उल्कापिंड
एक उल्कापिंड (Meteoroid) बाहरी अंतरिक्ष में एक छोटा चट्टानी या धातु से बना पिंड है (Small Rocky or Metallic Body in Outer Space). उल्कापिंड क्षुद्रग्रहों की तुलना में काफी छोटे होते हैं. इसका आकार छोटे अनाज से लेकर एक मीटर चौड़ी वस्तुओं तक होता है (Size of Meteoroid). इससे छोटी वस्तुओं को सूक्ष्म उल्कापिंड या अंतरिक्ष धूल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है. अधिकांश उल्कापिंड धूमकेतु या क्षुद्रग्रहों के टुकड़े होते हैं, जबकि बाकी के टुकड़े टकराव के प्रभाव से बने मलबे हैं जो चंद्रमा या मंगल जैसे पिंडों से निकाले गए हैं (Formation of Meteoroid).
जब कोई उल्कापिंड, धूमकेतु या क्षुद्रग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में आमतौर पर 20 किमी/सेकंड यानी 72,000 किमी/घंटा से अधिक की गति से प्रवेश करता है, तो उस वस्तु का वायु में गति की ताप से प्रकाश की एक लकीर पैदा करता है. इस घटना को उल्का या "शूटिंग स्टार" कहा जाता है (Formation of Meteor or Shooting Star). उल्काएं आमतौर पर तब दिखाई देती हैं जब वे समुद्र तल से लगभग 100 किमी ऊपर होती हैं (Meteors Visibility from Earth). कई उल्काओं की एक श्रृंखला जो सेकंड या मिनट के अंतराल पर दिखाई देती है और आकाश में एक ही निश्चित बिंदु से उत्पन्न होती है, उल्का बौछार कहलाती है (Formation of Meteor Shower).
अनुमान के मुताबिक, 25 लाख उल्कापिंड, माइक्रोमीटरोइड्स और अन्य अंतरिक्ष मलबा हर दिन पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 15,000 टन सामग्री हर साल वायुमंडल में प्रवेश करती है (Frequency of Meteors in Earth’s Atmosphere).
वैज्ञानिकों ने पृथ्वी का दूसरा चंद्रमा खोजा है. यह धरती के साथ-साथ सूरज के चारों तरफ चक्कर लगाता है. इसे क्वासी मून या क्वासी सैटेलाइट कहा जाता है. यानी ऐसा पत्थर जो किसी ग्रह के चारों तरफ चक्कर लगाते हुए जुड़ा रहता है. जैसे हमारा असली चांद धरती के साथ जुड़ा हुआ है.
राजस्थान में स्थित रामगढ़ क्रेटर को पर्यटन क्षेत्र के रूप में डेवलप किया जाएगा. इसके लिए तीन विभागों को जिम्मेदारी दी गई है. करोड़ों का बजट इस काम के लिए सरकार ने दिया है. बता दें कि रामगढ़ क्रेटर की खोज साल 1869 में की गई थी. यह 60 करोड़ साल पहले उल्कापिंड गिरने से बना था.
मकान की मालकिन ने कहा- यह (उल्कापिंड) घर की छत तोड़ते हुए सीधे बेडरूम में पहुंच गया. पहले लगा कि किसी ने पत्थर फेंका होगा. लेकिन जब ऊपर देखा तो पता चला कि यह छत तोड़कर नीचे आया था. गनीमत रही कि उस वक्त वहां कोई नहीं था.
आपके खाने का मेन्यू एक उल्कापिंड की वजह से बदला था. वह भी करोड़ों साल पहले. इसी उल्कापिंड ने डायनासोरों को मारा था. आप यह जानकर हैरान होंगे लेकिन यह बात साइंटिफिकली सही है. सिर्फ बड़ी प्राकृतिक आपदा ने हम इंसानों के खाने के मेन्यू को बदल दिया था. आइए जानते हैं कैसे?
सौर मंडल से भी पुराने उल्कापिंड पर वैज्ञानिकों को जीवन के तत्व मिले हैं. वो तत्व जो जीवन की शुरुआत करते हैं. यह अपने आप में बड़ी खोज है. यानी सौर मंडल में जीवन की शुरुआत की वजह उल्कापिंड भी हो सकते हैं. आइए जानते हैं कि वैज्ञानिकों को असल में क्या मिला है?
14 दिसंबर 2022 यानी कल आसमान में हर घंटे 120 उल्कापिंडों की बारिश होगी. यह जेमिनिड मेटियोर शॉवर है. हम आपको बताते हैं कि आप यह आसमानी आतिशबाजी कैसे और कहां से देख सकते हैं? ये भी कि ये उल्कापिंड आ कहां से रहे हैं?
शख्स जिसे बरसों से सोने का पत्थर समझकर संभाल रहा था, वह उससे भी ज्यादा कीमती निकला. क्योंकि यह पत्थर उसे ऑस्ट्रेलिया के उस इलाके से मिला था, जहां पर सोने की खदानें हैं. लेकिन यह पत्थर इस दुनिया का था ही नहीं. यह किसी दूसरी दुनिया से ऑस्ट्रेलिया में आया था.
2021 में, ब्रिटेन के शहर विंचकोम्बे (Winchcombe) में अंतरिक्ष से एक उल्कापिंड (Meteorite) आकर गिरा. ये 460 करोड़ साल पुरानी चट्टान थी. उस उल्कापिंड में थोड़ा पानी भी था. उस पानी और पृथ्वी के पानी की रासायनिक संरचना काफी मिलती-जुलती थी. शोधकर्ताओं का मानना है कि ये उल्कापिंड बता सकता है कि पृथ्वी पर पानी कहां से आया.
450 करोड़ साल पुराना एक उल्कापिंड धरती पर कई साल पहले आया था. जिसका नाम है ब्लैक ब्यूटी. ये उल्का पिंड मंगल ग्रह पर किस स्थान से निकला था, अब वैज्ञानिकों ने इसका पता लगा लिया है. जानिए उस मंगल ग्रह के उस लोकेशन को...