अमूमन लोगों की मौत या बीमारी पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री सहायता कोष से मदद मिलती है. मगर मध्य प्रदेश में एक गर्भवती गधी की मौत पर मुआवजा मिला है.
बैतूल जिले के कलेक्टर की सिफारिश पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सहायता कोष से यह मदद दी गई है. कलेक्टर का तर्क है कि गधी के मालिक की रोजी रोटी इसी जानवर के सहारे थी. और लोकसभा चुनाव में ड्यूटी के चलते डॉक्टर उसकी बीमार गधी का इलाज नहीं कर पाए. इसलिए सरकार का मदद करने का फर्ज बनता है.
ठेले पर गधी की लाश ले पहुंचे सरकारी दफ्तर
इस वाकये की शुरुआत 24 अप्रैल को हुई. इस दिन मतदान में सभी अधिकारी और कर्मचारियों की ड्यूटी लगी थी. इनमें पशु चिकित्सालय के डॉक्टर भी शामिल थे. इस दिन बैतूल के कोठी बाजार में रहने वाले कैलाश प्रजापति की गर्भवती गधी की तबीयत बिगड़ गई. कैलाश गधी को अस्पताल ले गया. जहां इलाज न होने से उसकी मौत हो गई. गरीब कैलाश का एक मात्र रोजी रोटी का सहारा यह गधी थी, जिस पर वह मिट्टी लाकर उसके बर्तन बनाकर बेचता था. गधी की मौत से कैलाश और उसका परिवार दुखी हो गया और गधी के शव को हाथ ठेले पर लेकर कलेक्टर कार्यालय पंहुचा.
कलेक्टर ने गधी का पोस्ट मॉर्टम कराने के आदेश के साथ सहायता दिलाने का भी आश्वासन दिया. लगातार दो महीने तक कैलाश सहायता के लिए कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काटता रहा. जब गुरुवार को उसे पता चला की मुख्यमंत्री सहायता कोष से उसे दस हजार की सहायता राशि स्वीकृत हो गई तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा.
दरअसल समय पर इलाज ना मिलने से गधी की मौत हो जाने के मामले को बैतूल कलेक्टर राजेश प्रसाद मिश्रा ने गंभीरता से लिया और मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर मुख्यमंत्री सहायता कोष से गधी के मालिक को दस हजार रुपये सहायता देने की अनुशंसा की थी. उन्होंने अपने पत्र में लिखा था की कैलाश गधी पर मिटटी के बर्तन बेच कर परिवार का गुजर बसर करता था इसलिए इस मामले को विशेष प्रकरण के रूप में लिया जाए. इस बारे में राजेश प्रसाद मिश्रा ने कहा, गधी की मौत के बाद कैलाश की रोजी रुक गई थी. इसलिए मैंने सहानुभूतिपूर्वक पत्र लिखा था और मुझे खुशी है कि सहायता मंजूर भी हो गई.