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इन तस्वीरों में देखें कितना खूंखार है TTP तालिबान, जिनके लड़ाके बढ़ रहे हैं पाकिस्तान की ओर

तहरीक-ए-तालिबान यानी पाकिस्तानी तालिबान
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तहरीक-ए-तालिबान यानी पाकिस्तानी तालिबान

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तानी तालिबानियों का गुट है, जिसकी सोच और तौर-तरीके अफगान तालिबान से मिलते-जुलते हैं. यह संगठन साल 2007 में वजूद में आया था. ये संगठन पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना के खिलाफ आतंकी गतिविधियां चलता रहता है.

तस्वीर में  इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के मुख्य मौलवी मौलाना अब्दुल अजीज (दाएं) तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की एक समिति के सदस्य हैं. वे 4 फरवरी, 2014 को इस्लामाबाद में एक बैठक में भाग लेने के लिए पहुंचे थे. तब पाकिस्तानी तालिबान के वार्ताकारों ने कहा था कि सरकार के प्रतिनिधियों ने आतंकवादियों की टीम को लेकर भ्रम का हवाला देते हुए नियोजित शांति वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया है. दोनों पक्षों को  बातचीत के जरिए शांति तक पहुंचने की संभावनाओं पर संदेह था. (फोटो -आमिर कुरैशी/एएफपी)

सीमावर्ती इलाकों में हैं सक्रिय
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सीमावर्ती इलाकों में हैं सक्रिय
TTP के सदस्य ज्यादातर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे हिस्सों में सक्रिय हैं. माना जाता है कि इनके लड़ाकों में अधिकतर पश्तून समुदाय से हैं, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों देशों की सीमा और सीमा से सटे हुए इलाकों में रहते हैं. यही कारण है कि इन्हें अफगान तालिबान का भी साथ मिलता है.

तस्वीर में 20 फरवरी, 2023 को नंगरहार प्रांत में अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तोरखम सीमा क्रॉसिंग के पास अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान सीमा बलों के बीच गोलीबारी शुरू होने के बाद तालिबान सुरक्षाकर्मी सड़क पर पहरा देते हुए. (Photo -AFP)
 

ऐसे वजूद में आया टीटीपी
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ऐसे वजूद में आया टीटीपी
टीटीपी के सदस्य वैसे तो पाकिस्तानी हैं, लेकिन वे खुद को तालिबान के ज्यादा करीब मानते हैं. उनके बनने का इतिहास भी दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई का नतीजा है. दरअसल अमेरिका में ट्विन टावर हमले के बाद अमेरिकी प्रेशर में आए पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाइयां शुरू कीं, जिसमें कई तालिबानी लड़ाके मारे गए.

इस तस्वीर में पाकिस्तान सरकार के साथ बातचीत करने के लिए गठित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की एक समिति के सदस्य, इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के मुख्य मौलवी मौलाना अब्दुल अजीज (आर) 4 फरवरी, 2014 को इस्लामाबाद में एक समाचार सम्मेलन से पहले कुरान का पाठ करते हुए. (फोटो - आमिर कुरैशी/एएफपी)
 

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अधिकतर पाकिस्तानी युवा हैं इसमें शामिल
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अधिकतर पाकिस्तानी युवा हैं इसमें शामिल
इसके बाद तालिबान से जुड़े पाकिस्तान युवाओं ने ही टीटीपी का गठन किया, जिसमें जाहिर तौर पर अफगानिस्तान का सपोर्ट रहा है. इस तरह अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान के प्रभाव से ही पाकिस्तान की जमीन पर टीटीपी की बुनियाद खड़ी हुई और अब ये पाकिस्तानी हुकूमत के दुश्मन बन बैठे हैं. 

तस्वीर में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) समिति के सदस्य और इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के मुख्य मौलवी मौलाना अब्दुल अजीज 7 फरवरी, 2014 को इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बोलते हुए.  तब तालिबान के साथ पाकिस्तान की नई शांति वार्ता को एक नया झटका लगा, क्योंकि आतंकवादियों के एक वार्ताकार ने कहा कि जब तक एजेंडे में इस्लामी शरिया कानून लागू करना शामिल नहीं हो जाता, तब तक वह इसमें आगे कोई हिस्सा नहीं लेंगे. मौलवी मौलाना अब्दुल अजीज का हस्तक्षेप सरकार और टीटीपी का प्रतिनिधित्व करने वाली टीमों के  इस्लामाबाद में प्रारंभिक दौर की वार्ता के एक दिन बाद आया था. (फोटो - आमिर कुरैशी/एएफपी)
 

इस शख्स के पास है इसकी लीडरशिप
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इस शख्स के पास है इसकी लीडरशिप
फिलहाल इसकी लीडरशिप नूर वली महसूद के पास है. मौलाना फजलुल्ला के अमेरिकी ड्रोन अटैक में मारे जाने के बाद साल 2018 में महसूद को ये जिम्मेदारी मिली. इसके बाद से पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में आतंक की घटनाएं और अलगाववाद बढ़ता दिख रहा है.

तस्वीर में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) समिति के सदस्य और इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के मुख्य मौलवी मौलाना अब्दुल अजीज 7 फरवरी, 2014 को इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बोलते हुए.  (फोटो - आमिर कुरैशी/एएफपी)

खतरनाक है ये गुट
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खतरनाक है ये गुट
हाल के सालों में पाक सेना ने कई अभियान चलाए, जिससे इस गुट को खत्म किया जा सके, लेकिन इससे इतना ही फर्क पड़ा कि ज्यादातर लड़ाके पाकिस्तान से हटकर अफगान सीमा पर शिफ्ट हो गए. ये लड़ाके काफी खतरनाक हैं. अभी कथित तौर पर इन्हीं शिविरों पर हमला हुआ था, जिसमें आम नागरिक मारे गए. 

तस्वीर  23 जून, 2021 में अफगानिस्तान के काबुल के एक सभा की है. इस दौरान अफगान मिलिशिया, अफगान रक्षा और सुरक्षा बलों में शामिल हुए. उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान की बढ़त, देश के अल्पसंख्यक जातीय समूहों का पारंपरिक गढ़ है, जिन्होंने लगभग 20 साल पहले विद्रोही बल को सत्ता से खदेड़ दिया था. (फोटो -  एपी/पीटीआई)

इस वजह से डरा है पाकिस्तान
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इस वजह से डरा है पाकिस्तान
जिस तरह आज पूरे अफगानिस्तान पर तालिबानी हुकूमत है. 20 सालों तक चली लड़ाई के बावजूद भी अमेरिका की अफगानिस्तान से हटना पड़ा और तालिबान ने अपना लोहा मनवाया. ऐसे में पाकिस्तान में बढ़ रहे टीटीपी के प्रभाव और तालिबान शासित अफगानिस्तान के समर्थन से पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ी हुई है. 

ये तस्वीर 16 अगस्त, 2021 को ली गई थी. इसमें काबुल स्थित अफगान राष्ट्रपति भवन की ओर जाने वाले मुख्य द्वार के सामने एक तालिबान लड़ाका मशीन गन के साथ एक वाहन के पीछे बैठा है. तालिबान की राजधानी में घुसने के बाद अराजक निकासी का प्रबंधन करने के लिए संघर्ष करते हुए अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान के हवाई क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया था.  (फोटो- एपी /रहमत गुल)

पाकिस्तानी सेना की नाम में कर रखा है दम
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पाकिस्तानी सेना की नाम में कर रखा है दम
पाकिस्तान में खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत में टीटीपी ने पाक आर्मी की नाक में दम कर रखा है. यहां होने वाले आतंकी हमलों के बीच इसी संगठन का नाम आता रहा. हाल के सालों में तहरीक-ए-तालिबान ने पाकिस्तान में कई हमलों को अंजाम दिया. 

इस तस्वीर में तालिबान लड़ाके काबुल शहर के वज़ीर अकबर खान मोहल्ले में 18 अगस्त, 2021 को गश्त करते दिखाई दे रहे हैं. (फोटो- एपी /रहमत गुल)
 

पाकिस्तानी जमीन पर उसी के दुश्मन
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पाकिस्तानी जमीन पर उसी के दुश्मन
टीटीपी पर ये आरोप भी लगते रहे कि उसके लोग तो पाकिस्तानी मूल के हैं लेकिन अपने ही देश की सरकार और सेना के खिलाफ तालिबान से मिले हुए हैं. अब तालिबान ने पाकिस्तान को खुली चुनौती दे दी है. 

इस तस्वीर में 31 अक्टूबर, 2001 को पेशावर के उत्तर-पूर्व में स्थित लगहारी में पाकिस्तानी कबायली पुरुष तालिबान के साथ लड़ाई में हिस्सा लेने से पहले अपनी बंदूकों के साथ पोज़ दे रहे हैं. ये सभी अमेरिका के खिलाफ तालिबान का साथ देने अफगानिस्तान जाने का इंतजार कर रहे थे. उग्र कट्टरपंथी इस्लामी नेता सूफी मोहम्मद के नेतृत्व में हज़ारों नाराज़ पाकिस्तानी कबायली लोगों ने तालिबान का साथ दिया था. (फोटो - रॉयटर्स/अजीज हैदरी )
 

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