दुनिया ने अभी-अभी सबसे गर्म जनवरी का महीना महसूस किया है. जलवायु परिवर्तन की वजह से लगातार गर्मी बढ़ रही है. अभी और आग बरसने वाली है. यह खुलासा यूरोपियन यूनियन कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) के वैज्ञानिकों ने किया है. इसके पहले 2020 की जनवरी गर्म थी. C3S लगातार 1950 गर्म तापमान का रिकॉर्ड रख रही है.
पिछला साल मानव इतिहास का सबसे गर्म साल था. उसके ठीक बाद जनवरी 2024 ने भी सबसे गर्म होने का रिकॉर्ड बना दिया. इस बढ़ी हुई गर्मी की मुख्य वजह इंसानों द्वारा किए जा रहा जलवायु परिवर्तन है. साथ ही इसमें मुख्य भूमिका अल-नीनो निभा रहा है. इससे पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ा हुआ है. वहीं से दुनिया का मौसम बदल रहा है.
C3S की डिप्टी डायरेक्टर समांथा बर्गीस ने कहा कि पिछले साल जून से जितने भी महीने आए वो सब के सब गर्मी का रिकॉर्ड तोड़ रहे थे. हर महीना 2022 के उसी महीने से गर्म था. सिर्फ इतना ही नहीं, प्री-इंडस्ट्रियल काल की तुलना में पिछले 12 महीने 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान था.
ये साल होगा पांच सबसे गर्म साल में शामिल, 99% संभावना
समांथा ने कहा कि तत्काल ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना ही इसका एक इलाज है. नहीं तो दुनिया और गर्म होती चली जाएगी. अमेरिका के वैज्ञानिकों ने भी कहा था कि इस साल भी भयानक गर्मी पड़ेगी. 99 फीसदी संभावना है कि यह साल भी पांच सबसे गर्म साल में एक हो. पिछले महीने अल-नीनो कमजोर पड़ना शुरू हुआ है.
The world just experienced its hottest January on record, continuing a run of exceptional heat fuelled by climate change, the European Union's Copernicus Climate Change Service (C3S) said on Thursday. https://t.co/eMvrH5kp0w https://t.co/eMvrH5kp0w
— Reuters Science News (@ReutersScience) February 8, 2024
मौका है ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तुरंत रोकना होगा
इसका मतबल ये है कि इस साल के अंत तक ला-नीना यानी ठंड वाला मौसम आना शुरू होगा. प्रशांत महासागर ठंडा होने लगेगा. पिछले महीने समुद्री सतह का तापमान सबसे अधिक था. यह 2015 के पेरिस एग्रीमेंट की धज्जियां उड़ा रहा था. हालांकि अब भी मौका है कि इसे ठीक किया जा सके. पेरिस एग्रीमेंट के नियमों का पालन करके सुधार ला सकते हैं.
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देश और सरकारें नहीं कर रही हैं CO2 में कटौती
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पेरिस एग्रीमेंट के टारगेट को पूरा करना प्रैक्टिकल नहीं है. अगर सभी देश और उनकी सरकारें मिल कर तेजी से कार्बन डाईऑक्साइड में कटौती करती हैं तो थोड़ी राहत मिल सकती है. नहीं तो अगले कुछ वर्षों में गर्मी मौत बनकर बरसेगी. कई जगहों पर सूखा पड़ेगा. इससे इंसानों और पर्यावरण दोनों पर असर होगा.