वनडे हो या टेस्ट क्रिकेट या फिर फटाफट गेम T20 सभी में विराट कोहली का जादू बरकरार है. आईपीएल सीजन 9 में चौथा शतक लगाते हुए उन्होंने एक और बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया. आईपीएल के इतिहास में विराट कोहली 4000 रन पूरे करने वाले पहले बल्लेबाज बन गए हैं. वह दिन ब दिन नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं और साथ ही साथ रिकॉर्ड भी तोड़ रहे हैं. वह जब भी फील्ड में आते हैं, प्रशंसक उन्हें ज्यादा से ज्यादा स्कोर बनाते हुए देखना चाहते हैं.
उनके अब तक के पूरे सफर के बारे में बोरिया मजूमदार ने उनसे बात की है. विराट ने भी अपने खेल के बारे में खुलकर अपनी राय रखी है. पढ़ें यह पूरी बातचीत....
आपने अपने पिछले कई मैचों के दौरान जादुई पारी खेली है और मैंने इसे कवर भी किया है. आपको मैं तब से कवर कर रहा हूं, जब आप अंडर-19 के लिए खेलते थे. क्या आप बताएंगे कि आप लगातार इतना अच्छा कैसे खेल लेते हैं और यह आपके लिए कैसे संभव हो पाया है?
फ्रेशनेस के साथ खेलना बहुत ही जरूरी होता है. आप जैसे ही परेशान होंगे, आपका परफॉर्मेंस लेवल गिरता जाएगा. आपके पास पिच के बारे में सोचने का मौका नहीं रहता है. दरअसल मैंने यह सीख लिया है कि कैसे अच्छा मूड रखा जा सकता है. रोजाना खेलने के दौरान मैं अपनी हार्टबीट चेक करता हूं. अगर यह जोर से न धड़क रहा होता है तो मैं समझ जाता हूं कि मैं अच्छे स्पेस में हूं और सही निर्णय ले सकता हूं. यही तरीका है मेरा अपनी इनिंग्स शुरू करने का. इनिंग्स खत्म हो जाने के बाद मै दोबारा अपने मोड में आ जाता हूं. यही कारण है कि मेरी पिछली सारी इनिंग्स एक ही तरीके से शुरू होती हैं.
आपने कहा कि आप यह सब बेहद साधारण तरीके से कर लेते हैं. यह काफी अच्छा है. मैंने इस इंटरव्यू को करने से पहले सचिन तेंदुलकर से पूछा था कि आप विराट कोहली के बारे में क्या सोचते हैं? इस पर उनका जवाब था कि वह यह सब आसानी से कर लेते हैं. लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि गुजरात के खिलाफ आपने शतक लगाया. दोबारा फिर इस टीम के विरुद्ध 100 रन बनाए. जहां तक मुझे याद है कि आप कवर में फील्डिंग भी कर रहे थे. क्या आपकी जिंदगी इन सारी चीजों पर निर्भर करती है? कोई कैसे इतना पैशनेट और कमिटेड हो सकता है?
सबसे जरूरी बात है खेल को रिस्पेक्ट देने की. हर एक गेंद जो मैं खेलता हूं, उस पर अपना 120 पर्सेंट देता हूं. यहां तक कि टेस्ट मैच में भी अगर 88वां ओवर चल रहा है तो भी मैं अपना बेस्ट देना चाहता हूं. मुझे वह समय अच्छी तरह याद है जब मैं काफी यंग था और इंटरनेशनल क्रिकेट में आने की कोशिश में लगा हुआ था. आपको कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि आप कहां से आए हैं. यह चीज मेरे दिमाग में हमेशा कहीं न कहीं बनी रहती है. हो सकता है कि मेरे अच्छे परफॉर्मेंस की वजह यही हो. जब तक मैं फिट और फाइन हूं, मैं यह सारी चीजें करता रहूंगा.
आपने अपनी स्ट्रगल का जिक्र किया इसलिए मैं आपको थोड़ा पीछे ले जाऊंगा. 2011/12 मेलबर्न, सिडनी 2011/12 और उसके बाद पर्थ और फिर वो 75 रन, इसके बाद एडिलेड जहां आपने 116 रन बनाए. क्या आप बताएंगे कि सिडनी और पर्थ के बीच में क्या अंतर आया? मेरे हिसाब से वह क्रिकेट के विराट कोहली का जन्म था. वह स्टार जिसे हम आज देखते हैं और जिसके बारे में बातें करते हैं, वह सिडनी और मेलबर्न की अपेक्षा अब कहीं बेहतर हो गया है?
वो काफी बेचैन कर देने वाले दिन थे क्योंकि मैं वेस्टइंडीज के खिलाफ अच्छा नहीं खेल पाया था. उस समय मेरी पीठ में भी कुछ परेशानी थी और वह ठीक होने में समय ले रही थी. मैं उस समय इंग्लैंड दौरे पर भी नहीं जा पाया क्योंकि मैं अच्छा नहीं खेल रहा था. इसके बाद फिर मुझे मौके मिलने शुरू हो गए. मैं अपने टेस्ट करियर को फिर से ट्रैक पर लाने की कोशिश कर रहा था. मुझे फिर ऑस्ट्रेलिया दौरे पर भेजा गया. मेलबर्न में कुछ खास नहीं हो पाया. सिडनी भी कुछ ठीक नहीं रहा. मुझे खुद पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा था.
लेकिन अब जब में पीछे देखता हूं तो पाता हूं कि जो होगा वो होकर रहेगा. कुछ चीजें तभी आपके पास आती हैं जब आप उसे शिद्दत से चाहते हैं. मुझे नहीं पता कि सिडनी के बाद मुझे क्या हुआ. बस मैं अपने आपको यही कहता था कि मेरे नाम 8 वनडे शतक हैं और मैं इस लेवल में खेल सकता हूं. दरअसल आप जब सोचते हैं कि कोई ऐसी शक्ति है जो आपकी मदद करेगी और रास्ता दिखाएगी और वह मौका जब आता है तो आपको ही उसे पकड़ना भी होता है.
विराट कोहली और रन चेस करने का क्या रिश्ता है?
देखिए, मैं आपको फिर कहूंगा कि मैंने अपने खेल में ज्यादा से ज्यादा विश्वास करना शुरू कर दिया है. जब आप इंटरनेशनल क्रिकेट में आते हैं, तब भी अपनी जमीन खोजते रहते हैं. उस समय भी आप अपने गेम को समझने की कोशिश में लगे रहते हैं. आप एक टीम का हिस्सा होते हैं जो ग्यारह लोगों से बनी होती है. मुझे जीत से सबसे ज्यादा खुशी मिलती है और मेरे अंदर इसकी सबसे ज्यादा भूख है. रन चेस करने के बारे में मैं इतना जानता हूं कि मेरे सामने एक टार्गेट है अगर हम उसे पूरा करते हैं तो जीत मिलेगी और उसी पल का मुझे इंतजार रहता है जिसे मैं अपने टीममेट्स के साथ पाना चाहता हूं.
क्या आप बताएंगे कि आप प्रेशर में कैसे मैनेज करते हैं. जब आपने T20 मैच में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शानदार पारी खेली थी और पूरा देश सिर्फ विराट, विराट और सिर्फ विराट ही कह रहा था. इतने दबावों को एक साथ कैसे डील करते हैं?
अगर ईमानदारी से बताऊं तो मैं बचपन से ही एवरेज नहीं होना चाहता था. यहां तक कि क्लब क्रिकेट के समय भी सबसे ज्यादा नंबर बनाना चाहता था. उस समय भी लोग मुझे एरोगेंट कहते थे. मैं जिस तरह अपनी बातें कोच से कह लेता था, वह भी लोगों को अखरती थी. लेकिन मुझे खुशी है कि इसके बावजूद मैं नहीं बदला. सबसे ज्यादा जरूरी होता है कि आप खुद को समझें. ऐसा कुछ भी नहीं है जो पाया न जा सकता है. हो सकता है कि मेरे अंदर यह गुण नेचुरली आ गया हो लेकिन मैं पॉजिटिव सोचने के लिए तैयार रहता हूं. फिर चाहे मुझ पर कितना भी ज्यादा प्रेशर ही क्यों न हो.
यह तो वाकई काफी अच्छा है. आपने एरोगेंट शब्द यूज किया. मुझे याद है कि ढाका के एक मैच के दौरान जब आपने 183 रन बनाए. उस समय आपने अपने प्रशंसकों को ऑटोग्राफ दिए, प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया. मुझे उस समय भी लग रहा था कि यह लड़का एरोगेंट तो नहीं ही हो सकता है. आपके बारे में सभी बातें करते हैं. सौरभ अक्सर आपका जिक्र करते हैं कि आपने इंडियन टीम में एक जज्बा भर दिया है...
हां, कप्तानी का गुण मुझमें कुदरती आया है. हो सकता है कि शुरुआत में मैं खुद को साबित न पाया होऊं. पहले मैं अलग-अलग खिलाड़ियों को हैंडल नहीं कर सका लेकिन अब पूरी यूनिट एक ही दिशा में चल रही है. चाहे वह फिटनेस कल्चर हो या न्यूट्रिशन हो. हर बैट्समैन देश को जिताने के लिए कभी भी खेलने को तैयार रहता है.
आपने देखा होगा कि अजिंक्य रेहाने ने दिल्ली टेस्ट मैच में दो शतक लगाए. वह माइलस्टोन के बारे में नहीं सोच रहा था बल्कि टीम क्या चाहती है, इस पर ध्यान दे रहा था. ये चीजें उसमें आ रही हैं. मेरा मतलब यह है कि हम सब यह फैक्ट जानते हैं कि हमें किसी भी तरह से जीतकर आना है. इस प्रोसेस में जो कोई भी आगे रहेगा, उसकी परफॉर्मेंस को पूरा टीम एंजॉय करेगा. ऐसा इसलिए होता है कि हम सभी जानते हैं कि हम अपना 120 पर्सेंट देंगे. एक कैप्टन के रूप में आप इससे ज्यादा कुछ नहीं चाह सकते हैं. जब तक टीम पैशन और कमिटमेंट के साथ मैच खेलेगी, तब तक आप जीतते रहेंगे.
आपने फिटनेस कल्चर की बात की. क्या आप इस बारे में विस्तार से बता सकते हैं? आप कई तरीकों से इंडियन मैन के सिंबल बन चुके हैं. क्या आप बताएंगे कि आप अपने शरीर को कैसे मेंटेन रखते हैं?
पिछले कुछ महीने मेरे लिए काफी बदलाव वाले रहे. जो ट्रेनिंग पहले मैं कर रहा था, उसे मैंने फिर शुरू कर दिया है. मैंने पिछले साल इसे श्रीलंका टेस्ट सीरीज के दौरे में सीखा. इसलिए इस बात का सारा क्रेडिट हमारे ट्रेनर शंकर बासु को जाता है. वह मेरे साथ RCB में भी हैं. वह ऐसे आदमी हैं जिन्हें स्पोर्ट्स फिटनेस के बारे में छोटी से छोटी बात भी पता है. वह बखूबी जानते हैं कि एक फास्ट बॉलर को क्या चाहिए, किसी स्पिनर की क्या जरूरत है, विकेट कीपर को किस चीज की जरूरत होती है और एक बैट्समैन की जरूरत क्या है? उन्हें हर चीज के बारे में अच्छी जानकारी है. वो मुझे इतना आगे ले गए हैं, जहां तक जाने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता.
एक समय था जब मैं डेड लिफ्ट्स में एक निश्चित भार को नहीं उठा पाता था लेकिन मैं अब ऐसा कर लेता हूं. उन्होंने मुझे धैर्य रखना सिखाया. इस चीज ने मुझे काफी बदल दिया. अब मैं थकान में भी खुद में एनर्जी महसूस करता हूं. यह सब डाइट और ट्रेनिंग की वजह से हुआ है.
मेरा अगला सवाल यह है कि क्या आपको इस टाइप की ट्रेनिंग 40-45 डिग्री की गर्मी में खेलने में मदद करेगा. ऐसी स्थिति में जब हम सिर्फ 30 मिनट के लिए भी बाहर खड़े होते हैं तो तकलीफ होने लगती है. खासकर आप जैसे लोगों के लिए जो इतनी ज्यादा गर्मी में 100 का स्कोर बनाते हैं. गुजरात को ही लें, जहां आपने 6,6,4,6,6 जैसे कारनामे किए. दरअसल हम में से किसी ने भी इतने अच्छे स्कोर की उम्मीद नहीं की थी. यहां तक कि मैंने भी नहीं. कहां से इतनी ताकत आती है आपमें?
ईमानदारी से कहूं तो यह सब आपकी तैयारी पर निर्भर करता है. यही तरीका है क्रिकेट जैसे खेल को खेलने के लिए. मेरे लिए मोटिवशन यह है कि मैं कितनी जल्दी 0 से 100 पर पहुंच सकता हूं. इसलिए मुझे उस तरह ट्रेनिंग भी करनी होती है. यहां तक कि मेरा कार्डियो सेशन भी हाई इंटेन्सिटी का होता है. हाई एल्टीट्यू़ड के मास्क पहन कर ट्रेनिंग होती है जहां आप ठीक से सांस भी नहीं ले पाते हैं. आपको अपने फेफड़ों को बढ़ाना होता है. मैं ऐसी ही सारी प्रैक्टिस करता हूं. यह सब इंटरवल ट्रेनिंग का हिस्सा हैं.
यही तरीका होता है जानने का कि आपकी बॉडी फील्ड में क्या चाहती है. इसलिए यह बहुत ही आसान कैलकुलेशन है लेकिन इसकी समझ अवेयरनेस से ही आ पाती है. फील्ड पर इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है और यह आपका साथ अंत तक निभाती है.
सचिन तेंदुलकर के साथ आपकी तुलना होती है तो कैसा महसूस होता है? सचिन तेंदुलकर की बायोग्राफी लिखने होने के कारण मैं जानता हूं कि आपके और उनके बीच के संबंध काफी अच्छे हैं. आपकी और उनकी तुलना हर कोई कर रहा है.
सच कहूं तो यह सुनकर मुझे काफी खराब लगता है क्योंकि यह उनके लिए सही नहीं है. सचिन की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है, यह मेरा अपना विचार है. दरअसल यह इसलिए सही नहीं है क्योंकि हम अलग-अलग कैलिबर के बैट्समैन की तुलना एक साथ करते हैं. मेरा खेल साल दर साल सुधर रहा है लेकिन वह कुछ ऐसे हैं जो एक अच्छी क्वॉलिटी के साथ पैदा ही हुए थे. उन्होंने लगातार 24 साल इस चीज को बनाए रखा. ऐसा करना मजाक नहीं है.
अभी मैं दो या तीन साल से ही अच्छा परफॉर्म कर रहा हूं इसलिए इतनी जल्दी तुलना करना कहीं से भी जायज नहीं है. मैं जब भी उनके बारे में सोचता हूं तो प्रभावित होता हूं लेकिन मैं सिर्फ मैं ही रहना चाहता हूं जो कि सचिन की प्रेरणा से ही है. दरअसल सचिन ऐसे हैं जिनसे हम लोगों ने बहुत कुछ सीखा है. तो सीखने वाले और सिखाने वाले की तुलना एक ही श्रेणी में रखकर नहीं की जा सकती है. इस जेनरेशन के जितने खिलाड़ी खेल रहे हैं, सचिन उनसे दो लेवल ऊपर हैं. आप 100 शतक से कैसे किसी की तुलना कर सकते हैं. जब भी वो 100 स्कोर करते थे, लोग उनसे और ज्यादा की उम्मीद करते थे..
आप काफी अच्छी बातें भी कर लेते हैं और आपके शब्द भी काफी सधे हुए होते हैं. लेकिन क्या आप अपने एग्रेशन के बारे में कुछ बताएंगे?
आप सही कर रहे हैं. मेरा मतलब है कि यह कुछ ऐसा है, जिसके साथ मैं पैदा हुआ हूं. मेरे पिताजी लियो थे इसलिए मैं समझ सकता हूं कि यह एग्रेशन कहां से आता है. मैं खुद स्कॉर्पियो हूं. इस जोडिएक के साइन काफी हठी होने और अपने बातों को मजबूती से रखने की ओर इशारा करते हैं. दरअसल एग्रेशन यहीं से आता है. मैं पहले भी बता चुका हूं कि यह हमारी फैमिली में ही है. मैं मानता हूं कि मैंने कभी-कभी एग्रेशन की सीमाएं भी तोड़ी हैं. लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने इन गलतियों से बहुत कुछ सीखा है. मैंने यह सीखा और जाना है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं.
लेकिन मैं कठिन मेहनत से कभी नहीं भागा हूं. मैंने कभी अपना एग्रेशन दूसरों के कारण नहीं बदला. हां, जब मुझे लगा कि इसकी जरूरत है तो मैंने ऐसा किया क्योंकि मुझे लगा कि इससे बेकार में ही आपकी एनर्जी खत्म होती है जिसका उपयोग मैं अपने गेम में कर सकता हूं. वहीं, दूसरी तरफ जब एग्रेशन की जरूरत एनर्जी के लिए हो तो मैं हमेशा इसका उपयोग करता हूं.