सबसे पहले जानिए चारों बड़े शहरों में अलग-अलग स्टेशनों पर दर्ज AQI के बीच का अंतर कितना है. यानी सबसे साफ हवा और गंदी हवा के बीच का आंकड़ा. ये आज का डेटा है. जिसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने जारी किया है.
मुंबई... 41 से 139
बेंगलुरू... 37 से 146
चेन्नई... 76 से 185
कोलकाता... 67 से 94
और अब जानिए दिल्ली की स्थिति ... 189 से 327. चारों मेट्रो शहर के किसी भी स्टेशन से दिल्ली का प्रदूषण स्तर दोगुना या उससे ज्यादा है. पर क्यों...
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दिल्ली में प्रदूषण की पांच वजहें हैं...
1. पराली जलाना... जहर बनने की शुरूआत
हर साल पंजाब और हरियाणा में जैसे ही ठंड का मौसम आने लगता है, पिछली फसलों के बचे हुए हिस्सों को जलाया जाता है. इन्हें पराली जलाना (Stubble Burning) कहते हैं. इस बार मॉनसून देरी से गया है तो पिछली फसल की सफाई और अगली फसल की तैयारी भी देर से शुरू हुई है. इसलिए इन राज्यों में खेतों में पराली जलाने का मामला भी लेट से शुरू हुआ. यानी ये लंबे समय तक चलेगा.
2. हवा की दिशा... जहर को पहुंचाने का काम
दिल्ली की हवा में जहर घोलने में बड़ा योगदान हवा का भी है. यानी हवा की दिशा (Wind Direction). हवा की दिशा, गति और नमी ये तीनों फैक्टर दिल्ली-NCR के फेफड़ों में जहर भरते हैं. मॉनसून के बाद और सर्दियों से पहले हरियाणा-पंजाब की तरफ से हवा दिल्ली की तरफ चलती है. ये हवा पाकिस्तान की तरफ से आती है. जिसमें बारी धूलकणों की मात्रा ज्यादा होती है.
इस हवा के साथ पराली जलाने से निकलने वाला जहरीला धुआं भी आता है. चुंकि मॉनसून के जाने के ठीक बाद हवा में नमी होती है. ये भारी होती है, चारों तरफ स्मोग (SMOG) नीचे दिखता है. हवा की दिशा बदले तो स्थिति सुधर सकती है.
3. तापमान का बदलना... जहर बढ़ाने का काम
दिल्ली की सर्दियों में लगातार होने वाले तापमान के बदलाव से भी प्रदूषण बढ़ता है. इसे टेंपरेचर इन्वर्शन (Temperature Inversion) कहते हैं. इससे ठंडी हवा के ऊपर गर्म हवा की परत बनती है. जिससे सारे प्रदूषणकारी तत्व सतह पर ही रुक जाते हैं. तापमान में बदलाव की वजह गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण, उद्योग, पराली जलाना ... कुछ भी हो सकता है.
4. गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण... सोने पर सुहागा
दिल्ली की आबादी शहर के क्षेत्रफल के हिसाब से ज्यादा है. साथ ही गाड़ियों की संख्या भी बहुत ज्यादा है. दिल्ली में 25 फीसदी PM2.5 उत्सर्जन गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण की वजह से होता है. दिल्ली के अंदर और आसपास बनी इंडस्ट्री से निकलने वाले गैस और केमिकल्स की वजह से भी वायुमंडल में बदलाव आता है. प्रदूषण बढ़ता है.
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5. प्रदूषण के अन्य सोर्स... जो बढ़ाते हैं मुसीबत
सूखे इलाकों से आने वाली सूखी हवा के साथ रेत के कण. दिवाली के दौरान पटाखों से निकलने वाले केमिकल और उत्सर्जन, घरेलू बायोमास का जलाना भी सर्दियों में प्रदूषण को बढ़ा देता है. IIT कानपुर की स्टडी के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में 17-26 फीसदी PM उत्सर्जन बायोमास के जलाने से होता है.
अब तो दीवाली आ रही है. दिल्ली में पटाखों पर शत-प्रतिशत बैन कागजों पर तो होगा. लेकिन प्रैक्टिकली ये संभव नहीं है. दिल्ली के आसपास के जिलों में तो पटाखें फूटेंगे. लोग मानेंगे नहीं. इसकी वजह से प्रदूषण जानलेवा स्तर तक बढ़ेगा. गर्मी के साफ आसमान से लेकर सर्दियों के धुंधले आकाश तक दिल्ली की हवा बिगड़ती चली जाती है.
बाकी बड़े शहरों में ऐसा क्यों नहीं होता?
मुंबई...
तटीय इलाका. समुद्री ठंडक प्रदूषणकारी तत्वों को साफ करने में मदद करती है. औद्योगिक कार्य कम होते हैं. कम फैक्ट्रियां हैं. ग्रीन कवर जैसे संजय गांधी नेशनल पार्क और अन्य हरे-भरे इलाकों से फायदा. वेस्ट मैनेजमेंट दिल्ली से बेहतर. समुद्र की वजह से तापमान औसत रहता है. यानी मॉडरेट टेंपरेचर और ह्यूमेडिटी.
बेंगलुरू...
गार्डेन सिटी के नाम से फेमस. भारी मात्रा में ग्रीनरी. पार्क. शहर की जमीन सामान्य तौर पर ऊंचाई वाले स्थान पर है. इससे प्रदूषणकारी तत्व स्थिर नहीं रहते. आईटी हब है लेकिन प्रदूषण वाली फैक्ट्रियां कम हैं. वेस्ट मैनेजमेंट बेहतर है. जलवायु शानदार है. तापमान मध्यम दर्जे का रहता है. ह्यूमेडिटी मॉडरेट रहती है.
चेन्नई...
मुंबई की तरह तटीय इलाका. समुद्री ठंडक की वजह से प्रदूषणकारी तत्व हवा में कम घुलते हैं. तेज हवाएं चलती हैं. इसलिए पॉल्यूशन टिकता नहीं. शहर के बाहर के इलाकों में औद्योगिक क्षेत्र विकसित हैं. इसलिए शहर में प्रदूषण कम है. ऐतिहासिक कॉमर्शियल सेंटर है. उद्योग कम हैं. वेस्ट मैनेजमेंट अच्छा है.
कोलकाता...
मॉनसून में यहां की सारी गंदगी और प्रदूषणकारी तत्व बह जाते हैं. ऊपर से गंगा नदी का बड़ा इलाका. समंदर से मेलजोल. नदी प्रदूषण कम कर देती है. पार्क हैं. गार्डेन हैं. वेटलैंड्स हैं. औद्योगिक एक्टिविटी कम है.
फिर दिल्ली में ही मुसीबत क्यों...
दिल्ली लैंडलॉक्ड है. यानी चारों तरफ जमीन ही जमीन. न ढंग की नदी. न समंदर. इससे प्रदूषण फंसता है. आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा है. लगातार हो रहा निर्माण. दिल्ली में चारों तरफ कंस्ट्रक्शन चलता रहता है. गाड़ियों का प्रदूषण ज्यादा. पराली जलती है. तापमान पलटता है. इससे प्रदूषण रुक जाता है. वेस्ट मैनेजमेंट खुद ही देख लीजिए... तीन-तीन कचरे के पहाड़ हैं. तेजी से हो रहा शहरीकरण.