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इंसान दो पैरों पर क्यों चलता है? अगर नहीं चलता तो क्या फुटबॉल खेल पाता...

अगर लियोनेल मेसी या किलियन एम्बाप्पे दो पैरों पर दौड़ नहीं रहे होते, तो क्या वो फुटबॉल खेल पाते. आखिर ये और इनके जैसे सभी 800 करोड़ इंसान दो पैरों पर क्यों चलते हैं? चार पैर होते तो आज इंसानों का क्या होता? इंसानों ने कब शुरू किया था दो पैरों पर चलना? क्या इसके पीछे बड़ी वजह है?

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चिम्पैंजी और ओरंगुटान इस समय इकलौते ऐसे जीव हैं, जो इंसानों और वानरों दोनों की तरह चलते हैं. (फोटोः गेटी)
चिम्पैंजी और ओरंगुटान इस समय इकलौते ऐसे जीव हैं, जो इंसानों और वानरों दोनों की तरह चलते हैं. (फोटोः गेटी)

फुटबॉल वर्ल्ड कप (FIFA Football World Cup) में लियोनेल मेसी (Lionel Messi) ने दौड़ते हुए गोल दागे. पूरे मैच को दौरान अर्जेंटीना और फ्रांस के खिलाड़ी दौड़ते रहे. आखिर वो दौड़ किस पर रहे थे. जवाब है- अपने पैरों पर. पर मेसी और किलियन एम्बाप्पे जैसे दुनिया में 800 करोड़ से ज्यादा लोग मौजूद हैं, जो दो पैरों पर चलते हैं. इंसानों ने अपने दो पैरों पर चलना कब शुरू किया? 

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इंसान स्तनधारी जीवों (Mammals) में आता है. लेकिन सभी स्तनधारी जीवों से एकदम अलग है. इंसानों ने दो पैरों पर चलना करीब 45 लाख साल पहले शुरू किया. अब इनकी चाल को समझने के लिए हमें पहले चिम्पैंजी (Chimpanzee) की संस्कृति, संचार और भावनाओं को समझने की जरुरत है. क्योंकि वो इंसानों के ही पूर्वज हैं, जिनमें इंसानों जैसी संस्कृति धुंधले स्वरूप में मौजूद हैं. वो इंसानों के साथ दुनिया में हैं. जी रहे हैं. रह रहे हैं. 

दो पैरों पर चलने को बाइपेडलिज्म कहते हैं. इसका फायदा ये है कि आपके हाथ फ्री रहते हैं. (फोटोः एपी)
दो पैरों पर चलने को बाइपेडलिज्म कहते हैं. इसका फायदा ये है कि आपके हाथ फ्री रहते हैं. (फोटोः एपी)

दो पैरों पर चलने को बाइपेडलिज्म (Bipedalism) कहते हैं. इंसानों के दो पैरों पर चलने की प्रक्रिया, शुरुआत और अब तक का इवोल्यूशन लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है. वैज्ञानिक ये जरूर मानते हैं कि दो पैरों पर चलना, चार पैरों पर चलने की तुलना में आर्थिक और ऊर्जा के मामले में ज्यादा सुरक्षित और क्षमतावान है. जब आप दो पैरों पर चलना शुरू करते हैं, तब आपके दोनों हाथ फ्री हो जाते हैं. ऐसे में आप उन हाथों का इस्तेमाल कई तरह के क्रिएटिव कार्यों में कर सकते हैं. यंत्र बना सकते हैं. खाना पका सकते हैं. और न जाने क्या-क्या? जैसा इंसानों ने किया. 

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असल में दो पैरों पर चलना एक तरह की मजबूरी थी. एडॉप्शन था. यानी ऐसा काम जो करना जरुरी नहीं था लेकिन जरूरी बन गया. क्योंकि विकसित होते इंसानों को ऊंचाई पर जाना था. जगहें घूमनी थीं. पेड़ों पर चढ़ना था. तेज दौड़ना था. इसलिए सवाना के मैदानों में वो धीरे-धीरे अपने पिछले पैरों पर खड़े होने लगे. ये कहानी है कोई 40 से 80 लाख साल पहले की. दो पैरों पर चलने की वजह से जमीन पर चलना आसान हो गया. खाना-पीना आसान हो गया. क्योंकि इंसानों का हाथ फ्री हो गया. 

प्राइमेट की प्रजाति होमिनिन भी दिखाते हैं इंसानों जैसी चाल. (फोटोः गेटी)
प्राइमेट की प्रजाति होमिनिन भी दिखाते हैं इंसानों जैसी चाल. (फोटोः गेटी) 

इसके विरोध में भी दलीलें हैं. जब आप कुछ वानरों (Ape) की प्रजातियों की होमिनिन एनाटॉमी (Hominin Anatomy), पैलियो-इकोलॉजी (Paleo-Ecology) और व्यवहार को देखेंगे तो ऊपर लिखी बातों का विरोध करने लगेंगे. जैसे कि होमिनिन ने पेड़ों पर चढ़ने के लिए कई तरह के एडॉप्शन किए थे. उनके हाथ लंबे थे, कंधे और कलाइयां काफी ज्यादा मोबाइल थे. यानी वो उसे जरुरत के मुताबिक घुमा-फिरा सकते थे. ये सभी लक्षण आज भी पेड़ों पर रहने वाले हमारे रिश्तेदार प्राइमेट्स या वानरों में हैं. 

कुछ ऐसी स्टडीज भी आई हैं जिससे पता चलता है कि होमिनिन घास के मैदानों में नहीं रहते थे. जैसे- बुशबक्स और कोलोबस मंकी. ये बहुत ऊंचे पेड़ों पर नहीं जाते थे लेकिन वुडलैंड्स में रहते हैं. सिर्फ एक ही उदाहरण है, जो यह बताता है कि हम इंसान कैसे वानरों की तरह चलते-चलते दो पैरों पर आ गए. ये है ओरंगुटान (Orangutan). ओरंगुटान के अगले हाथ ज्यादा लंबे होते हैं. क्योंकि उन्हें ऊंची डालियों को पकड़ना होता है. जैसे-जैसे वो इंसानों में तब्दील होते गए. पैर लंबे और हाथ छोटे होते चले गए. 

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एक कहानी ये भी है कि होमिनिन कम ऊंचाई वाले पेड़ों से उतर कर घास के मैदानों की तरफ आए. वहां वो विकसित होने लगे. फिर दो पैरों पर चलने लगे. अब आप खुद ही देख लीजिए कि इंसानों के दो पैरों पर चलने की कहानी कितनी जटिल है. अब यहां कहानी शुरू होती है इस्सा चिम्पैंजी (Issa Chimpanzee) की. 

इंसानों को दो पैरों पर चलने के कई फायदे मिलते हैं. वह बाकी स्तनधारी जीवों से कई मामले में बेहतर है. (फोटोः अन्स्प्लैश)
इंसानों को दो पैरों पर चलने के कई फायदे मिलते हैं. वह बाकी स्तनधारी जीवों से कई मामले में बेहतर है. (फोटोः अन्स्प्लैश)

इस्सा चिम्पैंजी एक वुडलैंड में रहती है. बीच-बीच में घास के मैदान हैं. वैज्ञानिकों ने उसे 15 महीने ट्रैक किया. उसके रहने के स्थान, खाने-पीने के तरीके, व्यवहार, उछल-कूद, चाल-ढाल सब पर नजर रखी. यहां तक कि उसके आराम करने और खुद को सुंदर बनाने की प्रक्रिया पर भी. वैज्ञानिकों को लगता था कि चिम्पैंजी ज्यादातर समय जमीन पर बिताते होंगे. घूमते-टलहते होंगे. यह बात सच साबित हुई. 

इस्सा चिम्पैंजी ज्यादातर समय जमीन पर रही. उसने पेड़ों पर, डालियों पर समय कम बिताया. इसका मतलब ये नहीं है कि वह पेड़ों पर चढ़ना नहीं चाहती. लेकिन ज्यादा ऊंचे पेड़ों पर उसने समय कम बिताया. यह बताता है कि इस्सा चिम्पैंजी धीरे-धीरे मैदानों की ओर बढ़ रही है. वह खाना खाने और सोने के लिए ऊंचे पेड़ों पर चढ़ जाती थी ताकि उसका शिकार न हो सके. वह सुरक्षित रहे. इस्सा को जंगली कुत्तों, हाइना, शेर जैसे जीवों से खतरा है. 

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इस्सा की स्टडी करने के बाद पता चला कि पेड़ों पर रहना और बाइपेडलिज्म के बीच में रिश्ता बन-बिगड़ रहा है. हैरानी की बात ये है कि इस्सा पेड़ों पर 85 फीसदी समय अपने दो पैरों पर थी. जबकि जमीन पर चारों का इस्तेमाल कर रही थी. क्योंकि उस समय वह खाते-पीते हैं. ठीक ऐसा ही ओरंगुटान भी करते हैं. यानी दो पैरों पर चलना एक मजबूरी थी. आज भी है. लेकिन इससे सहूलियत इतनी ज्यादा हो गई कि इंसान विकसित होते चले गए. कुछ सालों बाद ये चिम्पैंजी और ओरंगुटान भी इसी तरह चलेंगे.  

इंसानों की तरह सिगरेट पीता चिम्पांजी वायरल

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