23 अगस्त 2023 की शाम पांच बजकर 20 मिनट पर ISRO ने चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) की लैंडिंग का लाइव स्ट्रीमिंग शुरू हुआ. यूट्यूब, फेसबुक और इसरो की साइट पर. लाखों-करोड़ों लोग उसे देख रहे थे. जब इसरो वैज्ञानिकों ने सूचना दी कि अब लैंडिंग शुरु होने वाली है. लोग आतुरता के साथ इसरो की स्ट्रीमिंग से नजरें भी नहीं हटा रहे थे.
जिन चार्ट्स और ग्राफ्स को सिर्फ साइंटिस्ट समझते हैं, उन्हें देखकर लोग समझने की कोशिश कर रहे थे. हम आपको एक आसान से चार्ट से समझाते हैं कि इस लैंडिंग की खास बात क्या थी. लैंडिंग की जगह से चंद्रयान-3 ऊंचाई में 30 किलोमीटर और सतह से 745.6 किलोमीटर दूर था. यहां से शुरू होती है लैंडिंग. लैंडिंग को चार हिस्सों में बांटा गया था.
रफ ब्रेकिंग फेज (Rough Braking Phase): 30 किलोमीटर की ऊंचाई से 7.4 किलोमीटर की दूरी तक चंद्रयान-3 के लैंडर को आना था. इसमें उसे 690 सेकेंड लगे. यानी 11.5 मिनट. इस दौरान चंद्रयान ने 713 किलोमीटर की यात्रा की. उसने यात्रा की शुरुआत 1.68 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति घटाकर 358 मीटर प्रति सेकेंड किया. यह गति नीचे आने की थी. हॉरीजोंटल गति .61 मीटर प्रति सेकेंड थी.
एल्टीट्यूड होल्ड फेज (Altitude Hole Phase): यानी 32 से 28.52 किलोमीटर की दूरी तय की गई. ऊंचाई थी 6.8 किलोमीटर. समय लगा मात्र 10 सेकेंड. नीचे आने की गति 336 मीटर प्रति सेकेंड थी. हॉरीजोंटल गति .59 मीटर प्रति सेकेंड थी.
फाइन ब्रेकिंग फेज (Fine Braking Phase): 28.52 किलोमीटर से 0 किलोमीटर तक की दूरी तय की. यानी लैंडर अब लैंडिंग वाली जगह के ठीक ऊपर था. ऊंचाई थी 0.8 से 1.3 किलोमीटर. क्योंकि उसे उतरने की सही जगह देखते हुए नीचे आना था. यानी वह हेलिकॉप्टर की तरह उड़ रहा था. उसके चारों पैर नीचे की तरफ थे. इस स्थिति में वह 2 मीटर प्रति सेकेंड की गति से 150 मीटर की ऊंचाई तक आया. ये पूरा प्रोसेस करने में इसे 175 सेकेंड लगे यानी करीब तीन मिनट.
टर्मिनल डिसेंट फेज (Terminal Descent Phase): ये शुरू होती है 150 मीटर की ऊंचाई से सीधे नीचे सतह की ओर. इस दौरान चंद्रयान-3 का लैंडर हॉरीजोंटली 0.5 मीटर प्रति सेकेंड और 2 मीटर प्रति सेकेंड की गति से वर्टिकली नीचे आ रहा था.
150 मीटर से 60 मीटर तक आने में उसे 73 सेकेंड लगे. जिसमें 52 सेकेंड रीटारगेटिंग थे. यानी सुरक्षित जगह खोजने में लगे. इसके बाद 60 मीटर से 10 मीटर की दूरी उसने 38 सेकेंड में पूरी की. आखिरी 9 सेकेंड में उसने 10 मीटर से सतह तक की दूरी तय की.
इतनी गणित और सटीकता के बाद विक्रम लैंडर ने अपने पांव चांद की जमीन पर रखे. तब जाकर यह मिशन सफल हुआ. इतना ही नहीं लैंडिंग के करीब तीन में जब लैंडिंग की वजह से उठी चांद की धूल (Moon Dust) जमीन पर बैठ गई, तब प्रज्ञान रोवर (Pragyan Rover) बाहर निकला.
विक्रम लैंडर पर चार पेलोड्स क्या काम करेंगे?
1. रंभा (RAMBHA)... यह चांद की सतह पर सूरज से आने वाले प्लाज्मा कणों के घनत्व, मात्रा और बदलाव की जांच करेगा.
2. चास्टे (ChaSTE)... यह चांद की सतह की गर्मी यानी तापमान की जांच करेगा.
3. इल्सा (ILSA)... यह लैंडिंग साइट के आसपास भूकंपीय गतिविधियों की जांच करेगा.
4. लेजर रेट्रोरिफ्लेक्टर एरे (LRA) ... यह चांद के डायनेमिक्स को समझने का प्रयास करेगा.
प्रज्ञान रोवर पर दो पेलोड्स हैं, वो क्या करेंगे?
1. लेजर इंड्यूस्ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप (Laser Induced Breakdown Spectroscope - LIBS). यह चांद की सतह पर मौजूद केमकल्स यानी रसायनों की मात्रा और गुणवत्ता की स्टडी करेगा. साथ ही खनिजों की खोज करेगा.
2. अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (Alpha Particle X-Ray Spectrometer - APXS). यह एलिमेंट कंपोजिशन की स्टडी करेगा. जैसे- मैग्नीशियम, अल्यूमिनियम, सिलिकन, पोटैशियम, कैल्सियम, टिन और लोहा. इनकी खोज लैंडिंग साइट के आसपास चांद की सतह पर की जाएगी.