पूरे देश के लिए यह एक खराब खबर हो सकती है. अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार मॉनसून में बारिश कम होगी. दुनिया भर के एक्सपर्ट इस बात को मान भी रहे हैं. वो एक खास तरह के शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसकी वजह से बारिश कम होने के आसार हैं. मॉनसून सीजन जून से सितंबर तक होता है. पिछली साल अच्छी बारिश हुई थी. इसके बावजूद देश का 17% इलाका सूखे की चपेट में रहा.
पिछली साल जिन इलाकों बारिश कम हुई थी, वो हैं- उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में गंगा के मैदानी इलाके और उत्तर पूर्व के कुछ राज्य. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) के मुताबिक ये साल अल-नीनो (El-Nino) या एन्सो न्यूट्रल ईयर (ENSO-neutral year) हो सकता है. इसका मतलब ये है कि मॉनसून में सामान्य से कम बारिश हो सकती है.
पिछले साल मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, मॉनसून में 925 मिलीमीटर बारिश हुई थी. जबकि, सामान्य बारिश का आंकड़ा 868.6 मिमी था. 2021 में सामान्य से 1 फीसदी कम बारिश हुई थी. जबकि, 2020 में 9 फीसदी और 2019 में 10 फीसदी ज्यादा बारिश हुई थी.
गर्मियों में अल-नीनो की तरफ इशारा
नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फियरिक साइंस के रिसर्च साइंटिस्ट अक्षय देवरास ने CSE को बताया कि अभी के हिसाब से 2023 की गर्मियां अल-नीनो यानी एन्सो-न्यूट्रल की तरफ इशारा कर रहा है. अल-नीनो, ला-नीना और न्यूट्रल फेज अल-नीनो साउदर्न ऑसीलेशन के हिस्से हैं. जो वायुमंडलीय सर्कुलेशन को बदलते हैं. पहले समझते हैं कि ये अल-नीनो और ला-नीना क्या हैं?
अमेरिकन जियोसाइंस इंस्टिट्यूट के अनुसार अल-नीनो और ला-नीना शब्द का संदर्भ प्रशांत महासागर की समुद्री सतह के तापमान में समय-समय पर होने वाले बदलावों से है, जिसका दुनिया भर में मौसम पर प्रभाव पड़ता है. अल-नीनो की वजह से तापमान गर्म होता है और ला-नीना के कारण ठंडा.
क्या है अल-नीनो?
ट्रॉपिकल पैसिफिक यानी ऊष्ण कटिबंधीय प्रशांत के भूमध्यीय क्षेत्र में समुद्र का तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में आने वाले बदलाव के लिए जिम्मेदार समुद्री घटना को अल-नीनो कहते हैं. इस बदलाव की वजह होती है समुद्री सतह के तापमान का सामान्य से अधिक हो जाना. यानी सामान्य से 4 से 5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा होना. इसकी वजह ग्लोबल वॉर्मिंग भी हो सकती है.
भारत के मॉनसून वाले मौसम पर क्या असर होगा?
अल-नीनो का दुनियाभर के मौसम पर बड़ा असर होता है. बारिश, ठंड, गर्मी सबमें अंतर दिखता है. राहत की बात ये है कि ये अल-नीनो या ला-नीना हर साल नहीं, बल्कि 3 से 7 साल में आते हैं. अल-नीनो में प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी-भूमध्यरेखीय इलाके के सतह का तापमान तेजी से बढ़ता है.
पूर्व दिशा से पश्चिम की ओर बहने वाली हवाएं कमजोर हो जाती है. इसकी वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की सतह का गर्म पानी भूमध्य रेखा के साथ-साथ पूर्व की ओर बढ़ता है. इससे बारिश में बदलाव आता है. कम बारिश वाली जगहों पर ज्यादा बारिश होती है. यदि अल-नीनो दक्षिण अमेरिका की तरफ सक्रिय है तो भारत में उस साल कम बारिश होती है. जो इस बार दिख रहा है.
सर्दियां ला-नीना में बीतीं, गर्मियां न्यूट्रल यानी मॉनसून में कमी
कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी के मुताबिक 2020 में शुरू हुआ ला-नीना अब फरवरी से अप्रैल 2023 के बीच अल-नीनो में बदल रहा है. यानी एन्सो-न्यूट्रल हो रहा है. इसका असर जून से अगस्त के बीच देखने को मिलेगा. क्योंकि प्रशांत महासागर का पश्चिमी हिस्सा गर्म हो रहा है.
अक्षय देवरास कहते हैं कि पश्चिमी प्रशांत महासागर की सतह के नीचे पानी लगातार गर्म हो रहा है. यह तेजी से मध्य प्रशांत की ओर बढ़ रहा है. इसलिए मार्च से मई 2023 के बीच न्यूट्रल फेज 78 फीसदी तक होने की उम्मीद है. यानी भारत के लिए बुरी खबर है. क्योंकि सर्दियों में ला नीना था. जो गर्मियों को एन्सो-न्यूट्रल में बदल रहा है. मॉनसून में सामान्य से 15 फीसदी कम तक बारिश होने की आशंका है. इसमें सुधार हो सकता है, अगर आर्कटिक से पैदा होने वाली हवाएं देर से बारिश करा दें. जैसा- साल 2021-22 में हुआ था.
ला-नीना क्या है?
भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर इलाके की सतह पर निचली हवा के दबाव से यह बनता है. इसके आने की कई वजहें हो सकती हैं. लेकिन बड़ी वजह होती है ट्रेड विंड. यानी पूर्वी दिशा से बहने वाली हवा की गति काफी तेज होती है. इससे समुद्री सतह का तापमान कम हो जाता है. सीधा असर दुनियाभर के तापमान पर होता है. तापमान औसत से कम हो जाता है.
ला-नीना अपनी गति से उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की दिशा को बदल देती है. उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में बहुत अधिक नमी पैदा होती है. भारत में इस दौरान भयंकर ठंड पड़ती है और बारिश भी ठीक-ठाक होती है. इससे इंडोनेशिया और आसपास के इलाकों में काफी बारिश होती है. वहीं लैटिन अमेरिका में सूखा की स्थिति बन जाती है. ला नीना से आमतौर पर उत्तर-पश्चिम में मौसम ठंडा और दक्षिण-पूर्व में मौसम गर्म होता है.
पिछले साल मॉनसून के बाद हुई बारिश
देश में 36 मौसम संभाग हैं. इनमें से 40% इलाके को कवर करने वाले 12 संभागों में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है. वहीं, 43% इलाके को कवर करने वाले 18 संभागों में सामान्य. 6 संभागों में सामान्य से कम बारिश हुई. ये संभाग देश 17% इलाके को कवर करते हैं. इन इलाकों में सामान्य से 20% से 59% तक बारिश कम हुई है.
देश के इन इलाकों में रहा सूखा
मौसम विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन इलाकों में सामान्य से 20 फीसदी से ज्यादा कमी रही, उनमें मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. सितंबर में बारिश ठीक हो गई थी. नहीं तो ज्यादा सूखे के हालात होते. इस इलाके में जून में सामान्य की तुलना में 92% बारिश हुई. जबकि, जुलाई में 117%, अगस्त में 103% और सितंबर में 108% ज्यादा बारिश हुई.
2022 में 1874 बार 'भारी बारिश', जबकि 296 बार 'बहुत भारी बारिश' हुई. वहीं, 2021 में 1636 बार 'भारी बारिश' और 273 बार 'बहुत भारी बारिश' हुई थी. भारी बारिश तब मानी जाती है, जब 115.6 मिमी से 204.6 मिमी तक पानी बरसता है. और जब 204.5 मिमी से ज्यादा पानी बरसता है तो उसे बहुत भारी बारिश माना जाता है.