खांसते-खांसते हालत खराब हुई जा रही है. आंखों में जलन और शरीर में थकान रहती है. वजह क्या है? जहरीली हवा. अब दुनिया में कोई भी ऐसी जगह नहीं बची है, जहां किसी को साफ हवा मिल रही हो. पूरी दुनिया में सालभर में 70 फीसदी दिनों में हवा प्रदूषित ही रहती है. दुनिया की कुल आबादी में सिर्फ 0.0001 फीसदी आबादी को ही कम प्रदूषित हवा मिल रही है.
पहली बार एक ऐसी स्टडी हुई है जिसमें पूरी दुनिया के वायु प्रदूषण की गणना की गई है. इस स्टडी को लीड करने वाले वैज्ञानिक ऑस्ट्रेलिया के मोनाश यूनिवर्सिटी से हैं. जिनकी रिपोर्ट हाल ही में The Lancet जर्नल में प्रकाशित हुई है. हर साल वायु प्रदूषण की वजह से 80 लाख लोगों की मौत होती है.
2.5 माइक्रोमीटर यानी PM 2.5 आकार के प्रदूषणकारी कण आपकी सांस के रास्ते खून में मिल जाते हैं. जिनकी वजह से स्ट्रोक, लंग कैंसर और दिल की बीमारियां हो रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के नियमों के मुताबिक हर दिन किसी इंसान को PM 2.5 का अधिकतम एक्सपोजर 15 μg/m3 होना चाहिए. लेकिन 2000 से 2019 से इसका औसत 32.8 μg/m3 था. यानी दोगुने से भी ज्यादा.
65 देशों से लिया गया हवा का सैंपल
यह स्टडी 65 देशों में लगे 5446 मॉनिटरिंग स्टेशन से हासिल किए गए डेटा के आधार पर की गई है. पूर्वी एशिया सबसे ज्यादा प्रदूषण है. पिछले दो दशकों में इस इलाके में 50 μg/m3 की मात्रा में PM2.5 के एक्सपोजर का सालाना औसत देखा गया है. इसके बाद 37.2 μg/m3 के साथ दक्षिण एशिया का इलाका आता है. आखिरी में 30 μg/m3 के साथ उत्तरी अफ्रीका.
सबसे कम प्रदूषण न्यूजीलैंड-ऑस्ट्रेलिया में
पिछले दो दशक में PM 2.5 का सबसे कम प्रदूषण 8.5 μg/m3 न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में दर्ज किया गया. इसके बाद 12.6 μg/m3 ओशिनिया और 15.6 μg/m3 दक्षिणी अमेरिका में. यूरोप और उत्तरी अमेरिका में 2000 से 2019 के बीच वायु प्रदूषण का स्तर कम हुआ है लेकिन एशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन में बढ़ा है.
जलवायु परिवर्तन से जहरीली हो रही हवा
वायु प्रदूषण का एक मौसमी पैटर्न होता है. उत्तर पश्चिम चीन और उत्तर भारत में पेट्रोल-डीजल के इस्तेमाल से सर्दियों में प्रदूषण बढ़ता है. लेकिन उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट पर गर्मियों में बढ़ जाता है. साल 2019 में ऑस्ट्रेलिया में लगी जंगली आग ने वहां के वायु गुणवत्ता को बहुत बिगाड़ दिया था. जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले ऐसे हादसे लगातार बढ़ रहे हैं.
मोनाश यूनिवर्सिटी के एयर क्वालिटी रिसर्चर यूमिंग गुओ ने कहा कि इस स्टडी से हमें पता चल रहा है कि बाहर कितना वायु प्रदूषण है. इसका इंसानों की सेहत पर कितना असर पड़ रहा है. इसकी मदद से सरकारें, नीति निर्धारण करने वाले लोग लंबे समय के लिए नियम कायदे बना सकेंगे.