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नजूल संपत्ति विधेयक

नजूल संपत्ति विधेयक

नजूल संपत्ति विधेयक

उत्तर प्रदेश नजूल संपत्ति विधेयक, 2024 का उद्देश्य नजूल भूमि को निजी स्वामित्व में बदलने से रोककर उसे विनियमित करना है. जो सरकारी स्वामित्व वाली है लेकिन सीधे राज्य की संपत्ति के रूप में प्रबंधित नहीं है. इस विधेयक के तहत, नजूल भूमि को निजी व्यक्तियों या संस्थाओं को हस्तांतरित करने के लिए अदालती कार्यवाही या आवेदन रद्द और खारिज कर दिए जाएंगे. जिससे यह सुनिश्चित होगा कि ये भूमि सरकारी नियंत्रण में रहे. यदि स्वामित्व परिवर्तन के लिए भुगतान किया गया था, तो विधेयक जमा तिथि से भारतीय स्टेट बैंक की सीमांत लागत आधारित उधार दर (एमसीएलआर) पर गणना किए गए ब्याज के साथ रिफंड अनिवार्य होगा.

पारित हुए नजूल संपत्ति विधेयक में प्रावधान किया है. अगर किसी ने नजूल संपत्ति को पट्टा पर लिया है. और पट्टा अनुबंध के नियमों का उल्लंघन न करते हुए किराया नियमित रूप से देता है. तो अनुबंध का नवीनीकरण किया जाएगा. 30 साल के लिए पट्टे का नवीनीकरण होगा. साथ ही अनुबंध का समय पूरा होने पर वह संपत्ति फिर से सरकार के पास आ जाएगी (Nazul Property Bill).

नजूल जमीन की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी. ये भूमि असल में बागियों के थे. जिनपर अंग्रेजों ने जबरन कब्जा कर लिया. आजादी के बाद सरकार ने जमीन मालिकों को उनके पट्टे वापस लौटाने शुरू कर दिए. लेकिन कई जमीनों के वारिस ही नहीं मिले. या फिर ऐसे लोग सामने आए, जिनके पास पूरे कागज नहीं थे. ऐसे में आजाद भारत की सरकार ने जमीन का मालिकाना हक अपने पास ही रखा (Nazul Property).

आजादी के बाद जब्त की गई वही भूमि नजूल कही जाने लगी. राज्य सरकारें नजूल जमीन को लीज पर देने लगी. लीज की मियाद 15 से 99 साल के बीच हो सकती है. पूरे देश में नजूल भूमि है.

ये जमीन जिस राज्य में आती है, उस सरकार की होती है, लेकिन आमतौर पर सरकारें इसे खाली रखने की बजाए एक तय समय के लिए लीज पर दे देती हैं. लीज खत्म होने से पहले रेवेन्यू विभाग में चिट्ठी देकर उसे रिन्यू भी कराया जा सकता है. लेकिन फैसला सरकार के ही हाथ में होता है कि वो जमीन का क्या करना चाहती है. 

ज्यादातर समय प्रशासन इसका इस्तेमाल स्कूल, अस्पताल या पंचायत भवन बनाने के लिए करता है. कई शहरों में यहां हाउसिंग सोसायटी भी बनाई जाती है, जो लीज पर होती है. इसके लिए नजूल लैंड्स (ट्रांसफर) रूल्स 1956 काम करता है. इसमें ये देखा जाता है कि जमीन का टाइप क्या है, यानी क्या वो खेती लायक है, या फिर बंजर है. इसके मुताबिक ही उसे लीज पर दिया जाता है.

 

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