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ICC World Cup Final 2023: क्या है Ultra-Edge टेक्नोलॉजी? जो बनती है अंपायर की तीसरी आंख

ICC World Cup Final 2023: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रविवार को वर्ल्ड कप 2023 का फाइनल खेला जाना है. इस फाइनल मैच में तमाम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा. इन तमाम टेक्नोलॉजी में से एक Ultra-Edge है, जो Snickometer का विकसित रूप है. इस टेक्नोलॉजी की मदद से अंपायर्स को तमाम फैसले लेने में मदद मिलती है. आइए जानते हैं इसकी डिटेल्स.

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क्या होती है Ultra-Edge टेक्नोलॉजी?
क्या होती है Ultra-Edge टेक्नोलॉजी?

ICC World Cup Final 2023: इंटरनेट मेन्स क्रिकेट वर्ल्ड कप 2023 का फाइनल रविवार 19 नवंबर को हो रहा है. भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फाइनल खेला जाना है. दोपहर दो बजे से शुरू होने वाले इस मैच में तमाम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा. क्रिकेट में आपने कई तरह की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होते हुए देखा होगा. 

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हां, ये जरूर हो सकता है कि आपने इन टेक्नोलॉजी पर ध्यान नहीं दिया हो, लेकिन इन्हीं टेक्नोलॉजी के बदौलत थर्ड अंपायर अपना फैसला बना पाते हैं. ऐसे ही एक टेक्नोलॉजी Ulrta-Edge है. आपने कई बार देखा होगा थर्ड अंपायर फैसला लेते हुए एक खास टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं. 

इसमें आपको एक ग्राफ दिखता है. बॉल के बैट पर टच होने पर इसपर आपको रीडिंग दिखती है. इस तरह से अंपायर अपना फैसला आसानी से ले पाते हैं. आइए जानते हैं Ultra-Edge टेक्नोलॉजी क्या है और क्रिकेट में इसे कैसे यूज किया जाता है. 

क्या है Ultra-Edge टेक्नोलॉजी?

क्रिकेट में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल लंबे वक्त से हो रहा है. स्टंप में कैमरा और माइक का यूज किया जाता है. ऐसी कई टेक्नोलॉजी हैं, जो आपको क्रिकेट में देखने को मिलती हैं. बात करें Ultra Tech टेक्नोलॉजी की, तो ये स्किनोमीटर का एडवांस वर्जन है, जो एज डिटेक्शन के लिए इस्तेमाल किया जाता है. 

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Snickometer टेक्नोलॉजी को ब्रिटिश कम्प्युटर साइंटिस्ट Allan Plaskett ने विकसित किया था. इस टेक्नोलॉजी को साल 1999 में UK के चैनल 4 द्वारा पहली बार इस्तेमाल किया गया था. अल्ट्रा एज टेक्नोलॉजी के टेस्ट और सर्टिफिकेशन के बाद ICC ने इंटरनेशनल क्रिकेट में इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी. 

इस टेक्नोलॉजी को Massachusetts Institute of Technology (MIT) के इंजीनियर्स द्वारा टेस्ट किया जा चुका है. इस टेक्नोलॉजी में स्टंप के बीच में माइक प्लेस की जाती है. इसके अलावा पिच के इर्द गिर्द कई सारे कैमरे इंस्टॉल किए जाते हैं. जैसे ही बॉल बैट से टच होती है, एक अलग तरह की आवाज आती है. 

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इस आवाज को विकट में लगा माइक कैच करता है और इसे ट्रैकिंग स्क्रीन पर डिटेक्ट करता है. स्टंप में लगा माइक बैट और पैड की आवाज के बीच के अंतर को पहचान सकता है. इसलिए बॉल बैट पर टच हुई है या फि पैड पर इसका पता चल जाता है. वहीं पिच पर लगाए गए कैमरे तमाम एंगल से बॉल पर नजर रखने में मदद करते हैं. 

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क्या कोई कमी भी है?

हर डिस्प्ले पर कुछ वेव्स (तरंगे) दिखती हैं, जो वास्तव में बैट से बॉल के टच होने पर आती हैं. इसका इस्तेमाल बैट्समैन के आउट या नॉट-आउट होने के फैसले के लिए किया जाता है. अब सवाल आता है कि क्या इस टेक्नोलॉजी में कोई कमी है. तमाम टेक्नोलॉजी की तरह ये भी परफेक्ट नहीं है. इस वजह से कई बार गलती भी हो सकती है. 

कुछ मौकों पर माइक किसी एक्सटर्नल साउंड को पिक कर लेता है. दूसरी दिक्कत है जब बैट पिच को टच करे और बॉल भी उसी वक्त उससे टच हो. ऐसे में कन्फ्यूजन क्रिएट होता है. तीसरा ग्लिच उस वक्त देखने को मिलता है, जब बॉल प्लेयर के शरीर और बैट दोनों से एक साथ टच होती है.

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