राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) की वजह से असम, बंगाल समेत कई राज्यों में लाखों लोग ऐसे हैं जो दशकों से इस देश में रह रहे है लेकिन दस्तावेजों की कमी की वजह से वो NRC से बाहर हो गए है. उन्हें तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे भी कुछ इलाके हैं जहां के लोगों को इससे भारी समस्या का सामना करना पड़ रहा है. पुब सफा कमार, बक्सा, असम: विश्वप्रसिद्ध मानस राष्ट्रीय उद्यान से महज़ 10 किलोमीटर दूर बसे इस गांव के लोग कहते हैं कि उनके पास 1951 के NRC समेत सारे वैध दस्तावेज़ हैं, लेकिन NRC में नाम नहीं आया. (फोटोः रजत सैन)
फॉरेनर्स ट्रायब्यूनल, धुबरी: 31 अगस्त, 2019 प्रकाशित हुए NRC से 19.22 लाख लोग बाहर छूट गए. इनकी किस्मत का फैसला अंततः उन 100 ट्रायब्यूनल्स में होगा जो पूरे असम में बनाई गई हैं. (फोटोः रजत सैन)
धुबरी: नागरिकता के लिए सरकारी कार्यवाही सैंकड़ों किलोमीटर लंबी यात्राओं की मांग करती है. जहां ब्रह्मपुत्र की धार आड़े आए, वहां नाव का सहारा है.
धुबरीः धुबरी में ब्रह्मपुत्र की धार क्षितिज से भी आगे तक है. उस पार कछार में बने गावों तक अभी पुल नहीं पहुंचे हैं, लेकिन ये सवाल पहुंच गया है कि कौन भारतीय कहलाएगा, कौन नहीं. कछार में अपने घरों की ओर जाते लोग. (फोटोः रजत सैन)
बक्साः कदम अली के पिता, बच्चे और पत्नी. ठेला चलाने वाले कदम अली के यहां 2015 में पहली बार असम की बॉर्डर पुलिस ने दस्तक दी. नागरिकता को लेकर बारपेटा और बक्सा में कचहरी के चक्कर लगते रहे. परिवार NRC के पहले ड्राफ्ट में शामिल था, लेकिन अंतिम सूची से बाहर रह गया. कदम अली इस तस्वीर में नहीं हैं क्योंकि गोलपारा के डिटेंशन कैंप में कैद हैं. (फोटोः रजत सैन)
बक्साः बेटे के डिटेंशन कैंप में बंद हो जाने के बाद कदम अली के पिता सोच में हैं कि घर कैसे चलेगा. कहते हैं कि कदम अली था तो तीनों वक्त खाना नसीब होता था. अब एक दफा कुछ खा लिया तो दो दफा मन को समझाकर रह जाते हैं. (फोटोः रजत सैन)
बक्साः गोलपारा डिटेंशन कैंप में बंद कदम अली का बेटा. पुलिस अदालत से ही कदम अली को अपने साथ ले गई थी, इसलिए ये पिता को अलविदा नहीं कह पाया. (फोटोः रजत सैन)
बक्साः पुब सफा कमार गांव के निखिल दास (मध्य) मेज़ पर रखे दस्तावेज़ों में से एक साथी का 1956 का रिफ्यूजी सर्टिफिकेट दिखाते हुए. दास ने अपने दादाजी की नागरिकता के दस्तावेज़ और 1971 के ज़मीन के दस्तावेज़ जमा किए थे. लेकिन NRC में नाम नहीं आया. ये नहीं जानते कि ऐसा क्यों हुआ. (फोटोः रजत सैन)
बक्साः महिलाएं NRC की कवायद में सबसे ज़्यादा परेशान हुई हैं. शादी के बाद उनके नाम में पति का उपनाम जुड़ गया. इससे सरकारी दस्तावेज़ों में नाम मिलाने में बहुत दिक्कत आई. (फोटोः रजत सैन)
बक्साः गोलपारा के डिटेंशन कैंप में कैद कदम अली जब आज़ाद थे, तब भी इस ठेले में जुते रहते थे. लेकिन कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि परिवार का पेट पलता था. (फोटोः रजत सैन)
धुबरी: पहले NRC की कवायद और अब फॉरेनर्स ट्रायब्यूनल की कार्यवाही के लिए लोग हलफनामे पर हलफनामे बनाने को मजबूर हैं. बाज़ार में रेवेन्यू टिकट की किल्लत हो गई है. (फोटोः रजत सैन)