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द्वारिकाधीश

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द्वारिकाधीश

द्वारिकाधीश मंदिर

द्वारकाधीश मंदिर (Dwarkadhish Temple), जिसे जगत मंदिर (Jagat Mandir) के नाम से भी जाना जाता है, भगवान कृष्ण को समर्पित एक हिंदू मंदिर है. इन्हें यहां द्वारकाधीश (Dwarakadheesh) या 'द्वारका के राजा' (King of Dwarka) के नाम से पूजा जाता है. यह मंदिर भारत के गुजरात के द्वारका शहर में स्थित है, जो हिंदू तीर्थ यात्रा सर्किट, चार धाम (Char Dham Pilgrimage) के स्थलों में से एक है. द्वारिकाधीश मंदिर के पुष्टिमार्ग मंदिर (Pushtimarg Temple) होने के कारण यह वल्लभाचार्यों (Vallabhacharya) द्वारा बनाए गए दिशानिर्देशों और अनुष्ठानों का पालन करता है.

मान्यताओं के मुताबिक, मूल मंदिर का निर्माण भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ (Krishna's Grandson Vajranabha) ने हरि-गृह यानी कृष्ण के निवास स्थान के ऊपर किया था. यह 72 स्तंभों (72 Pillars) पर खड़ी एक पांच मंजिला इमारत है, जिसे मुख्य मंदिर, जगत मंदिर या निज मंदिर भी कहा जाता है. मंदिर में एक सभा हॉल या श्रोता हॉल (Assembly Hall or Audience Hall) है. मंदिर में दो महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार हैं, एक मुख्य प्रवेश द्वार है जिसे मोक्ष द्वार (Moksha Dwar) भी कहा जाता है और निकास द्वार जिसे स्वर्ग द्वार (Swarga Dwar) के रूप में जाना जाता है. 

इसकी मूल संरचना को 1472 में महमूद बेगड़ा (Mahmud Begada) ने नष्ट कर दिया गया था, बाद में 15वीं-16वीं शताब्दी में इसे फिर से बनाया गया. यह मंदिर भारत में हिंदुओं द्वारा पवित्र माने जाने वाले चार धाम तीर्थयात्रा का हिस्सा है. 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व हिंदू धर्मशास्त्री और दार्शनिक आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने इस मंदिर का दौरा किया. अन्य तीन धामों में रामेश्वरम, बद्रीनाथ और पुरी शामिल हैं. आज भी, मंदिर के भीतर एक स्मारक उनकी यात्रा को समर्पित है. द्वारकाधीश उपमहाद्वीप पर विष्णु का 98वां दिव्य देशम है (98th Divya Desam of Vishnu), जिसे दिव्य प्रबंध पवित्र ग्रंथों में महिमामंडित किया गया है. 

द्वारिकाधीश मंदिर का मुख पश्चिम की ओर है. मंदिर के लेआउट में एक गर्भगृह (निजमंदिर या हरिगृह) और एक अंतराल (एक एंटेचैम्बर) शामिल हैं. पुरातत्ववेदियों के मुताबिक यह मंदिर लगभग 2,500 साल पुराना है जिसका 15वीं-16वीं शताब्दी में विस्तार किया गया था. 

मंदिर का शिखर 78 मीटर ऊंचा है और उस पर सूर्य और चंद्रमा के प्रतीकों वाला एक बहुत बड़ा झंडा फहराया जाता है. तिकोने आकार का ये झंडा 50 फीट लंबा होता है जिसे दिन में चार बार बदला जाता है. श्रद्धालुओं से मिलने वाले दान से प्राप्त धन को मंदिर के ट्रस्ट फंड में जमा किया जाता है, जिससे मंदिर का संचालन और रखरखाव किया जाता है.
 

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