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Sikkim Flash Floods Proof : सिक्किम में कैसे आई प्रलय... दो Photos से जानिए पूरी कहानी

Sikkim में प्रलय कैसे आया. इसका सबूत मिल गया है. दो सैटेलाइट तस्वीरों से ही इस बात का पता चलता है कि साउथ ल्होनक लेक की दीवार कहां टूटी. ISRO ने पहले ही ऐसी ही तस्वीर जारी की थी. अब Maxar की सैटेलाइट तस्वीरों से भी यह बात और पुख्ता हो गई है कि ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कितने खतरनाक होते हैं.

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बाएं लेक की तस्वीर इस साल फरवरी की है. दाहिनी तरफ मोरेन टूट गया, जो लाल घेरे में दिख रहा है. (फोटोः रॉयटर्स)
बाएं लेक की तस्वीर इस साल फरवरी की है. दाहिनी तरफ मोरेन टूट गया, जो लाल घेरे में दिख रहा है. (फोटोः रॉयटर्स)

Sikkim में प्रलय आने का सबूत मिल गया है. 17,100 फीट की ऊंचाई पर साउथ ल्होनक लेक के मुंहाने की दीवार टूटी. इस दीवार को मोरेन (Moraine) कहते हैं. झील में पानी की मात्रा ज्यादा होने पर दीवार टूट गई. वो भी किनारे से. इस बात को दो सैटेलाइट तस्वीरें पुख्ता करती हैं. इन तस्वीरों को Maxar ने लिया है. इससे पहले ISRO ने भी सैटेलाइट तस्वीरें जारी की थीं. 

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South Lhonak Glacial Lake Outburst

पहले इन दो कॉम्बो तस्वीरों से समझते हैं कि हुआ क्या. अगर बाएं से दाएं देखें... तो आपको साउथ ल्होनक लेक में जमी बर्फ और पानी दिखाई देगा. मुहाने पर जमा मोरेन की मोटाई और चौड़ाई भी ज्यादा दिखेगी. लेकिन दाहिनी तरफ जो तस्वीर हैं, उसमें मोरेन छितराया हुआ. टूटा हुआ दिख रहा है. पानी का लेवल भी कम है. 

इस झील पर ये आफत आई कैसे. असल में साउथ ल्होनक लेक पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा काफी पहले से था. साइंटिस्ट इस बात की तस्दीक कई सालों से दे रहे थे. उस झील के बढ़ते आकार की स्टडी कर रहे थे. दो साल पहले भी IIT Roorkee और IISC Bengaluru के तीन वैज्ञानिकों ने इसके टूटने की आशंका जताई थी. लेकिन सरकार या प्रशासन ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया. 

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इन तस्वीरों से समझिए कि कहां टूटी लेक

South Lhonak Glacial Lake Outburst
ये तस्वीर मैक्सार टेक्नोलॉजी ने फरवरी 2023 में ली थी. जिसमें झील में बर्फ जमी दिख रही है. (फोटोः रॉयटर्स)

यहां ऊपर दी गई तस्वीर इस साल फरवरी की है. जिसमें लेक के बाएं तरफ ल्होनक ग्लेशियर (Lhonak Glacier) का निचला हिस्सा दिख रहा है. झील के चारों तरफ मोरेन दिख रहा है. यानी मिट्टी और पत्थरों की मोटी दीवार. उसके बाद ऊंचा पहाड़ों का निचला हिस्सा है. पानी के ऊपर बर्फ की पतली परत दिख रही है. जिसमें दरारें भी हैं. जिस जगह मोरेन में टूट हुई वो जगह भी ठीक दिख रहा है. पानी मोरेन तक पहुंचा ही नहीं है. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst
ये तस्वीर 6 अक्टूबर 2023 की है. जिसमें मोरेन टूटा हुआ और झील में पानी कम दिख रहा है. (फोटोः रॉयटर्स)

यहां ऊपर दी गई फोटो झील के टूटने के दो दिन बाद की है. यानी 6 अक्टूबर 2023 की. बाएं तरफ ग्लेशियर की बर्फ की मात्रा भी ज्यादा दिख रही है. झील में पानी का स्तर भी कम दिख रहा है. बर्फ की पतली चादर टूट चुकी है. दाहिनी तरफ तीर के पास मोरेन टूटा हुआ है. 3-4 अक्टूबर की रात लगातार हुई भयानक बारिश की वजह से झील में पानी का स्तर बढ़ता चला गया. दबाव की वजह से मोरेन टूट गया. पानी, बर्फ और कीचड़ बहकर 62 किलोमीटर दूर चुंगथांग डैम तक पहुंच गया. इतना पानी वह डैम बर्दाश्त नहीं कर पाया. वह भी टूट गया. फिर चारों तरफ प्रलय ही प्रलय. 

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कैसी है ये साउथ ल्होनक झील? 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

साउथ ल्होनक झील एक प्रोग्लेशियल लेक है. यानी ग्लेशियर के पिघलने से निकले पानी से बनी झील. जो मोरेन टूटा है वह करीब 16.3 मीटर ऊंचा था. यानी करीब 54 फीट ऊंचा. अब आप सोचिए कि कितना पानी इस झील में भरा होगा कि 54 फीट ऊंची प्राकृतिक दीवार टूट गई. झील की गहराई 120 मीटर यानी 394 फीट है. यह पिछले चार दशकों से लगातार 0.10 वर्ग किलोमीटर से लेकर 1.37 वर्ग किलोमीटर की दर से बढ़ती जा रही थी. इसी वजह से वैज्ञानिक इसकी स्टडी कर रहे थे. ताकि सही समय पर आपदा की भविष्यवाणी कर सकें. 

साउथ ल्होनक झील पहले से ही टूटने की कगार पर थी. वैज्ञानिकों ने दो साल पहले यानी साल 2021 में ही इस लेक के टूटने की आशंका जताई थी. यह झील करीब 168 हेक्टेयर इलाके में फैली थी. जिसमें से 100 हेक्टेयर का इलाका टूट कर खत्म हो गया. यानी इतने बड़े इलाके में जमी बर्फ और पानी बहकर नीचे की ओर आया है. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

12 हजार से ज्यादा ग्लेशियर पिघल रहे हिमालय पर

पूरे हिमालय पर 12 हजार से ज्यादा छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं. जो लगातार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से पिघल रहे हैं. इनसे बनने वाली ग्लेशियल लेक के टूटने का खतरा रहता है. 1985 में नेपाल में दिग त्शो झील के टूटने से बड़ी आपदा आई थी. 1994 भूटान में लुग्गे त्सो झील टूटने से भी ऐसी ही आपदा आई थी. 2013 में केदारनाथ हादसे ने 6 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी. यहां भी चोराबारी ग्लेशियर टूटा था. जिससे प्रलय आया था. 

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क्या दिखाया गया था इसरो की तस्वीर में...  

फिलहाल वैज्ञानिकों का कहना ये है कि अभी एकदम से नेपाल के भूकंप और सिक्किम के GLOG यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड को जोड़ा नहीं जा सकता. लेकिन हम इसके संबंधों की जांच कर रहे हैं. क्योंकि सिर्फ बादल फटने से इतनी बड़ी घटना नहीं हो सकती. अगर आप ISRO द्वारा जारी तस्वीरों को देखिए तो आपको पता चलेगा. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst
इस फोटो में दाहिने ऊपर मोरेन ब्रीच लिखा है. यानी वहीं पर झील की प्राकृतिक दीवार टूटी. 

इसरो ने तीन सैटेलाइट फोटो का कॉम्बो जारी किया है. अगर आप तस्वीर को बाईं तरफ से देखेंगे तो उसमें साफ दिखा रहा है अंतर. पहले हिस्से में दिख रहा है कि 17 सितंबर 2023 को झील करीब 162.7 हेक्टेयर क्षेत्रफल की थी. 28 सितंबर 2023 को बढ़कर 167.4 हेक्टेयर इलाके में फैल गई. 04 अक्टूबर को इसका क्षेत्रफल सिर्फ 60.3% ही बचा. 

झील का बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर खत्म हो चुका है. यह तस्वीरें इसरो के RISAT-1A और यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) के सेंटीनल-1ए सैटेलाइट से ली गई हैं. साउथ ल्होनक ग्लेशियल लेक उत्तरी सिक्किम के मंगन जिले के चुंगथांग के ऊपर 17,100 फीट की ऊंचाई पर है. इस झील की गहराई करीब 260 फीट है. यह 1.98 KM लंबी और आधा किलोमीटर चौड़ी है. 

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झील टूटने के बाद क्या हुआ? 

3-4 अक्टूबर के बीच की रात झील की दीवारें टूटीं. ऊपर जमा पानी तेजी से नीचे बहती तीस्ता नदी में आया. इसकी वजह से मंगल, गैंगटोक, पाकयोंग और नामची जिलों में भयानक तबाही हुई. चुंगथांग एनएचपीसी डैम और ब्रिज बह गए. मिन्शीथांग में दो ब्रिज, जेमा में एक और रिचू में एक ब्रिज बह गया. सिक्किम के राज्य आपदा प्रबंधन अथॉरिटी (SDMA) ने बताया कि पानी का बहाव 15 मीटर प्रति सेकेंड था. यानी 54 किलोमीटर प्रति सेकेंड. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

अगर 17 हजार फीट की ऊंचाई से पानी इस गति में नीचे आता है तो ये भयानक तबाही के लिए पर्याप्त है. इस फ्लैश फ्लड (Flash Flood) ने कई जगहों सड़कों को खत्म कर दिया. कम्यूनिकेशन लाइंस टूट गईं. क्लाइमेट चेंज के एक्सपर्ट अरुण बी श्रेष्ठ ने कहा कि तीस्ता नदी में आई फ्लैश फ्लड भयानक थी. बंगाल की खाड़ी में लो प्रेशर एरिया बना है. इसलिए ज्यादा बारिश हुई. जिसकी वजह से इतनी बड़ी आपदा आई है. अरुण ने कहा कि पिछले 24 घंटों में 100 मिलिमीटर से ज्यादा पानी बरसा है. 

साउथ ल्होनक लेक ही मुसीबत नहीं... ? 

यह झील चुंगथांग के ऊपर 17,100 फीट की ऊंचाई पर है. यह झील ल्होनक ग्लेशियर के पिघलने की वजह से बनी थी. झील का आकार लगातार बढ़ता जा रहा था. इसमें नॉर्थ ल्होनक ग्लेशियर और मुख्य ल्होनक ग्लेशियर पिघलने से पानी आ रहा था. 2021 में साइंस डायरेक्ट में एक स्टडी छपी थी. जिसमें कहा गया था कि अगर GLOF होता है तो ये झील भारी तबाही मचा सकती है. इसकी वजह से जानमाल और पर्यावरण को नुकसान होता है. 

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साल 2013 में उत्तराखंड का चोराबारी ग्लेशियल लेक भी इसी तरह टूटा था. उसके ऊपर भी बादल फटा था. जिसकी वजह से केदारनाथ आपदा आई थी. दस साल बाद फिर वैसी ही घटना हिमालय में देखने को मिली है. इसके अलावा 2014 में झेलम नदी में फ्लैश फ्लड आने की वजह से कश्मीर के कई इलाकों में बाढ़ आ गई थी. 2005 में हिमाचल प्रदेश परेचू नदी में फ्लैश फ्लड से तबाही मची थी. 

केदारनाथ हादसा साल 2004 में आई सुनामी के बाद सबसे बड़ा हादसा था. वजह थी चोराबारी ग्लेशियर का पिघलना और मंदाकिनी नदी द्वारा अन्य जलस्रोतों को ब्लॉक करना. केदारनाथ आपदा में 6 हजार लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई थी. फरवरी 2021 में चमोली जिले के ऋषि गंगा, धुलिगंगा और अलकनंदा नदियों में भी ऐसा ही फ्लैश फ्लड आया था.

संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने की थी जांच

संसद की स्टैंडिंग कमेटी जांच-पड़ताल कर रही है कि देश में ग्लेशियरों का प्रबंधन कैसे हो रहा है. अचानक से बाढ़ लाने वाली ग्लेशियल लेक आउटबर्स्टस को लेकर क्या तैयारी है. खासतौर से हिमालय के इलाको में. यह रिपोर्ट 29 मार्च 2023 को लोकसभा में पेश किया गया है. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने बताया कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) ग्लेशियरों के पिघलने की स्टडी कर रही है. लगातार ग्लेशियरों पर नजर रखी जा रही है. 9 बड़े ग्लेशियरों का अध्ययन हो रहा है. जबकि 76 ग्लेशियरों के बढ़ने या घटने पर भी नजर रखी जा रही है. अलग-अलग इलाकों में ग्लेशियर तेजी से विभिन्न दरों से पिघल रहे या सिकुड़ रहे हैं ग्लेशियर. 

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अभी तो और भी आपदाओं की आशंका 

सरकार ने माना है कि ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों के बहाव में अंतर तो आएगा ही. साथ ही कई तरह की आपदाएं आएंगी. जैसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), ग्लेशियर एवलांच, हिमस्खलन आदि. जैसे केदारनाथ और चमोली में हुए हादसे थे. इसकी वजह से नदियां और ग्लेशियर अगर हिमालय से खत्म हो गए. तो पहाड़ों पर पेड़ों की नस्लों और फैलाव पर असर पड़ेगा. साथ ही उन पौधों का व्यवहार बदलेगा जो पानी की कमी से जूझ रहे हैं. 

हिमालय पर कम हो रही सर्दी 

लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान की वजह से हिमालय पर  Cold Days कैसे घटते जा रहे हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि हिमालय का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है. कोल्ड डेज़ और कोल्ड नाइट्स की गणना के लिए जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में 16 स्टेशन हैं. लगातार गर्म दिन बढ़ रहे हैं. जबकि ठंडे दिन कम होते जा रहे हैं. पिछले 30 वर्षों में ठंडे दिनों में 2% से 6% की कमी आई है. 

South Lhonak Glacial Lake Outburst

हिमालय के इलाके काफी अनस्टेबल

किसी भी ग्लेशियर के पिघलने के पीछे कई वजहें हो सकती है. जैसे- जलवायु परिवर्तन, कम बर्फबारी, बढ़ता तापमान, लगातार बारिश आदि. गंगोत्री ग्लेशियर के मुहाने का हिस्सा काफी ज्यादा अनस्टेबल है. ग्लेशियर किसी न किसी छोर से तो पिघलेगा ही. अगर लगातार बारिश होती है तो ग्लेशियर पिघलता है. डाउनस्ट्रीम में पानी का बहाव तेज हो गया था. बारिश में हिमालयी इलाकों की स्टेबिलिटी कम रहती है. ग्लेशियर पिघलने की दर बढ़ जाती है. 

फिलहाल दो दर्जन ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक नजर रख पा रहे हैं. इनमें गंगोत्री, चोराबारी, दुनागिरी, डोकरियानी और पिंडारी मुख्य है. यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के वैज्ञानिकों ने हिमालय के 14,798 ग्लेशियरों की स्टडी की. उन्होंने बताया कि छोटे हिमयुग यानी 400 से 700 साल पहले हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की दर बहुत कम थी. पिछले कुछ दशकों में ये 10 गुना ज्यादा गति से पिघले हैं.  

स्टडी में बताया गया है कि हिमालय के इन ग्लेशियरों ने अपना 40% हिस्सा खो दिया है. ये 28 हजार वर्ग KM से घटकर 19,600 वर्ग KM पर आ गए हैं. इस दौरान इन ग्लेशियरों ने 390 क्यूबिक KM से 590 क्यूबिक KM बर्फ खोया है. इनके पिघलने से जो पानी निकला, उससे समुद्री जलस्तर में 0.92 से 1.38 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई है. 

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