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सोते समय काम नहीं करती आवाजों को पहचानने की क्षमता, 8 साल के अध्ययन से पता चला

कहते हैं सोते समय हमारा दिमाग काम करता रहता है. इस पहेली को सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक शोध किया जिसमें पाया गया कि जब हम सोते हैं तो हमारी चेतना की एक खासियत काम करना बंद कर देती है.

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वैज्ञानिकों ने चेतन और अवचेतन मन के रहस्य जानने की कोशिश की (Photo: andrea piacquadio/pexels)
वैज्ञानिकों ने चेतन और अवचेतन मन के रहस्य जानने की कोशिश की (Photo: andrea piacquadio/pexels)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मिर्गी के रोगियों ने की शोध में मदद
  • 8 सालों तक चला ये शोध

जब हम सपने देखते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ रहस्यमय चीजें होती हैं. ऐसा लगता है जैसे हम जाग रहे हों, लेकिन यह स्थिति जागने से काफी अलग होती है. वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन दोनों स्थितियों के बीच क्या होता है. अब एक और सुराग मिला है.

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चेतना (Consciousness) की एक खास विशेषता होती है- आवाजों को पहचानने की क्षमता. एक नए अध्ययन से पता चला है कि सोते समय हमारी यह क्षमता काम करना बंद कर देती है. इससे हमें यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि हमारा दिमाग सपने कैसे देखता है.

मिर्गी के रोगियों ने की शोध में मदद

लोगों के जागते और सोते समय उनके दिमाग की मैपिंग (Brain Mapping) करना आसान नहीं होता. इसलिए शोधकर्ताओं ने मिर्गी के रोगियों (Epilepsy patients) पर की जा रही रिसर्च का सहारा लिया. इज़राइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी (Tel Aviv University, Israel) के न्यूरोसाइंटिस्ट युवल नीर (Yuval Nir) का कहना है कि उन्हें ऐसे खास मेडिकल प्रोसीज़र की मदद मिली जिसमें मिर्गी के रोगियों के दिमाग में इलेक्ट्रोड लगाए गए थे और इलाज के लिए उनके दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में हो रही गतिविधियों को मॉनिटर किया गया था.

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Sleep
 मिर्गी के मरीजों पर हुए शोध से ली गई मदद (सांकेतिक फोटो: Andrea Piacquadio/Pexels)

8 साल तक चला शोध

नीर ने कहा कि मरीजों ने सोते और जागते समय, सुनने की स्थिति (Auditory stimulation) पर दिमाग की प्रतिक्रिया जानने में शोधकर्ताओं की मदद की. अब, इलेक्ट्रोड की मदद से, शोधकर्ता नींद की अलग-अलग अवस्थाओं और जागते हुए, सेरिब्रल कॉर्टेक्स (Cerebral cortex) की प्रतिक्रिया में अंतर देख पा रहे थे. रिसर्च के लिए, शोधकर्ताओं ने मरीज़ों को सोते समय स्पीकर से अलग-अलग तरह की आवाज़ें सुनाईं. यह शोध करीब आठ सालों तक चला. इस दौरान करीब 700 से ज़्यादा न्यूरॉन्स का डेटा इकट्ठा किया गया.

नेचर न्यूरोसाइंस (Nature Neuroscience) में प्रकाशित हुए शोध के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद के दौरान भी मरीज़ों का दिमाग आवाजों के प्रति प्रतिक्रियाएं देता रहा. ध्यान और अपेक्षा से जुड़ी वेव्स, अल्फा-बीटा वेव्स (Alpha-beta waves) का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया. इसका मतलब था कि मरीजों के दिमाग ने आने वाली आवाजों का विश्लेषण तो किया, लेकिन दिमाग ने उस विश्लेषण के नतीजे, चेतना को नहीं भेजे. पहले ये माना जाता था कि नींद के दौरान, आवाजों से जुडे संकेत, दिमाग में बहुत जल्दी खत्म हो जाते हैं. जबकि इस शोध से पता चला है कि ये वास्तव में ज़्यादा मजबूत बने रहते हैं. 

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अल्फा-बीटा वेव्स के पैटर्न में बढ़ोतरी वाला बदलाव पहले उन मरीज़ों में भी देखा गया था जिन्हें एनेस्थीसिया दिया गया था. इससे वैज्ञानिकों को ये मापने का एक विश्वसनीय तरीका भी मिलता है कि मरीज कोमा में या ऑपरेशन के दौरान वास्तव में बेहोश है या नहीं. 

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