ISRO ने 14 जुलाई 2023 को चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग की. इस समय वह धरती के चारों तरफ 233x71,351 किलोमीटर की अंडाकार कक्षा में चक्कर लगा रहा है. कल यानी 25 जुलाई 2023 की दोपहर 2 से 3 बजे के बीच अगली ऑर्बिट मैन्यूवरिंग होगी. तब इसकी एपोजी 71,351 किलोमीटर से बढ़ाकर एक लाख किलोमीटर के आसपास की जाएगी.
इसरो वैज्ञानिकों चंद्रयान-3 को 1 लाख किलोमीटर की ऑर्बिट में इसलिए डालना है, ताकि वह लूनर ट्रांसफर ट्रैजेक्टरी यानी चंद्रमा की ओर जाने वाले हाइवे पर जा सके. लेकिन इस हाइवे पर जाने से पहले चंद्रयान-3 को कितनी स्पीड हासिल करनी होगी. आम भाषा में हम इसे स्पीड में समझते हैं. लेकिन इसरो वैज्ञानिक इसे वेलोसिटी के तौर पर गिनते हैं.
इसरो के पूर्व रॉकेट साइंटिस्ट विनोद कुमार श्रीवास्तव ने aajtak.in से खास बातचीत में बताया कि जब चंद्रयान-3 को LVM-3 रॉकेट ने उसकी पहली कक्षा में डाला था, तब चंद्रयान-3 की गति थी 36,968.4 किलोमीटर प्रतिघंटा. यानी 10.269 किलोमीटर प्रतिसेकेंड. यानी चंद्रयान-3 एक सेकेंड में सवा दस किलोमीटर की यात्रा कर रहा था. अभी इसकी गति 36,968 से 40,320 किलोमीटर के बीच है.
धरती से बाहर जाने के लिए चाहिए इतनी स्पीड
चंद्रयान-3 को धरती के ऑर्बिट से बाहर जाने के लिए 40,320 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति हासिल करनी ही होगी. क्योंकि जब एक बार चंद्रयान-3 के इंटीग्रेटेड मॉड्यूल यानी लैंडर और प्रोपल्शन मॉड्यूल का इंजन ऑन होता है. तो उसे तेज गति मिलती है. वह अगले ऑर्बिट में पहुंच जाता है. लेकिन जैसे ही वह एपोजी पर सबसे दूर पहुंचता है. उसकी गति जीरो हो जाती है. पृथ्वी उसे फिर खींच लेती है.
1 अगस्त को चांद के हाइवे पर जाएगा चंद्रयान-3
हर ऑर्बिट में चंद्रयान-3 के साथ यही हो रहा है. प्रोपल्शन मॉड्यूल में दो बड़े ईंधन टैंक हैं. जिनमें अलग-अलग तरह के ईंधन भरे हैं. जिनके मिश्रण से यह यान अंतरिक्ष की यात्रा कर रहा है. चौथे ऑर्बिट तक चंद्रयान-3 धरती का एक चक्कर करीब 22 घंटे में लगा रहा था. लेकिन पांचवां चक्कर हो सकता है और ज्यादा समय में पूरा करे. इसके बाद सीधे लूनर ट्रांजिट ट्रैजेक्टरी में चला जाएगा. ये काम 1 अगस्त को किया जाएगा.
चांद की कक्षा पकड़ना जरूरी, नहीं तो बाय-बाय
इसरो वैज्ञानिक इस चीज का इंतजार कर रहे हैं कि कब चंद्रयान-3 और चंद्रमा अंतरिक्ष में एक लाइन में आएं, यानी एक ही प्लेन पर. ताकि यान सही समय पर चंद्रमा तक पहुंच सकें. 17 अगस्त के आसपास इसरो वैज्ञानिक कोशिश करेंगे कि चंद्रयान-3 चंद्रमा की कक्षा को पकड़ ले. नहीं तो 40,320 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चंद्रमा को बाय-बाय बोलते हुए बगल से निकल जाएगा. मिशन बेकार हो जाएगा.
जब चंद्रयान-3 को 180 डिग्री पलट दिया जाएगा
इसलिए प्रोपल्शन मॉड्यूल में लगे छोटे इंजनों की मदद से चंद्रयान-3 के इंटीग्रेटेड मॉड्यूल को पूरी तरह से विपरीत दिशा में घुमाया जाएगा. यानी 180 डिग्री का टर्न दिया जाएगा. ताकि वह चंद्रमा के ऑर्बिट को पकड़ सके. यह काम चंद्रमा की सतह से करीब 84 हजार किलोमीटर ऊपर होगा. यहां से चंद्रयान की गति धीमी की जाएगी. फिर इसकी गति को कम करके चंद्रयान-3 के लैंडर मॉड्यूल को 100x100 किलोमीटर के गोलाकार कक्षा में डाला जाएगा.
ऐसे कम की जाएगी गति, फिर होगी लैंडिंग
फिर 23 अगस्त को प्रोपल्शन मॉड्यूल गोलाकार ऑर्बिट में घूमता रहेगा. जबकि लैंडर 100x30 किलोमीटर की कक्षा में आते हुए, अपनी गति को कम करके 8,568 किलोमीटर प्रतिघंटा से कम करेगा. चांद की कक्षा को पकड़कर रखने के लिए किसी भी स्पेसक्राफ्ट को 1 किलोमीटर प्रतिसेकेंड यानी कम से कम 3600 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति चाहिए होती है. फिर इसकी गति कम करके लैंडर को दक्षिणी ध्रुव के पास उतारा जाएगा.