scorecardresearch
 

इस बीमारी में खत्म हो जाता मरीज का खौफ, सांपों के बीच जाने या आग में कूदने से भी नहीं लगता डर, दुनिया में 400 लोग ऐसे

कोई सांपों के बिल में हाथ डालने को कहे, या फिर उड़ते हवाई जहाज से बिना सुरक्षा कूद जाने का चैलेंज दे तो आप क्या करेंगे! दुनिया के सबसे बहादुर लोग भी इसे बेवकूफी मानते हुए चुनौती लेने से मना कर देंगे, लेकिन कुछ लोग नहीं. दुनिया में लगभग 400 ऐसे लोग हैं, जो किसी खतरे से नहीं डरते. ये लोग बहादुर नहीं, बल्कि एक खास किस्म की दिमागी बीमारी के मरीज हैं.

Advertisement
X
बीमारी में ब्रेन के एमिग्डेला पर प्रोटीन का जमावड़ा हो जाता है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
बीमारी में ब्रेन के एमिग्डेला पर प्रोटीन का जमावड़ा हो जाता है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

कुछ सालों पहले अमेरिका की एक महिला का सनसनीखेज मामला सामने आया, जो किसी भी बात पर नहीं डरती थी. परिवार के कहने पर महिला यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलीफोर्निया के न्यूरोसाइंस विभाग में आई. वहां डॉक्टरों ने पाया कि महिला हर किसी के बहुत करीब जाकर बात करती. पहले इसे अजीब माना गया, लेकिन फिर देखा गया कि वो न तो अजनबी लोगों से डरती थी, न हालात और न हथियारों से. महिला को एसएम नाम दिया गया ताकि पहचान छिपी रहे और सालों तक विभाग में उसपर स्टडी होती रही. 

Advertisement

वैज्ञानिकों ने की डराने की कोशिशें
मरीज को डराने की छोटी-मोटी कोशिशें फेल हुईं, जिसके बाद वैज्ञानिकों ने कुछ बड़ा करने की ठानी. उन्हें एग्जॉटिक एनिमल स्टोर ले जाया गया, जहां सांपों से भरे जार के बीच उन्हें छोड़ दिया गया. वैज्ञानिक दूर से देखने लगे कि महिला उन डिब्बों को खोलने की कोशिश कर रही थी ताकि सांपों को छू सके. एक और प्रयोग के दौरान महिला को अगवा कर लिया गया और अंधेरे कमरे में छोड़ दिया गया. महिला क्लूलेस तो थी, लेकिन इस दौरान भी न उसके दिल की धड़कन बढ़ी, न वो चीखी-चिल्लाई. अचानक हथियार सामने लाने पर भी उसका कोई रिएक्शन नहीं था. 

क्यों होता है ऐसा
एसएम अकेली नहीं, बल्कि दुनिया में लगभग 4 सौ ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिन्हें किसी भी बात, किसी भी हालात से डर नहीं लगता. ये आम लोग हैं, लेकिन एक बीमारी ने इन्हें खास बना दिया. इनके दिमाग में डर जगाने वाला हिस्सा ही एक्टिव नहीं है. वैज्ञानिकों ने बीमारी को नाम दिया- अर्बेक वीथ डिसीज. ये एक दुर्लभ बीमारी है, जिसमें ब्रेन में एमिग्डेला नाम का हिस्सा इतना सख्त हो जाता है कि उसतक डर का सिग्नल ही नहीं जा पाता. 

Advertisement
urbach-wiethe disease when patient feel no fear
जिंदा रहने के लिए डरना भी जरूरी है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

क्यों होता है ऐसा?
अर्बेक वीथ दरअसल एक ऑटोसोमल रेसेसिव डिसऑर्डर है, यानी रेयर जेनेटिक बीमारी. इसमें शरीर में मौजूद खास तरह का प्रोटीन, जिसे कोलोजन कहते हैं, वो ज्यादा बनने लगता है. शरीर में मिलने वाले प्रोटीन का एक तिहाई हिस्सा यही कोलोजन होता है, जो हड्डियों से लेकर त्वचा और बाल तक में पाया जाता है. इसी प्रोटीन की बढ़ी हुई मात्रा सॉफ्ट टिश्यू समेत पूरे शरीर में जमा होने लगती है. यहां तक कि इसका असर ब्रेन तक चला जाता है और एमिग्डेला में इसका जमावड़ा उस पूरे हिस्से को कड़ा बना देता है. इससे न्यूरॉन्स अपना संदेश ठीक से प्रोसेस नहीं कर पाते.

कैसे काम करता है एमिग्डेला?
एमिग्डेला तंत्रिका कोशिकाओं से बना बादाम के आकार का हिस्सा है, जिसका एक निश्चित काम है. वो स्थिति को प्रोसेस करता है. इसमें दुख और डर भी शामिल है. इन इमोशन्स के पहुंचने के बाद ब्रेन तय करता है कि उसे कैसे रिएक्ट करना है. जैसे अगर आम लोग छत के किनारे पहुंच जाएं तो संभलकर खड़े होंगे, वहीं इस बीमारी के मरीज बिना बाउंड्री वाली छत पर ऐसे टहलेंगे जैसे लॉन में घूम रहे हों. वे देख तो पाएंगे लेकिन खतरे को समझ नहीं पाएंगे.  

Advertisement
urbach-wiethe disease when patient feel no fear
अर्बेक वीथ दरअसल एक ऑटोसोमल रेसेसिव डिसऑर्डर है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

जब भी कोई रिस्क वाली स्थिति आती है तो एमिग्डेला के इशारे पर हम तय कर पाते हैं कि कुछ गड़बड़ है और भागने या कोई भी एक्शन लेने का फैसला कर पाते हैं. एमिग्डेला के संदेश भेजने का पहला लक्षण है, दिल का धड़कनों का तेज होना और हथेलियों पर पसीना आना. लेकिन बीमारी में एमिग्डेला असक्रिय हो जाता है. यहां तक कि डर ही नहीं, किसी भी तरह के एक्सट्रीम भाव भी इसमें खत्म हो जाते हैं. मरीज खुद तो नहीं ही डरता, वो ये भी नहीं समझ पाता है कि उसकी वजह से कोई दूसरा डर सकता है, या किसी को परेशानी हो सकती है. 

बीमारी में मरीज डर समेत हर तरह के एक्सट्रीम इमोशन से दूर हो जाता है. इसके अपने खतरे हैं. खासकर डर खत्म हो जाने पर वो स्थितियों को सही तरह से समझ नहीं पाता और सही फैसले नहीं ले पाता. जैसे देर रात अकेले घूमना बहुत सी जगहों पर अनसेफ है, लेकिन मरीज को इससे डर नहीं लगेगा और वो गलत हाथों में पड़ जाएगा. 

इसके अलावा कुछ मामूली परेशानियां भी होती हैं, जैसे आवाज में भारीपन, स्किन में रूखापन, घावों का देर से भरना और आंखों के आसपास छोटे-छोटे दाने की तरह उभार हो आना. ब्लड टेस्ट और सीटी स्कैन जैसी जांचों से तय किया जाता है कि मरीज किस कंडीशन में है. एमिग्डेला में सख्ती के चलते ये आशंका भी रहती है कि मरीज आगे चलकर मिरगी का शिकार हो सकता है.

Advertisement

 

Advertisement
Advertisement