकिन आखिर परछाई क्यों बनती है
सूरज की किरणें कभी भी किसी ऑब्जेक्ट, चाहे वो इंसान हो, जानवर या कोई वस्तु, उसे पार नहीं कर पाती. ऐसे में जब किरणें नीचे की तरफ आती हैं तो ऑब्जेक्ट से टकराती तो हैं, लेकिन उसे भेद नहीं पातीं, तब रुकी हुई रोशनी जितने हिस्से पर परछाई-नुमा अंधेरा छा जाता है. यही शैडो है. तो एक तरह से रोशनी की कमी है, जो परछाई कहलाती है. 

क्यों आग की नहीं बनती परछाई
वैसे तो लगभग हर चीज की परछाई बनती है, लेकिन आग की नहीं होती. इसपर एक्सपर्ट दो तरह की बातें कहते हैं. एक तबके के अनुसार, आग खुद में एक रोशनी है. ऐसे में जब उसपर दूसरी रोशनी पड़ती है तो वो आरपार हो जाती है. यही वजह है कि आग की परछाई नहीं दिखती. लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है. अगर हम एक रोशनी को, उससे कहीं ज्यादा रोशनी की तरफ ले जाएं तो कम प्रकाश वाले ऑब्जेक्ट की परछाई बनेगी. जैसे अगर मोमबत्ती की लौ का शैडो देखना है तो उसे उससे भी तेज रोशनी के आगे ले जाना होगा. अगर लौ को सूरज की रोशनी में लेकर जाएं तो जमीन पर, या दीवार पर उसका शैडो दिखता है.

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