शिव संहार के देवता कहे जाते हैं. इस बात से वैज्ञानिक भी सहमत है. धरती कब और कैसे खत्म होगी? उस पर जीवन कब खत्म होगा? इसके पीछे की वजह क्या होगी? इनकी स्टडी कई वर्षों से वैज्ञानिक कर रहे हैं. ऐसी ही एक स्टडी का नाम है शिवा हाइपोथिसिः इम्पैक्ट्स, मास एक्टिक्शन एंड द गैलेक्सी (The Shiva Hypothesis: Impacts, mass extinctions and the galaxy).
यह वैज्ञानिकों का ऐसा सिद्धांत है जिसमें वो धरती, उस पर मौजूद जीवन के खत्म होने और इसका आकाशगंगा से संबंध बताया गया है. इस हाइपोथिसिस में यह बताया गया है कि धरती पर समय-समय पर जीवन का सामूहिक संहार होगा. इसकी वजह धूमकेतु या एस्टेरॉयड्स या उल्कापिंड हो सकते हैं.
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सिर्फ यही नहीं पृथ्वी किसी अन्य ग्रह से टकरा भी सकती है. या कोई बड़ा पत्थर धरती से आकर टकरा सकता है. उसकी टक्कर से अंतरिक्ष में इतने ज्यादा धूल के बादल फैले कि दुनिया फिर से हिमयुग में चली जाए. अब तक की गणना के मुताबिक धरती पर पांच बार जीवन का सामूहिक विनाश हो चुका है.
20 के आसपास छोटे सामूहिक विनाश हुए हैं. ये सभी घटनाएं पिछले 54 करोड़ वर्षों में हुई है. ये हाइपोथिसिस एमआर रैंपिनो और ब्रूस एम. हैगर्टी ने दी थी. इसी स्टडी की बदौलत आज भी वैज्ञानिक धरती पर होने वाले छठे सामूहिक विनाश की स्टडी और रिसर्च में लगे हैं. जो ये बताते हैं कि कैसे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है.
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कैसे पड़ा इस सिद्धांत का नाम शिवा हाइपोथिसिस?
जीव-जंतुओं की मौत हो रही है. जिस हिसाब से गर्मी बढ़ रही है. उससे पृथ्वी के कई इलाकों पर भयानक विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है. समुद्री जीव खत्म हो रहे हैं. अब यह गैर-समुद्री जीवों की तरफ भी बढ़ रहा है. इतना ही नहीं ऐसी कई विनाशकारी चीजें ब्रह्मांड में भी हो रही है. जो नई दुनिया बना रही हैं. पुरानी खत्म कर रही हैं.
शिवा हाइपोथिसिस में ग्रहों के खत्म होने और बनने की बात भी कही गई है. धरती पर ऊर्ट क्लाउड से धूमकेतुओं की बारिश की बात कही गई है. इस हाइपोथिसिस का नाम कैसे शिवा हाइपोथिसिस पड़ा? वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि भगवान शिव संहारक, विनाशक और निर्माणकर्ता हैं. 1987 में कैंपबेल की एक स्टडी में कहा गया था कि दुनिया में सबसे ज्यादा और सबसे प्राचीन देवता शिव हैं. उनकी पूजा बहुत जगहों पर होती है.
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शिव को इस वैज्ञानिक स्टडी में शामिल करने की जो बात कही गई है, उसमें बताया गया है कि उनके एक हाथ में जलती हुई ज्वाला है. दूसरे में डमरू. जब वो डमरू बजाते हैं तो एक लयबद्ध तरीके से यानी वह नृत्य और निर्माण का प्रतीक है. वहीं जब हाथ में जलती ज्वाला घुमाते हैं, तो उसे कॉस्मिक साइकिल से जोड़ा गया है. यानी ब्रह्मांड के मूवमेंट से. यह विनाश और निर्माण की एक सतत प्रक्रिया है.
शिवा हाइपोथिसिस का असर आज के दौर में कितना?
धरती पर विनाश की कई स्टडी आई हैं. 10 km या 5 km व्यास का एक उल्कापिंड किस तरह से धरती को खत्म कर सकता है. इसकी डिटेल इस स्टडी में दी गई है. चर्चा सिर्फ इस चीज की नहीं कैसे होगा, ये भी बताया गया है कि इसका असर क्या होगा. पूरी दुनिया में काले बादल छा जाएंगे. सूरज की रोशनी नहीं मिलेगी. तापमान में हफ्ते भर में माइनस 15 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आएगी. चारों तरफ बर्फ जम जाएगा. जीव-जंतुओं की कई प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी.
यह भी बताया गया है कि जरूरी नहीं कि इन्हीं कॉस्मिक घटनाओं से धरती का खात्मा हो. यह काम इंसानों द्वारा किए जा रहे जलवायु परिवर्तन की वजह से भी हो रहा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं. नदियां सूख रही हैं. सूखा पड़ रहा है. प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और तीव्रता बढ़ गई है. इसमें जैविक और अजैविक दोनों तरह का विनाश हो रहा है.