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घोड़ी पर सवार होकर न‍िकली दुल्हन, बारात‍ियों ने जमकर लगाए ठुमके

घोड़ी पर सवार होकर न‍िकली दुल्हन, बारात‍ियों ने जमकर लगाए ठुमके
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दूल्हे को घोड़ी पर चढ़कर दुल्हन के घर बारात ले जाते आपने अक्सर देखा होगा, लेकिन किसी दुल्हन को घोड़ी पर चढ़कर दूल्हे के घर बारात ले जाते शायद ही देखा होगा. (सतना से योगीतारा की र‍िपोर्ट) 

 

 

 

घोड़ी पर सवार होकर न‍िकली दुल्हन, बारात‍ियों ने जमकर लगाए ठुमके
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मध्य प्रदेश में सतना शहर के वलेचा परिवार की इकलौती बेटी घोड़ी पर चढ़कर रवाना हुई. बारात बड़े धूमधाम से सतना से कोटा के लिए दूल्हे के घर रवाना हुई, परिवार ने घोड़ी पर चढ़ने की  बेटी की न सिर्फ ख्वाहिश पूरी की है बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया है कि बेटियां किसी पर बोझ नहीं. बेटा और बेटी में कोई अंतर भी नहीं. जितना अधिकार समाज में बेटों को है उतना ही अधिकार बेटियों को भी दिया जाए.

 

 

घोड़ी पर सवार होकर न‍िकली दुल्हन, बारात‍ियों ने जमकर लगाए ठुमके
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दुल्हन दीपा वलेचा ने बताया कि कभी सोचा नहीं था कि मैं कभी घोड़ी पर बैठूंगी. जब देखा कि इन लोगों ने इतना कुछ प्लान किया है तो मुझे बहुत अच्छा लगा कि मेरी फैमिली मेरे लिए इतना सोचती है. मैसेज देना चाहूंगी कि कभी भी लड़कियां बोझ नहीं होती हैं अपने परिवार के लिए... तो सबको सोचना चाहिए कि लड़कों के बराबर लड़कियां भी होती हैं. इसलिए उन्हें उतना ही प्यार मिलना चाहिए जितना लड़कों को दिया जाता है.

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परिवार की माने तो कई सालों बाद उनके परिवार में एक बेटी हुई है. वे अपनी बेटी को बेटे से भी ज्यादा प्यार करते हैं. अक्सर समाज में बेटों को प्राथमिकता दी जाती है, लिहाजा वह अपनी बेटी की बारात निकाल कर समाज को यह मैसेज देना चाहते हैं की बेटियों का सम्मान करें क्योंकि बेटी है तो कल है.

घोड़ी पर सवार होकर न‍िकली दुल्हन, बारात‍ियों ने जमकर लगाए ठुमके
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दुल्हन की मां नेहा वलेचा ने बताया कि हम बेटों और बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते. जैसे हम बेटों की बारात निकालते हैं वैसे ही सपना था कि बेटी की बारात निकालें. 25 साल बाद हमारे घर पर किसी बेटी की शादी हो रही है तो सभी को बेहद खुशी थी. 

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आज भी हमारे समाज में कुछ कुरीतियां मौजूद हैं, जो बेटियों को बोझ समझती हैं. दीपा की शादी उनके लिए एक संदेश है जो बेटियों को बोझ समझते हैं. समाज के लिए यह सीख भी है कि बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं होता जितना अधिकार बेटे को है उतना ही अधिकार बेटी को समाज में देना चाहिए.  

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समाजसेवी मनोहर सुगानी ने बताया कि सतना के नानकराम वलेचा बड़े समाजसेवी हैं, उनके परिवार की बेटी है. 25 साल बाद आज उस परिवार को कन्यादान का मौका मिला है. पूरा समाज ऐसे परिवार का सम्मान करता है और आशीर्वाद देता है कि वो आगे बढ़े. इससे सीख मिलती है कि कोई भी फर्क न करे बेटे-बेटियों में.

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