स्कैमर्स लोगों को टार्गेट करने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, आप कुछ बातों का ध्यान रखकर साइबर वर्ल्ड में खुद को सुरक्षित रख सकते हैं. हाल फिलहाल में IVR (इंटरैक्टिव वॉयस रिस्पॉन्स) कॉल्स के जरिए ठगी के कई मामले सामने आए हैं. इस तरह के मामलों में सामान्यतः आपको एक कॉल आती है.
इस कॉल में एक प्री-रिकॉर्डेड मैसेज होता है. फ्रॉड्स वाली कॉल में अमूमन बताया जाता है कि आपके क्रेडिट कार्ड पर इतने रुपये का बकाया है या फिर आपके कार्ड से ट्रांजेक्शन हुआ है. अगर आपने ये भुगतान नहीं किया है, तो आप 2 दबाएं. अगर कोई शख्स स्कैमर्स के जाल में फंस जाए, तो इसके बाद ठगी का असली खेल शुरू होता है.
फ्रॉड के ऊपर हम आगे चर्चा करें, लेकिन पहली चुनौती होती है कि ऐसी कई कॉल्स बैंक से भी आती हैं. अगर आप कोई बड़ा ट्रांजेक्शन ऑनलाइन करते हैं तो आपको बैंक से भी कॉल आती हैं. बैंक कन्फर्म करना चाहता है कि ये ट्रांजेक्शन आपके ही द्वारा किया गया है या किसी और ने किया है.
सवाल ये आता है कि बैंक की कॉल और किसी फ्रॉड IVR में अंतर कैसे समझा जाए. पहले तो ये समझिए कि बैंक से आने वाली कॉल किसी मोबाइल नंबर से नहीं होगी. बैंक से आने वाली कॉल्स लैंडलाइन जैसे नंबर से होती हैं, जो 160 प्रीफिक्स से या फिर उस एरिया के कोड के प्रीफिक्स के साथ आती हैं.
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वहीं फ्रॉड IVR कॉल्स के ज्यादातर मामलों में पाया गया है कि ये नंबर सामान्य मोबाइल नंबर वाली सीरीज के होते हैं. यानी जैसा हमारा और आपका मोबाइल नंबर होता है उस नंबर से आने वाली IVR कॉल्स से आपको सावधान रखना चाहिए.
इसके अलावा बैंक आपसे आपकी पर्सनल डिटेल्स नहीं मांगता है. यानी आपके आधार, पैन कार्ड, बैंक अकाउंट या फिर क्रेडिट कार्ड की डिटेल्स बैंक नहीं मांगता है. अगर कोई आपसे इस तरह की डिटेल्स मांग रहा है, तो आपको उसे अपनी कोई भी जानकारी नहीं देनी चाहिए. इसकी वजह से आपके साथ फ्रॉड हो सकता है.
कैसे फंसाते हैं स्कैमर्स?
इस तरह की कॉल करने वाले स्कैमर्स वॉयस फिशिंग स्कैम का इस्तेमाल करते हैं. इसमें आपको प्री-रिकॉर्डेड मैसेज सुनाया जाएगा, जो पूरी तरह से असली कॉल जैसा लगता है. मान लेते हैं आपने कोई लोन नहीं लिया है या फिर क्रेडिट कार्ड से कोई ट्रांजेक्शन नहीं किया है, तो आप इस IVR कॉल से जवाब में 'नहीं' वाले ऑप्शन को चुनेंगे.
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इसके बाद स्कैमर्स आपसे पर्सनल डिटेल्स मांग सकते हैं. जैसे आपको अपनी कार्ड डिटेल्स देनी होंगी, जिससे ये चेक हो सके कि ये ट्रांजेक्शन कैसे हुआ है. अगर आप अपने कार्ड की डिटेल्स शेयर करते हैं, तो फिर आपकी जमा पूंजी लुट सकती है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड कई टूल्स हैं जो आईवीआर कॉलिंग में वॉयस क्लोनिंग के लिए यूज किए जाते हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से ऐसा लगता है जो आवाज आप सुन रहे हैं वो किसी ऑफिसर की है. ये काम रियल टाइम होता है और पूरी तरह से रिकॉर्डेड भी नहीं होता है.
वॉयस क्लोनिंग बन रहा है बड़ा चैलेंज
वॉयस क्लोनिंग की वजह से आम लोग ये नहीं समझ पाते हैं कॉलर असली है स्कैमर. आवाज को क्लोन करके किसी थानेदार या ऑफिसर की टोन ऐड कर देते हैं. इतना ही नहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिेजेंस की मदद से कॉल के दौरान विक्टिम के बारे में कुछ ऐसी पर्सनल इनफॉर्मेशन शेयर करते हैं जो वो शॉक्ड हो जाते हैं.
हालांकि इसके लिए स्कैमर्स काफी समय तक सोशल इंजीनियरिंग और रेकी करके विक्टिम के बारे में समझते हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से विक्टिम का पैटर्न भी प्रेडिक्ट कर लेते हैं.