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...तो भाला नहीं, बॉल फेंकते नजर आते अरशद नदीम....खुद बताई अपने जैवलिन थ्रोअर बनने की कहानी

Arshad Nadeem Cricket Story: अरशद नदीम ने गुरुवार की रात 92.97 मीटर भाला फेंक कर ओलंपिक का नया रिकॉर्ड बनाने के साथ स्वर्ण पदक जीता. शुरुआती दिनों में नदीम ने जैवलिन थ्रो में खुद को झोंका नहीं था, वह तो क्रिकेटर के लिए दम लगा रहे थे. पर भाला फेंक ने उनकी किस्मत बदल दी.

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Arshad Nadeem (PTI)
Arshad Nadeem (PTI)

Javelin thrower Arshad Nadeem: पेरिस ओलंपिक की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचने वाले पाकिस्तान के एथलीट अरशद नदीम ने बड़ा खुलासा किया है. दरअसल, शुरुआती दिनों में नदीम ने भाला फेंक में खुद को झोंका नहीं था, वह तो क्रिकेटर के लिए दम लगा रहे थे. पर भाला फेंक ने उनकी किस्मत बदल दी.  

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27 साल के नदीम ने गुरुवार की रात 92.97 मीटर भाला फेंक कर ओलंपिक का नया रिकॉर्ड बनाने के साथ स्वर्ण पदक जीता. नीरज चोपड़ा ने भी इस सीजन का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 89.45 मीटर की दूरी नापकर रजत पदक हासिल किया. यह 11 मुकाबलों में पहला अवसर है, जब नदीम ने चोपड़ा को पीछे छोड़ा.

... क्रिकेट छोड़ भाला फेंकना शुरू कर दिया 

नदीम ने कहा कि पहले वह क्रिकेटर बनना चाहते थे और उन्होंने टेबल टेनिस में भी हाथ आजमाया था. लेकिन नदीम के कोच ने उन्हें जैवलिन में हाथ आजमाने की सलाह दी थी.

उन्होंने कहा,‘ मैं पहले क्रिकेटर था और मैंने टेबल टेनिस भी खेला है और मैं एथलेटिक्स की अन्य प्रतियोगिताओं में भी भाग लेता था.लेकिन मेरे कोच ने कहा कि जिस तरह की मेरी शारीरिक बनावट है उससे मैं भाला फेंक का अच्छा एथलीट बन सकता हूं. इसके बाद 2016 से मैंने अपना पूरा ध्यान भाला फेंक पर लगाया.’

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सुर्खियों में नदीम-नीरज की प्रतिद्वंद्विता

नदीम इस बात से खुश हैं कि भारतीय स्टार नीरज चोपड़ा के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि उनका मानना है कि इससे दोनों देशों के युवा प्रेरित होते हैं. 

व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाला पहला पाकिस्तानी खिलाड़ी बनने के बाद नदीम ने पत्रकारों से कहा,‘जब क्रिकेट मैच या अन्य खेलों की बात होती है तो निश्चित तौर पर उसमें प्रतिद्वंद्विता शामिल होती है. लेकिन यह दोनों देशों के लिए अच्छी बात है जो हमारा और खेल के अपने आदर्श खिलाड़ियों का अनुसरण करके खेलों से जुड़ना चाहते हैं और अपने देश का नाम रोशन करना चाहते हैं.’

वह 1988 के सियोल ओलंपिक में मुक्केबाज हुसैन शाह के मिडिल-वेट में कांस्य पदक जीतने के बाद पाकिस्तान के पहले व्यक्तिगत पदक विजेता भी हैं.

मैदान के बाहर दोनों अच्छे दोस्त हैं

नदीम और चोपड़ा मैदान पर कड़े प्रतिस्पर्धी होने के बावजूद मैदान के बाहर अच्छे दोस्त हैं. कुछ महीने पहले जब नदीम ने एक अच्छा भाला खरीदने के लिए सोशल मीडिया पर धन राशि जुटाने की अपील की तो चोपड़ा ने भी उनका समर्थन किया था.

नदीम ने कहा,‘मैं अपने देश का आभारी हूं. हर किसी ने मेरे लिए दुआ की और मुझे अच्छा प्रदर्शन करने की पूरी उम्मीद थी. पिछले कुछ समय से में घुटने की चोट से परेशान था, लेकिन इससे उबरने के बाद मैंने अपनी फिटनेस पर काम किया. मुझे 92.97 मीटर से आगे भाला फेंकने की पूरी उम्मीद थी लेकिन आखिर में वह प्रयास स्वर्ण पदक जीतने के लिए पर्याप्त साबित हुआ.’

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'मेरा लक्ष्य इससे भी दूर भाला फेंकना है’

छह फुट तीन इंच लंबे नदीम ने कहा,‘मैं कड़ी मेहनत जारी रखूंगा और आगे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करूंगा. मेरा लक्ष्य इससे भी दूर भाला फेंकना है.’

पंजाब क्षेत्र के खानेवाल गांव के रहने वाले नदीम ने कहा, ‘मैं एक किसान परिवार से आता हूं और जब भी मैं पदक जीतता हूं तो अपने अतीत को याद करता हूं, जिससे मुझे और अच्छा प्रदर्शन करने की प्रेरणा मिलती है. यही वजह है कि मैं अब भी विनम्र हूं तथा और अधिक सफल होना चाहता हूं.’

नीरज चोपड़ा अपने करियर में अभी तक 90 मीटर भाला नहीं फेंक पाए हैं, जबकि नदीम पहले भी यह कारनामा कर चुके हैं.

कभी भाला खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे

नीरज के पास जहां हर तरह की सुविधा उपलब्ध हैं, वहीं नदीम ने ऐसा समय भी देखा था जब उनके पास अपने लिए भाला खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे.

नदीम के पिता मोहम्मद अशरफ ने पीटीआई से कहा,‘लोग नहीं जानते हैं कि अरशद इस मुकाम तक कैसे पहुंचा. उसके दोस्त, गांव के लोग और रिश्तेदार उसके लिए चंदा जुटाते थे ताकि वह अभ्यास और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए दूसरे शहरों की यात्रा कर सके.’

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पाकिस्तान ने कुल 7 खिलाड़ियों को पेरिस भेजा और उनमें से 6 अपने-अपने इवेंट्स के फाइनल के लिए क्वालिफाई करने में असफल रहे.

अरशद नदीम और उनके कोच भाग्यशाली क्यों? 

पाकिस्तान का राष्ट्रीय खेल बोर्ड जब यह तय कर रहा था कि पेरिस ओलंपिक के लिए जाने वाले 7 खिलाड़ियों में से किसका खर्च वहन करना है तो उसे केवल अरशद नदीम और उनके कोच ही इस लायक लगे.

नदीम और उनके कोच सलमान फैयाज बट भाग्यशाली थे, जिनके हवाई टिकटों का खर्च पीएसबी (पाकिस्तान स्पोर्ट्स बोर्ड) ने वहन किया.

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