दुनिया के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक सैंटोरिनी (Santorini) पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. क्योंकि 400 साल पहले जिस ज्वालामुखी ने इस शहर को बर्बाद कर दिया था. अब उसके नीचे सक्रिय मैग्मा चेंबर मिला है. और यह चेंबर लगातार बड़ा होता जा रहा है. यह एक सबमरीन ज्वालामुखी है. यह पहले शांत था इसलिए इस पर किसी का ध्यान नहीं गया. लेकिन पिछले कुछ दिनों से इसकी गतिविधियां बढ़ गई हैं.
वैज्ञानिकों ने स्टडी की तो पता चला कि कोलुंबो सबमरीन ज्वालामुखी (Kolumbo Submarine Volcano) के नीचे गर्म लावा जमा हो रहा है. एक बड़ा चेंबर बन चुका है. यह दिन-प्रतिदिन बड़ा हो रहा है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगले 150 साल में यह किसी भी वक्त फट सकता है. यानी अगले 24 घंटे में भी और कई सालों में भी. एक ढंग के भूकंप के झटके से ही यह एक्टिव हो जाएगा. यह सैंटोरिनी से बहुत दूर भी नहीं है. सिर्फ 7 किलोमीटर दूर समुद्र में आधा किलोमीटर की गहराई में है.
कोलुंबो दुनिया के सबसे सक्रिय समुद्री ज्वालामुखियों में से एक है. ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि 1650 एडी में यह ज्वालामुखी फटा था. तब सैंटोरिनी में 70 लोगों की जान चली गई थी. जियोकेमिस्ट्री, जियोफिजिक्स, जियोइकोसिस्टम नाम के जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक कोलुंबो ज्वालामुखी के नीचे बड़े हो रहे मैग्मा चेंबर पर किसी का ध्यान नहीं गया. लेकिन अब यह कभी भी फट सकता है. अगर यह फटा तो सैंटोरिनी जैसे खूबसूरत शहर के लिए तबाही ला सकता है. क्योंकि यह समुद्री ज्वालामुखियों के बुरे इतिहास में अपना नाम पहले भी दर्ज करा चुका है.
समुद्री ज्वालामुखियों की मॉनिटरिंग भी जमीनी ज्वालामुखी की तरह ही होता है लेकिन समुद्र में सीस्मोमीटर लगाना मुश्किल है, इसलिए कुछ ही जगहों पर ये काम हो पाया है. इसलिए समुद्री ज्वालामुखियों के सक्रिय होने या फटने का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल हो जाता है. लेकिन कोलुंबो की सक्रियता का पता करने के लिए वैज्ञानिकों ने नई तकनीक का इस्तेमाल किया. इसे फुल-वेवफॉर्म इन्वर्जन कहते हैं. इसमें आर्टिफिशियल सीस्मिक तरंगें फेंकी जाती हैं. जिससे हाई रेजोल्यूशन इमेज तैयार होती है. तरंगों से पता चलता है कि कहां पत्थर है, कहां मिट्टी और कहां ज्वालामुखी.
इंपीरियल कॉलेज लंदन की वॉल्कैनोलॉजिस्ट मिशेल पाउलाट्टो कहती हैं कि फुल-वेवफॉर्म इन्वर्जन मेडिकल अल्ट्रासाउंड तकनीक की तरह काम करता है. इसमें आवाज की तरंगों को समुद्र में फेंका जाता है. तरंग जहां से टकराकर वापस आती है, उससे पता चलता कि समुद्र के अंदर कहां पर क्या है. इससे समुद्र के अंदर की तलहटी की आकृति बनने लगती है. इन तरंगों की गति भी बदल जाती है अलग-अलग स्थानों से गुजरते समय. उससे भी पता चलता है कि अंदर किस तरह का पर्यावरण है.
वैज्ञानिकों ने जो डेटा निकाला है, उसके मुताबिक मैग्मा चेंबर में 1650 के बाद से लगातार हर साल 141 मिलियन क्यूबिक फीट लावा बढ़ रहा है. इस समय उस चेंबर में 1.4 क्यूबिक किलोमीटर मैग्मा मौजूद है. इसमें करीब इतना ही मैग्मा अगले 150 सालों तक बनेगा. इतना ही मैग्मा कोलुंबो ने 400 साल पहले हुए विस्फोट में उगला था.
नई स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया है कि अब से लेकर इसके विस्फोट तक कोलुंबो सबमरीन ज्वालामुखी पर नजर रखनी होगी. साथ ही इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है ज्यादा से ज्यादा बेहतर और सटीक डेटा मिले ताकि ज्वालामुखी की गतिविधियों का सही अंदाजा लगाया जा सके.
मिशेल पाउलेट्टो कहती हैं कि ज्यादा सटीक डेटा मिलने से हम कम से कम यह काम कर सकते हैं कि इसके विस्फोट का अंदाजा लगा सकते हैं. ताकि सही समय पर सैंटोरिनी द्वीप के लोगों को और बाहर से आने वाले पर्यटकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा सकें. अगर विस्फोट से कुछ समय पहले पता चल जाए तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है.
अब कोलुंबो की स्टडी के लिए वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम एक समुद्री ऑब्जरवेटरी बनाने जा रही है. यह ऑब्जरवेटरी समुद्र के अंदर होगी. इसे नाम दिया गया है सैंटोरिनी सीफ्लोर वॉल्कैनिक ऑब्जरवेटरी या SANTORY. जब ये काम करना शुरू करेगी तो वैज्ञानिकों को ज्यादा बेहतर डेटा मिलेगा.