गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में भारतीय जवानों के पराक्रम और साहस को देखकर अब चीनी सेना भी सहम गई है. शायद यही वजह है कि चीन की सरकार और सेना भारतीय सेना के गोरखा रेजिमेंट को लेकर पड़ताल कर रही है. आखिर चीन की सेना को भारत के गोरखा रेजिमेंट में ही इतनी उत्सुकता क्यों है. दरअसल गलवान घाटी में मौजूदा तनाव के बाद भारतीय सेना के शौर्य का सामना करने वाली चीन सेना को इसी जगह पर सालों पहले गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने भी धूल चटा दी थी.
भारतीय गोरखा रेजिमेंट ने 4 जुलाई 1962 में घाटी में पहुंचने के लिए एक पोस्ट बनाई थी. इस पोस्ट ने समांगलिंग के एक चीनी पोस्ट के कम्युनिकेशन नेटवर्क को काट दिया जिसे चीन ने अपने ऊपर हमला बताया था. इसके बाद चीनी सैनिकों ने गोरखा पोस्ट को 100 गज की दूरी पर घेर लिया था. 4 महीने तक ये घेराबंदी जारी रही लेकिन गोरखा रेजिमेंट के जवान चीन के सामने झुकने की जगह उसको कड़ी टक्कर देते रहे.
हाल ही में नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने भारत, नेपाल और ब्रिटेन में गोरखा सैनिकों की सैन्य सेवा के संबंध में 1947 में हुए समझौते पर सवाल उठाया था. समझौते के मुताबिक दोनों देश की सेना में नेपाली गोरखाओं की नियुक्ति होती थी.
अब चीन की आंखों में गोरखा रेजिमेंट के वीर नेपाली योद्धा बुरी तरह खटकने लगे हैं. चीन इससे बेहद परेशान है. सूत्रों के मुताबिक चीन के काठमांडू में दूतावास और नेपाल में उसकी राजदूत हाओ यांकी गोरखा रेजिमेंट में नेपाल के जवानों के शामिल होने का राज जानना चाहती हैं.
हाओ यांकी ने एक चाइनिज एनजीओ चाइना स्ट्डी सेंटर को ये जिम्मा सौंपा है कि वो नेपाल में सर्वे करे और नेपाल के लोगों और भारतीय सेना के बीच इस अटूट रिश्ते की पड़ताल करे.सूत्रों के मुताबिक एनजीओ को जानकारी जुटाने के लिए कहा गया है.
ऐसे में आप भी जानना चाहते होंगे कि आखिरकार नेपाल के लोग भारतीय सेना का हिस्सा क्यों बनते हैं? और गोरखा रेजिमेंट में नेपाल के जवानों के शामिल होने से नेपाल पर क्या सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़ा है. गोरखा रेजिमेंट और नेपाल के जवानों का संबंध कई दशकों पुराना है- वीर गोरखा भारतीय सेना की शान हैं और युद्ध में उनका अदम्य साहस का गौरवपूर्ण इतिहास है. यही वजह है कि चीन इससे परेशान है.
चीन ये जानना चाहता है कि नेपाल के लोग अपनी सेना को छोड़कर भारत की सेना में क्यों शामिल होते हैं. इसकी वजह क्या है. क्या इसके पीछे आर्थिक कारण है या फिर गौरवपूर्ण लंबा इतिहास और परंपरा है जिससे दोनों देश के लोग जुड़े हुए हैं.
अब यह समझना मुश्किल नहीं कि चीन बड़ी साजिश रच रहा है और ये साजिश सिर्फ LAC तक ही सीमित नहीं है. नेपाल में उसकी राजदूत हाओ यांकी सक्रिय हैं और काठमांडू में इनकी तैनाती का सबसे बड़ा मिशन भारत और नेपाल के सालों पुराने रिश्तों के बीच संबंधों में खटास लाना है.
चीन ये जानता है कि गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे बड़ी रेजिमेंट में से एक है. करीब 60 से 80 हजार नेपाली गोरखा इस रेजिमेंट का हिस्सा हैं. हर साल नेपाल से करीब 1500 गोरखा सैनिक सेना में शामिल होते हैं. इनकी शौर्य और वीरता की गाथा से भारतीय सेना का इतिहास भरा पड़ा है.
1962 की चीन से जंग हो या फिर 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध- हर मोर्चे पर गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया है और यही वजह है कि चीन को ये गठजोड़ खटक रहा है.
चीन नेपाल को किसी मोहरे की तरफ इस्तेमाल कर रहा है. नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन के इशारों पर काम कर रहे हैं. काठमांडू में चीन की राजदूत हाओ यांकी नेपाल के प्रधानमंत्री की संकटमोचक बनी हुई है. चीन ने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा की कुर्सी बचाई और अब वो लगान वसूल रहा है. भारत के खिलाफ खाई खोदने की कोशिश में जुटा हुआ है.