16 जून 2013 को उत्तराखंढ (Uttarakhand) के केदारनाथ (Kedarnath) वासियों को प्रलयकारी बाढ़ का सामना करना पड़ा था. बाढ़ की यह त्रासदी सदियों तक लोगों के जेहन में रहेगी. इस आपदा में हजारों लोगों की जानें चली गईं. कई घरों का नामोनिशान मिट गया. केदारनाथ और इसका तीर्थ स्थान दोनों इस प्राकृतिक आपदा की चपेट में आए थे, लेकिन जल प्रलय में भी मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ (Kedarnath Disaster 2013).
बादल फटने से आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन, 2004 की सूनामी के बाद से देश की सबसे खराब प्राकृतिक आपदा थी. उस महीने हुई बारिश राज्य में आमतौर पर होने वाली बारिश से कहीं अधिक थी, जिसके कारण नदियों में मलबे भरने लगे और पानी तीव्र गति से रिहायशी इलाकों में फैल गया (Kedarnath Flood 2013).
केदारनाथ त्रासदी में बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए. 16 जुलाई 2013 तक, उत्तराखंड सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 5,700 से अधिक लोगों को मृत घोषित कर दिया गया था. कुल मृतकों में 934 स्थानीय निवासी शामिल थे. मरने वालों की संख्या बाद में 6,054 बताई गई (Kedarnath Disaster Casualties 2013).
पुलों और सड़कों के नष्ट होने से लगभग 3,00,000 तीर्थयात्री और पर्यटक घाटियों में फंस गए. भारतीय वायु सेना, भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से 1,10,000 से अधिक लोगों को प्रभावित क्षेत्र से बाहर निकाला (Kedarnath Disaster 2013 Rescue Operation).
केदारनाथ के पैदल यात्रा मार्ग में भीमबली में पूरा का पूरा पहाड़ ही दरक कर मंदाकिनी नदी में गिर गया. नदी का प्रवाद रुक गया. एक तरफ तालाब बन गया. ठीक वैसा ही नजारा जैसा साल 2013 में था. किस्मत अच्छी थी कि किसी तरह के जानमाल का नुकसान नहीं हुआ. लेकिन हादसा भयावह था.
भारत के 80 फीसदी जिले एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स के शिकार हो रहे हैं. यानी ऐसी मौसमी घटनाएं जो अचानक हो जा रही है. वो भी बेहद तीव्र और घातक स्थिति के साथ. चरम गर्मी और चर्म बारिश की घटनाएं बढ़ गई हैं. वायनाड, मंडी, शिमला, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग जैसे हादसे अभी आपके सामने हुए हैं. यहीं हैं चरम मौसमी आपदाएं.
क्या होता है भूस्खलन? क्यों होता है? क्या इसकी भविष्यवाणी हो सकती है? क्यों ये पता नहीं चल पाया कि वायनाड में पहाड़ लुढ़कते हुए आएगा और 360 से ज्यादा लोगों की जान ले लेगा. केदारनाथ का रास्ता रोक देगा. मंडी और शिमला में दर्जनों लोगों की मौत का जिम्मेदार होगा. रुद्रप्रयाग में आफत ले आएगा.
दिल्ली के बुराड़ी में केदारनाथ धाम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है. हालांकि, शिलान्यास के बाद मंदिर के नाम को लेकर विवाद शुरू हो गया और उत्तराखंड में विरोध प्रदर्शन होने लगे थे. इस पर केदारनाथ धाम दिल्ली ट्रस्ट के संस्थापक सुरेंद्र रौतेला ने कहा कि ट्रस्ट ने मंदिर का नाम बदलने का फैसला लिया है.
क्या केदारनाथ घाटी समेत पूरे उत्तराखंड के हिमालय पर नया खतरा पनप रहा है. क्योंकि मौसम विभाग ने भारी बारिश, बादल फटने और फ्लैश फ्लड की चेतावनी दी है. साथ ही उत्तराखंड सरकार 13 खतरनाक ग्लेशियल लेक्स की स्टडी कराने जा रही है. क्या इन दोनों घटनाओं से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हिमालय में बसा यह राज्य फिर नई आपदा झेलेगा?
मॉनसून के आने के साथ ही हिमालय खून के आंसू रोने लगता है. हर साल बादल फटने और फ्लैश फ्लड की घटनाएं सामने होती हैं. एक नई स्टडी में यह खुलासा हुआ है कि यह लगातार बढ़ती जा रही है. इसकी वजह है लगातार बढ़ता तापमान, पहाड़ों की ऊंचाई और जलवायु परिवर्तन.
फ्रांस और स्विट्जरलैंड में एल्प्स के पहाड़ों पर ग्लेशियल लेक टूटी, जिससे इन दोनों देशों की तीन-चार नदियों में फ्लैश फ्लड आ गया. फ्रांस का ला बेरार्डे गांव तो पूरी तरह से तबाह हो गया है. स्विट्जरलैंड का जरमैट भी पानी में डूबा हुआ है. चारों तरफ पानी ही पानी है.
दुनिया का तीसरा ध्रुव (Third Pole) तेजी से पिघल रहा है. जिसकी वजह से भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. इन जगहों पर हिमालय से कभी भी आफत आ सकती है. नई स्टडी में यह डरावना खुलासा हुआ है कि पिछले 30 वर्षों में हिमालाय के 10 हजार ग्लेशियर पिघले हैं. जिनसे खतरनाक ग्लेशियल लेक्स बन रहे हैं.
सिक्किम में आई फ्लैश फ्लड की वजह सिर्फ बादल फटना नहीं है. बादल एक ग्लेशियल लेक के ऊपर फटे. पानी के तेज बहाव और दबाव में लेक फट गई. जिससे पूरे उत्तरी सिक्किम में भयानक बाढ़ आ गई. ये ग्लेशियर चुंगथांग जिले के ऊपरी हिस्से में है, जो सिक्किम के खतरनाक 14 ग्लेशियल लेक में से एक है.
केदारनाथ हादसे की बड़ी वजह चोराबारी ग्लेशियर पर हो रहा हिमस्खलन. लगातार तेज बारिश और चोराबारी झील की दीवार टूटना था. इस झील के टूटने से निकले पानी और मलबे के बहाव ने पूरी केदारघाटी का नक्शा बदल दिया. जानिए क्या हुआ था उस दिन... जब चोराबारी झील की दीवार टूटी थी.
'हिमालयी सुनामी' के बाद केदारनाथ धाम बर्बाद हो चुका था. 6 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे. हजारों लोग लापता हो गए थे. 4500 से ज्यादा गांव प्रभावित हुए थे. लेकिन इस घटना को हुए आज दस साल हो चुके हैं. रास्ता, कस्बा, सुविधाएं सब बदल गई हैं. लेकिन जो नहीं बदली वो है लोगों की आस्था.
हिमाचल प्रदेश को दो दिनों की बारिश में हजारों करोड का नुकसान सहना पड़ा लेकिन ये खतरे का ट्रेलर भर है. पहाड़ों का जिस तरह दोहन हो रहा है, विकास के नाम पर जिस तरह मनमानी हो रही है, वो सबूत है कि हमने पहाड़ों को भारी खतरे में धकेल दिया है. देखें रिपोर्ट.
Flood Situation in Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड में आई आफत के पीछे की वजह क्या है? मौसम की फिर वही स्थिति बनी है, जो 10 साल पहले केदारनाथ हादसे के समय बनी थी. आसमान में फिर एक बार दो घातक आफतों का संगम हुआ है. जिसने हिमाचल प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड की हालत खराब कर रखी है.
10 Years of Kedarnath Tragedy: 10 साल बाद आज भी दिखते हैं केदारनाथ में आए प्रलय के निशान. देखिए आज तक डिजिटल की एक्सक्ल्यूज़िव वीडियो.
16-17 जून 2013, ये वो दिन था जब चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों में भयानक बारिश, बाढ़ और भूस्खलन हुए. इन जिलों के कुछ इलाके पूरी तरह से बर्बाद हो गए, कुछ तो नक्शे से ही गायब. जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह.
तबाही से पहले केदारनाथ, चोराबारी झील समेत कई गांव और कस्बों की क्या हालत थी. आपको इन तस्वीरों के जरिए पता चल जाएगा. तस्वीरें वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों से हासिल हुईं हैं, जो इन जगहों की स्टडी करने घटना से पहले और बाद में गए थे.
केदारनाथ घाटी में बीच का पड़ाव है रामबाड़ा. ये एक छोटा सा कस्बा था, जो केदारनाथ प्रलय के समय पूरी तरह से गायब हो गया. घाटी के नक्शे से खत्म हो चुका है. एक पुराने पुल के खंभे दिखते हैं. पुराने लोगों के साथ नए लोग भी बस गए हैं. दुकानें चला रहे हैं. जानिए कैसे खत्म हुआ था रामबाड़ा...
देवों की भूमि उत्तराखंड का सबसे पवित्र और दुर्गम माना जाने वाला तीर्थस्थल है केदारनाथ. केदारनाथ धाम तक पहुंचना कठिन है. इसके बावजूद वहां लाखों लोग भगवान शिव का दर्शन करने जाते हैं. लेकिन केदार घाटी की खूबसूरती देखते बनती है. आप भी देखिए प्राकृतिक सुंदरता की Photos...