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रहस्यमयी है वो जगह जहां उतरेगा चंद्रयान-3, चांद के बारे में ये 10 बातें नहीं जानते होंगे आप

चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर की सफल लैंडिंग होने पर भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बनकर इतिहास रच देगा. अब बस कुछ ही घंटों का वक्त बचा है.

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चांद से जुड़ी कई खास बातें हैं (तस्वीर- Pexels)
चांद से जुड़ी कई खास बातें हैं (तस्वीर- Pexels)

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ISRO का चंद्रयान-3 का लैंडर मॉड्यूल बुधवार शाम चंद्रमा की सतह पर उतरेगा. इसकी सफल लैंडिंग होने पर भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बनकर इतिहास रच देगा. अब बस कुछ ही घंटों का वक्त बचा है. इसरो के इस मिशन पर भारत समेत पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और आम लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं.

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तो चलिए अब इस खास मौके पर चांद के बारे में वो 10 खास बातें जान लेते हैं, जो आप नहीं जानते होंगे. 

1. चंद्रमा का आकार गोल नहीं

पूर्णिमा के दिन आपने चंद्रमा को गोल आकार में देखा होगा. मगर असल में चंद्रमा एक उपग्रह के रूप में किसी गेंद की तरह गोल नहीं है. ये अंडाकार है. इसी वजह से चांद की तरफ देखते हुए आपको इसका कुछ हिस्सा नजर आता है. चांद का भार भी इसके ज्यामितीय केंद्र से 1.2 मील दूर है.
 
2. पूरा दिखाई नहीं देता चांद 

जब भी आप चांद को देखते हैं, तो आपको उसका अधिकतम 59 फीसदी हिस्सा ही दिखता है. इसका 41 फीसदी हिस्सा धरती से नजर नहीं आता. ऐसा कहा जाता है कि अगर आप अंतरिक्ष पर जाकर इसी 41 फीसदी हिस्से पर खड़े हो जाएंगे, तो आपको धरती भी दिखाई नहीं देगी.

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मिशन चंद्रयान-3 से जुड़ी स्पेशल कवरेज देखने के लिए यहां क्लिक करें 

ब्लू मून के पीछे भी छिपी है कहानी (तस्वीर- Pexels)
ब्लू मून के पीछे भी छिपी है कहानी (तस्वीर- Pexels)

3. ब्लू मून शब्द के पीछे की कहानी

कहा जाता है कि चंद्रमा से जुड़ा ब्लू मून शब्द पहली बार साल 1883 में इंडोनेशियाई द्वीप क्राकातोआ में हुए ज्वालामुखी विस्फोट के कारण इस्तेमाल में आया था. ये पृथ्वी के इतिहास के सबसे घातक ज्वालामुखी विस्फोट में गिना जाता है. जब इसमें विस्फोट हुआ था, तो उसकी आवाज पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों तक सुनी गई थी. आसमान में राख फैल गई थी. राख इतनी अधिक थी कि चांद नीला नजर आने लगा था. 

4. सीक्रेट प्रोजेक्ट पर हो रहा काम

दुनिया में एक वक्त ऐसा भी था, जब अमेरिका चंद्रमा पर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर विचार कर रहा था. ऐसा करके अमेरिका सोवियत संघ को ये दिखाना चाहता था कि वो कितना शक्तिशाली है. इस सीक्रेट प्रोजेक्ट का नाम 'A Study of Lunar Research Flights' और प्रोजेक्ट 'A119' रखा गया था.

चांद के गड्ढों के पीछे भी है वजह (तस्वीर- इसरो)
चांद के गड्ढों के पीछे भी है वजह (तस्वीर- इसरो)

5. वहां कैसे बन रहे हैं गड्ढे

हाल में ही इसरो ने चांद की कुछ तस्वीरें जारी की हैं. जिसमें लोगों को चांद पर काफी गड्ढे नजर आए. ये गड्ढे यहां करीब चार अरब साल पहले आकाशीय पिंडों की टक्कर की वजह से बने थे. इन गड्ढों को इंपैक्ट क्रेटर भी कहा जाता है.  

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6. पृथ्वी की रफ्तार कम कर रहा

चांद पृथ्वी की रफ्तार को धीमा कर रहा है. जब वो पृथ्वी के बेहद करीब होता है, तो उसे पेरिग्री कहा जाता है. तब ज्वार-भाटा का स्तर सामान्य से बेहद अधिक हो जाता है. इस दौरान चंद्रमा पृथ्वी की घूमने की ताकत को काम कर देता है. जिसके कारण पृथ्वी प्रत्येक शताब्दी में 1.5 मिलि सेकंड तक धीमी हो रही है.

7. चंद्रमा पर रोशनी का रहस्य

पूर्णिमा का चांद लोगों को रोशनी से भरा हुआ दिखता है. मानो इससे अधिक रोशन कोई और चीज बनी ही न हो. मगर सूर्य पूर्णिमा के इस चांद की तुलना में 14 गुना ज्यादा चमकीला होता है.

सिकुड़ नहीं रहा है चंद्रमा (तस्वीर- Pexels)
सिकुड़ नहीं रहा है चंद्रमा (तस्वीर- Pexels)

8. चंद्रमा न फैल रहा न सिकुड़ रहा

लियानार्डो डा विंसी इतिहास में ऐसे पहले शख्स हैं, जिन्होंने ये पता लगाया था कि चांद सिकुड़ या फैल नहीं रहा है. उसका केवल कुछ हिस्सा ही हमारी निगाहों से ओझल हो जाता है.
 
9. क्रेटर का नाम कैसे रखते हैं

इंटरनेशनल एस्ट्रॉनॉमिकल यूनियन का काम चंद्रमा के गड्ढों के साथ ही वहां मिलने वाली दूसरी खगोलीय चीजों का नाम रखना है. इन गड्ढों यानी क्रेटर्स के नाम मशहूर वैज्ञानिकों, कलाकारों और एक्सप्लोरर्स के नाम पर रखे जाते हैं. 
 
10. दक्षिणी ध्रुव क्यों है रहस्यमयी

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चंद्रयान-3 चांद के जिस दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर उतरने की कोशिश करेगा, वो काफी रहस्यमयी माना जाता है. नासा का कहना है कि यहां ऐसे कई गहरे गड्ढे और पहाड़ हैं, जिनकी छांव वाली सतह पर अरबों वर्षों से सूर्य की रोशनी नहीं पड़ी है. चांद का दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र करीब ढाई हजार किलोमीटर चौड़ा है. इसके साथ ही ये आठ किलोमीटर गहरे गड्ढे के किनारे स्थित है. इस गहरे गड्ढे को सौर मंडल यानी सोलर सिस्टम का सबसे पुराना इंपैक्ट क्रेटर भी कहा जाता है. 

इंपैक्ट क्रेटर किसी ग्रह या फिर उपग्रह में मौजूद उन गड्ढों को कहा जाता है, जो किसी बड़े उल्का पिंड या फिर ग्रहों की टक्कर से बनते हैं. नासा के अनुसार, चंद्रमा के इस हिस्से में सूर्य क्षितिज के नीचे या हल्का ऊपर रहता है. ऐसे में यहां दिन में थोड़ी बहुत रोशनी पहुंचती है. इस दौरान तापमान 54 डिग्री सेल्सियस तक रहता है.

चंद्रयान-3 ने फिर भेजी चांद की खूबसूरत तस्वीरें

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