जासूसी करने वालों के मन में न तो अपनी जान का खौफ होता है और न ही निजी जिंदगी से कुछ लेना देना. इनके मन में कूट कूटकर देशभक्ति भरी होती है. इसी के बूते ये दुश्मन देश में जाकर जरूरी जानकारी जुटाते हैं. ये अपनी जान की परवाह नहीं करते. इनके जज्बे के कारण ही जिंदगियां बचाई जाती हैं. जासूसी को सबसे खतरनाक प्रोफेशन भी कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. लेकिन जब सरकार इनसे पल्ला झाड़ लेती हैं, इन्हें पहचानने से इनकार कर देती हैं, तभी सबकुछ खत्म हो जाता है.
कुछ ऐसा ही रविंद्र कौशिक के साथ भारत सरकार ने किया था. उन्हें ब्लैक टाइगर के नाम से भी जाना जाता है. आज हम इन्हीं की कहानी जानते हैं...
रविद्र कौशिक को पाकिस्तान ने साल 1983 में पकड़ा था. इनके साथ जो टॉर्चर का सिलसिला शुरू हुआ, वो हम-आप सोच भी नहीं सकते. सभी देशों की तरह भारत की खुफिया एंजेंसी RAW दुश्मन देशों में अपने जासूस भेजती है. भारत में भी जाने कितने ISI के जासूस घूम रहे हैं. इन्हें स्लीपर सेल भी कहते हैं. ये कब कहां होते हैं, किसी को खबर नहीं. जासूसों को पूरी ट्रेनिंग देकर भेजा जाता है. इन्हें अपने परिवारों को भी नहीं बताना होता कि ये कब कहां जा रहे हैं. अगर किसी दोस्त देश में जासूस पकड़ा जाए, तो ज्यादा बुरा नहीं होता, लेकिन अगर दुश्मन देश में पकड़ा जाए तो फिर उसकी खैर नहीं.
जासूसी छोटे वक्त के लिए भी की जाती है और लंबे वक्त के लिए भी. होता ये भी है कि लॉन्ग टर्म वाले जासूस को शॉर्ट टर्म के लिए भेजा गया जासूस जानकारी देने भी जाता है.
विनोद खन्ना से तुलना करते थे लोग
अब रविंद्र कौशिश की बात करें, तो उनकी वजह से लाखों सैनिकों की जान बची थी. इन्हें रॉ की तरफ से एक के बाद एक टास्क दिए गए, जिन्हें वो पूरा करते रहे. कौशिक राजस्थान के गंगानगर के रहने वाले थे. उनका जन्म 11 अप्रैल, 1952 में हुआ. पिता वायु सेना में थे. ये थियेटर और ड्रामा में एक्टिंग कर चुके थे. इन्होंने बीकॉम की पढ़ाई भी की. ये दिखने में इतने हैंडसम थे कि लोग इनकी तुलना बॉलीवुड एक्टर विनोद खन्ना से करते थे.
लखनऊ में नेशनल लेवल की ड्रामेटिक मीट हुई. इस दौरान वो रॉ के संपर्क में आए. तब इन्हें अधिकारियों ने दफ्तर में बुलाकर रॉ के बारे में बताया. उन्हें दो साल तक ट्रेनिंग दी गई. उन्हें मुस्लिम रिजी रिवाज, उर्दू, अरबी बोलना सिखाया गया. बाकी पंजाबी बोलना वो जानते ही थे क्योंकि राजस्थान-पंजाब सीमा के पास ही इनका शहर है. तब वो महज 23 साल के थे. ट्रेनिंग साल 1975 में शुरू हुई और 1977 तक चली. चूंकी वो काफी अच्छी एक्टिंग करते थे, इसलिए उन्हें लंबे वक्त के लिए भेजे जाने का फैसला लिया गया. उन्हें और ज्यादा निखारने के लिए छह से सात देशों में भेजा गया.
1978 में पाकिस्तान के कराची में एंट्री
रविंद्र कौशिश घर से दुबई में नौकरी करने की बात बोलकर पाकिस्तान गए थे. उन्हें नया नाम नबी अहमद शकीर मिला. वो कराची में नई पहचान के साथ पहुंचे. वक्त था 1978. अब नबी अहमद को लोगों से घुलना मिलना था. उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया. फिर सेना में भर्ती को लेकर अखबार में एक विज्ञापन देखा. बस फिर क्या था, वो सेना में भर्ती हो गए. उन्हें पाकिस्तान इतना काबिल समझता था कि वो मेजर के पद तक पहुंचे. वो 1979 से 1983 तक मिलिट्री सर्विस में रहे.
वहीं एक सैन्य अफसर, जो आर्मी यूनिट में टेलर था, उसकी बेटी अमानत से उन्हें प्यार हो गया. इनकी शादी भी हुई. फिर एक बेटे का जन्म हुआ. इससे लोगों का उन पर भरोसा और भी पुख्ता हो गया. वो भारत को बड़ी बड़ी जानकारी दिया करते थे. इन्हीं जानकारियों से उन्होंने भारत के लाखों जवानों की जान बचाई. रविंद्र कौशिक चार भाई बहन थे. परिवार को उनकी कोई खबर नहीं थी. छोटे भाई की शादी में शामिल होने के लिए दुबई होते हुए भारत आए थे.
परिवार को लिखी थीं चिट्ठियां
जब पिता ने उनसे भी शादी करने को कहा तो उन्होंने बताया कि वो शादी कर चुके हैं लेकिन जासूस वाली बात अब भी नहीं बताई थी. हालांकि बाद में परिवार को चिट्ठियां लिखीं, तब परिवार को पता चला. उन्होंने वापस पाकिस्तान जाकर अपना काम शुरू कर दिया. वो परिवार से 1981 में ही आखिरी बार मिले. इसके दो साल बाद कौशिश को पकड़ लिया गया.
1983 में इनायत मसीह नामक एक अन्य एजेंट को पाकिस्तान भेजा गया था. उसे कराची में रविंद्र कौशिक को कुछ दस्तावेज देने थे. उसे रॉ ने भेजा था. उसे पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया. इनायत को पंजाब से भर्ती किया गया था. पकडे़ जाने के बाद उसे बुरी तरह टॉर्चर किया गया. तभी उसने सबकुछ उगल दिया. उसने रविंद्र कौशिश के बारे में सबको बताया. उसने उनका पाकिस्तान वाला नकली नाम भी बता दिया. पाकिस्तानी सेना में मेजर हैं, ये भी बता दिया.
पाकिस्तानी सेना ने खेला घिनौना खेल
अब पाकिस्तान की सेना ने अपना खेल खेलना शुरू किया. उसने इनायत से कहा कि तुम जो काम करने आए थे, वो काम करके जाओ. कराची के जिन्ना गार्डन में इनायत ने रविंद्र कौशिश से मुलाकात की. वहीं पाकिस्तानी सेना छिपी हुई थी. बस अब कहानी पूरी तरह पलट गई. अगले 18 साल रविंद्र कौशिश के लिए नरक बन गए.
पकड़े जाने के बाद रविंद्र कौशिक को बहुत टॉर्चर किया गया. उन्होंने अपना मुंह तक नहीं खोला. नहीं बताया कि भारत को कौन सी जानकारी दी थीं. उन्हें 1985 में फांसी की सजा सुनाई गई. अगर इनायत मसीह अपना मुंह न खोलता तो रविंद्र कौशिश अपने सभी टास्क पूरे करके सकुशल भारत लौट आते. लेकिन इनायत टूट गया था. इधर रविंद्र कौशिश का परिवार परेशान था. रॉ और भारत सरकार पल्ला झाड़ चुके थे.
भारत सरकार को बाद में उनके बारे में पता चला. हुआ ये कि रविंद्र कौशिश ने उर्दू में पिता को कुछ चिट्ठियां लिखी थीं. इसमें उन्होंने बताया कि मैं पाकिस्तान में हूं, गिरफ्तार कर लिया गया हूं और रॉ का जासूस था. कौशिक के पिता की सदमें में मौत हो गई. बाद में परिवार के बाकी लोगों के हाथ वो चिट्ठी लगी. परिवार ने भारत सरकार से संपर्क किया. मगर किसी ने मदद नहीं की.
चिट्ठियों में छलका था दर्द
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, रविंद्र कौशिश ने एक चिट्ठी में लिखा था, 'क्या भारत जैसे बड़े देश के लिए कुर्बानी देने वाले लोगों को ये सिला मिलता है?' उन्होंने ये भी कहा था कि अगर मैं अमेरिका का जासूस होता, तो मैं तीन दिन के भीतर इस जेल के बाहर होता. इससे उनका दर्द साफ छलक रहा था. ऐसा नहीं है कि उन्हें छुड़ाया नहीं जा सकता था. जासूसों की भी अदला बदली हो सकती है. लेकिन सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं की गई.
रविंद्र कौशिक को कई जेलों में ट्रांसफर किया गया, जिनमें सियालकोट, कोट लखपत और मियांवाली शामिल हैं. उन्हें टीबी और दिल की बीमारी हो गई थी. नवंबर, 2001 में उन्होंने मियांवाली जेल में आखिरी सांस ली. दुख की बात ये थी कि मौत के बाद भी उन्हें भारत की जमीन नसीब नहीं हुई. उन्हें आखिर तक स्वीकारा नहीं गया. पत्नी भी जेल में एक बार ही मिलने आई थी, फिर कभी नहीं आई. उसे भी जुल्मों का सामना करना पड़ा था.