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स्वाद बढ़ाने वाले धनिए को कहा गया शैतानी बूटी, क्यों दुनिया का एक हिस्सा धनिया से करता है नफरत?

पंद्रहवीं सदी में ताजे हरे धनिए की तराशी हुई पत्तियां शराब में डालकर पी जाती थीं. माना जाता था कि इससे यौन ताकत बढ़ती है. यानी धनिया तब एफ्रोडिजिएक डायट का हिस्सा था. अब यही धनिया सब्जियों से लेकर चटनी का स्वाद बढ़ा रहा है. हिंदुस्तान की तो इसे मोहब्बत ही समझिए. वहीं दुनिया के कई हिस्से ऐसे हैं, जहां लोग इसे शैतानी बूटी कहकर दूर भागते हैं.

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धनिए की पत्तियों समेत डंठल और बीज भी हम स्वाद ले-लेकर खाते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
धनिए की पत्तियों समेत डंठल और बीज भी हम स्वाद ले-लेकर खाते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

उत्तर भारत की झोलदार सब्जियां हों, या मध्य भारत के नाश्ते में चाव से खाया जाता पोहा- ऊपर से हरा धनिया डालने पर रंग के साथ-साथ जो चटखदार खुशबू आती है, वो खाने का मजा बढ़ा देती है. किचन की मसालेदानी में भी पिसा हुई धनिया पावडर जरूर रहता है. कम से कम हिंदुस्तान में. दूसरी ओर दुनिया के कई देश ऐसे हैं, जो धनिया से नफरत करते हैं. इतनी नफरत कि इसे डेविल्स हर्ब यानी शैतानी बूटी भी कहा गया. इसपर हम जैसे धनिया-प्रेमी काफी समय तक हैरान होते रहे, लेकिन ये उनकी गलती नहीं. साइंस ने मासूम धनिए से कुछ खास देशों, या लोगों की चिढ़ का कारण खोज निकाला है, जो कि जीन से जुड़ा है.

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क्या है धनिए का इतिहास?
जड़ी और मसाले, दोनों ही श्रेणियों में आने वाला धनिया से रसोई की पहचान बहुत पुरानी है. लगभग 5 हजार ईसा पूर्व इसके बीजों का प्रमाण मिल चुका और यहां तक कि बाइबल में भी एक जगह इसका जिक्र है. 

खटमल से हुई तुलना
जिस धनिए की पत्तियों समेत डंठल और बीज भी हम स्वाद ले-लेकर खाते हैं, उसके नाम का इतिहास वैसे खास मजेदार नहीं. ये ग्रीक शब्द कोरोस से निकला है, जिसका मतलब है बदबू मारने वाला कीड़ा या खटमल. कई जगहों पर इसे स्टिंकिंग हर्ब भी कहा गया. यहीं से समझ लीजिए कि क्यों और कैसे कुछ लोग इससे कितनी नफरत करते होंगे.

यौन इच्छा जगाने वाला माना गया
धनिए का इस्तेमाल पुराने समय में अलग-अलग तरीके से होता रहा. सब्जियों में मसाले या शोरबा में सजावट के लिए तो ये डाला ही जाता रहा, साथ ही इसे यौन ताकत बढ़ाने वाली बूटी भी कहा जाता था. 15वीं से 16वीं सदी के बीच यूरोप में ताजा धनिया की पत्तियां शराब पर छिड़ककर परोसी जाती थीं ताकि यौन संबंधों की इच्छा जागे. यही वजह है कि इसे एफ्रोडिजिएक डायट की श्रेणी में भी रखा गया.

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वहां राजे-महाराजों के अहाते में खास कोना होता, जहां बेहद अच्छी क्वालिटी का धनिया उगाया और खाने में डाला जाता था. धीरे से ये भी समझ आया कि यौन ताकत भले दे, न दे, लेकिन पेट की छोटी-मोटी परेशानियों का इलाज ये जरूर करता है. फिर इसे शोरबे और जूस की तरह भी पिया जाने लगा. 

why do some hate coriander reason is genetic
धनिए से बहुत से लोगों को साबुन की तेज गंध आती है. (Pixabay)

तो इतने फायदों के बाद भी क्या कोई धनिए को नापसंद करता है?
जबाव है- हां. लगभग पूरा का पूरा ऑस्ट्रेलिया इससे दूर भागता है. यहां तक कि धनिया को मोस्ट हेटेड हर्ब भी कहा जा चुका. 14 साल पहले  I Hate Coriander Day की शुरुआत हुई, जिसमें लोग अपने जैसे लोगों से जुड़ने और दर्द बांटने लगे कि धनिए की गंध भी उन्हें बीमार करने लगती है. तब से हर साल 24 फरवरी को धनिया-हेटर्स इस दिन को सेलिब्रेट करते हैं. 

साइंटिस्ट ने की स्टडी
आधी से ज्यादा दुनिया में बेहद शौक से खाए जाने वाली इस चीज से कुछ ही लोग इतना क्यों कतराते हैं, इसपर साइंस ने काफी माथापच्ची की और जवाब भी खोज निकाला. साल 2012 में कैलीफोर्निया की एक कंपनी 23andme, जो कि जीनोमिक्स और बायोटेक्नोलॉजी पर काम करती है, ने इसपर स्टडी की. 50 हजार लोगों के सैंपल साइज को लेकर हुई स्टडी में पाया गया कि धनिए से चिढ़ यूं ही नहीं, बल्कि एक जीन की वजह है. 

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इसलिए आती है साबुन की गंध 
OR6A2 नाम के इस जीन की जरूरत से ज्यादा सक्रियता के कारण लोगों को धनिए की ताजा पत्तियों और पिसे हुए मसाले से भी साबुन जैसी गंध आने लगती है. ऐसा एल्डिहाइड की वजह से होता है. ये एक केमिकल कंपाउंड है, जो धनिए में पाया जाता है. ये भी पता लगा कि ऑस्ट्रेलियाई मूल के अलावा यूरोप के भी कुछ हिस्सों में इस जीन की वजह से धनिया-हेटर्स की बड़ी बिरादरी है. इनमें ज्यादातर महिलाएं हैं. बिल्कुल यही नतीजा कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के शोध में भी मिला. 

बन जाए हिंदुस्तानी बूटी!
दुनिया के किसी हिस्से में चाहे, जो कहा जाए, हम एशियाई, खासकर भारतीय लोग धनिए से बहुत प्यार करते हैं. हालांकि इस प्यार के बावजूद धनिए को उतनी इज्जत नहीं मिल सकी, जितना प्याज या करी पत्ते को. यही वजह है कि साल 2022 के मध्य में एक भारतीय शेफ रणबीर ब्रार ने एक साइन पिटीशन चलाई, जिसमें मांग थी कि धनिए को राष्ट्रीय हर्ब घोषित किया जाए. तुरत-फुरत इससे दसियों हजार लोग जुड़ गए. याचिका को फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज के मंत्री पशुपति कुमार पारस को भेज भी दिया गया. फिलहाल मामले पर कोई फैसला नहीं आया है, लेकिन इतना पक्का है कि हिंदुस्तान में बनती लगभग कोई भी डिश धनिए के बिना अधूरी है.

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