स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ये नाम आपने अगस्त महीने के अंत में जरूर सुना होगा. ये सेना की वही टुकड़ी थी जिसने चीनी सैनिकों के छुक्के छुड़ाते हुए ब्लैक टॉप जैसे रणनीतिक मोर्चे पर बढ़त बना ली.
इसी सीक्रेट सेना ने 29 अगस्त की रात को पेंगॉन्ग के दक्षिणी किनारे पर घुसपैठ करने की कोशिश करते चीनी सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया था. इस सीक्रेट फोर्स के बारे में तबतक कम ही लोगों को पता था, लेकिन अब इस फोर्स के शौर्य की कहानियां देशभर में कही और सुनी जा रही हैं.
दिलचस्प ये है कि लेह में ऐसा गांव है जहां हर घर का कम से कम एक सदस्य स्पेशल सीक्रेट फोर्स में अपनी सेवाएं दे रहा है या दे चुका है. इस गांव का नाम है आंगलिंग जिसमें चार सौ घर हैं.
इस गांव में पीढ़ियों से भारतीय सेना की सेवा करने वाले तिब्बती रहते हैं. स्पेशल सीक्रेट फोर्स के पूर्व सैनिकों से बात करने पर पता चला कि भारत के वो कई सीक्रेट मिलिट्री ऑपरेशन्स में शामिल रहे हैं. एसएसएफ के एक पूर्व जवान ने बताया कि हमारा काम भारतीय सेना को लड़ाई में मदद करना है. हम इसके बारे में किसी से जिक्र नहीं कर सकते थे. आजकल थोड़ी बहुत चीजें बाहर आ जाती हैं. इन्होंने 1962 में एसएसएफ ज्वाइन किया था.
बता दें कि भारत में सीक्रेट फोर्सेज़ का गठन 1962 चीन से युद्ध में हार मिलने के बाद किया गया था. एसएफएफ के जवान पहाड़ियों पर, ऊंचे स्थानों पर लड़ाई में माहिर होते हैं. दुश्मन के इलाके में घुसकर हमला करने में इन्हें महारत हासिल है. ये जेनेटिक रूप से एथलेटिक होते हैं यही वजह वहज है कि इनकी कद-काठी काफी मजबूत होती है.
50 के दशक से लेकर आज तक पीएलए (चाइनीज़ आर्मी) इससे उलझने से दूरी ही बनाए रखना प्रेफर करती है. एसएफएफ की पहली बड़ी भूमिका 1971 की लड़ाई में रही. एसएफएफ ने उस वक्त के ईस्ट पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के चटगांव हिल्स के करीब भारतीय सेना की बड़ी मदद की थी. माना जाता है कि एक खुफिया ऑपरेशन के तहत करीब तीन हजार एसएफएफ जवानों को मैदान में उतारा गया था. इन्होंने पाकिस्तानी आर्मी के भागने के सभी रास्ते ब्लॉक कर दिए थे.